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भारत: पश्चिमी देशों की विचारधारा बदली | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत 9/11 की घटना से काफी पहले अस्सी के दशक से ही सभी देशों को आतंकवाद के ख़तरे के बारे में बता रहा था क्योंकि हम खुद इसके शिकार बने हुए थे और हैं. हालाँकि पश्चिमी देश इसे मानने को तैयार नहीं थे. पर 11 सितंबर 2001 के बाद उनकी विचारधारा में ऐसा परिवर्तन आया कि वे हमसे पूरी तरह सहमत हो गए. इससे हमें यह फायदा हुआ कि खुफ़िया जानकारियों का आदान प्रदान शुरु हुआ. दूसरा, संयुक्त राष्ट्र ने भी आतंकवाद के ख़िलाफ़ ऐसे सख़्त प्रस्ताव पारित किए जो हमारे लिए फाएदेमंद है. इससे ख़ास कर आतंकवादियों के प्रत्यर्पण में मदद मिली. इसी का नतीजा है कि अबू सलेम को भारत लाया गया. बाकी देशों को भी यह पूरी तरह महसूस हो गया है कि आतंकवाद विश्व के लिए एक खतरा बनकर उभरा है और यह लड़ाई जारी है. कई ऐसे तंजीम हैं जिनको पाकिस्तान समर्थन दे रहा है. वहीं पर उनके प्रशिक्षण शिविर हैं और उनके कै़डर (समर्थक) हैं. इनमें से कई को संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है. जैसे लश्करे तैबा है और आतंकवादियों में दाऊद का नाम है. अब समय के साथ आतंकवादी हमलों के तरीकों में भी बदलाव आया है. आत्मघाती हमले होने लगे हैं. इसे रोकने का आसान तरीका यही है कि जहां इनके कैंप चलते हैं और प्रशिक्षण दिया जाता है, उसमें हम व्यवधान पैदा कर दें. इस काम में पाकिस्तान हमारी पूरी तरह मदद नहीं कर रहा है. इसीलिए ऐसे ग्रुप उभरकर सामने आ जाते हैं और आत्मघाती हमले करते हैं. हर देश को आतंकवाद पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को अमल में लाना चाहिए. पर यह लड़ाई काफी लंबी है और इसमें सफलता इतनी जल्दी पाना संभव नहीं लगता. अलकायदा वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर हमले के बाद अमरीका और अन्य देश आतंकवाद के विरूद्ध दुनिया भर में मुहिम चला रहे हैं. जो इस्लामी कट्टरपंथी गुट हैं, जैसे अलकायदा या उसके सहयोगी, वो कमजोर तो पड़ रहे हैं पर अभी ख़त्म नहीं हुए है. इसकी चिंता सब देश कर रहे हैं और कोशिश हो रही है कि ऐसे संगठन जल्द से जल्द ख़त्म हो. 11 सितंबर की घटना के बाद अलकायदा का नाम अचानक सबके जेहन में कौंध गया. यह एक अंब्रेला ऑर्गेनाइजेशन है. हर देश में, चाहे वो इंडोनेशिया, फिलीपिंस, मलेशिया, पाकिस्तान या अफ़गानिस्तान हो, उनकी सोच के मुताबिक संगठन बन गए हैं और ये गुट अलकायदा के कदमों पर चलते हैं.
11 सिंतबर के हादसे में अलकायदा का सीधा हाथ था. पर भारत में ऐसी कोई घटना हुई हो जिसे अलकायदा ने अंजाम दिया हो, इसकी जानकारी हमें नहीं है. पर यह ज़रूर है कि जितने भी मजहबी गुट हैं, जैसे लश्करे तैबा हो या जैश ए मोहम्मद या दूसरे भी हैं, वह अलकायदा से काफी प्रेरणा लेते हैं और ओसामा बिन लादेन को महान नेता समझते हैं. इसे देखते हुए आतंकवाद के ख़िलाफ़ खुफ़िया एजेंसियों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. हमें और सुरक्षा के साधन अपनाने पड़ेंगे. प्रधानमंत्री ने भी कह दिया है कि आतंकवाद से भारत को सबसे ज़्यादा ख़तरा है. हमारे आर्थिक, परमाणु और धार्मिक स्थल है वहां पर ये आक्रमण कर सकते हैं. अभी पिछले दिनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री ने हिदायत दी है कि राज्यों की खुफ़िया एजेंसियों को मजूबत करें ताकि इन गुटों के बारे में ज़रुरी जानकारी हमें मिल सके. समन्वय अभी मिलिट्री इंटेलिजेंस, आईबी, रॉ और राज्य की खुफ़िया एजेंसियों के बीच समनव्य की प्रणाली ठीक तरह से काम कर रहा है क्योंकि नियमित बैठकें होती हैं. इसके बावजूद आतंकावादियों के हर मंसूबे पर विचार करना हमले की उनकी योजना को विफल कर पाना बहुत ही मुश्किल और कठिन काम है. इसमें काफी बुनियादी बातें भी हैं जिसको हमें देखना पड़ेगा. ख़ास तौर से हमने पोटा (आतंकवाद विरोधी कानून) हटा दिया है. इससे जो क़ानूनी प्रावधान है वह काफ़ी कमजोर पड़ गया है. दूसरी बात यह है कि हमारे देश की सीमाएँ सुरक्षित नहीं हैं. कोई भी कहीं से प्रवेश कर सकता है. तीसरी बात पहचान पत्र का है जिससे पता लग सके कि हमारे नागरिक और विदेशी नागरिक में क्या अंतर है. यह हमें जल्दी से जल्दी पता लगना चाहिए और साथ ही साथ सुरक्षा प्रबंध भी कठोर बनाना चाहिए. सीमा पार आतंकवाद बाहर के देशों से भारत में आतंकवादी गतिविधियाँ जारी रखना कोई नई बात नहीं है. मुंबई विस्फोट में दुबई का इस्तेमाल किया गया था जिसमें दाऊद और उसके सहयोगियों का नाम आया है. उसके बाद नेपाल उनका अड्डा बन गया और चार-पाँच साल से बांग्लादेश का इस्तेमाल काफ़ी हो रहा है. दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत में तीनो किस्म के आतंकवाद मौजूद हैं. वैचारिक आतंकवाद जिसमें नक्सलवाद आता है. एथनिक या जातीय जिनमें पूर्वोत्तर के संगठन आते हैं और तीसरा मजहबी आतंकवाद जिनमें इस्लामी संगठन हैं. इसलिए इन सबसे निपटना हमारे लिए मुश्किल ज़रूर है लेकिन कामयाबी भी मिलती है. इस लड़ाई में धीरे-धीरे सफलता मिली है. (आलोक कुमार के साथ बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें 'शांति प्रक्रिया में प्रगति संभव नहीं'29 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस मुशर्रफ़ की आत्मकथा में करगिल भी25 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस जर्मनी में 'आतंकवादी' हमले की चेतावनी20 अगस्त, 2006 | पहला पन्ना आतंकवाद पर चर्चा करेंगे उलेमा17 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस 'आतंकवाद' का पसरता असर 10 नवंबर, 2002 | पहला पन्ना कैसे निबटे भारत चरमपंथ से?21 दिसंबरजनवरी, 2001 | आपकी राय भारतीय संसद पर हमला13 दिसंबरजनवरी, 2001 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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