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शनिवार, 02 सितंबर, 2006 को 19:57 GMT तक के समाचार
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'उन्होंने मेरी कनपटी पर पिस्तौल रख दी...'
करबला
करबला में इमाम हुसैन की पवित्र दरगाह है
इराक़ी शहर करबला के निकट हुए एक हमले में भारत और पाकिस्तान के 14 शिया श्रद्धालु मारे गए हैं. मारे गए श्रद्धालुओं में 11 पाकिस्तान के और तीन भारत के हैं.

हादसे में बचे हुए लोगों में एक टुअर ऑपरेटर सैयदा ज़ैनब भी हैं जो इस हादसे में अपना भाई खो चुकी हैं.

घटना के कुछ समय बाद बीबीसी संवाददाता मुकेश शर्मा से एक ख़ास बातचीत में सैयदा ने विस्तार से बताया कि यह पूरी घटना कैसे घटी.

आइए, जानते हैं उन्हीं की ज़ुबानी-

हमारी टोली में 14 मर्द थे. एक बच्चा था और कुछ महिलाएँ भी थीं.

मुंबई से हम सीरिया पहुँचे और वहाँ जनाबे ज़ैनब की ज़ियारत पूरी की. उसके बाद हम लोगों को जॉर्डन के रास्ते ही आना था. वहाँ से आगे बढ़ने में हमें कोई तकलीफ़ भी नहीं हुई. न ही रास्ते में और न ही सीमा पर.

एक गहरे लाल रंग की गाड़ी आई. इसमें चार लोग सवार थे. चारों ने काले मास्क पहन रखे थे पर ये मास्क इराक़ी पुलिस के मास्क जैसे नहीं थे.

ड्राइवर खाली हाथ था पर बाक़ी के तीनों लोगों के पास दो पिस्तौलें और एक एके-47 राइफ़ल थी. आते ही उन्होंने सबसे पहले मेरी कनपटी पर पिस्तौल लगा दी और 'पुलिस-पुलिस', 'पैसा-पैसा' कह कर चिल्लाने लगे.

 ड्राइवर खाली हाथ था पर बाक़ी के तीनों लोगों के पास दो पिस्तौलें और एक एके-47 राइफ़ल थी. आते ही उन्होंने सबसे पहले मेरी कनपटी पर पिस्तौल लगा दी और 'पुलिस-पुलिस', 'पैसा-पैसा' कह कर चिल्लाने लगे.

इसके बाद उन्होंने जितने भी मर्द बस में सवार थे, सबको लातों से ठोकर मार-मारकर नीचे उतारना शुरू किया.

मेरी कनपटी पर रखी पिस्तौल को हटाकर उन्होंने बस के अंदर ही एक फ़ायर किया. जो हथियारबंद नीचे खड़ा था, उसने भी हवा में एक गोली दागी.

सारे मर्दों को मैदान में उकड़ू बनाकर फ़ैला दिया गया. इसके बाद महिलाओं के कानों तक के जेवर उन्होंने उतरवा लिए. सारे बटुए-पर्स उन्होंने ले लिए. बस में जितना भी सामान था, सब उन्होंने अपने पास रख लिया.

इसके बाद उन्होंने बस ड्राइवर को भी पीटा और फिर कहा कि इन सभी महिलाओँ को लेकर वहाँ से चला जाए.

हमने ड्राइवर से कहा कि कुछ दूरी पर ही रोक दो, हम अपने साथ के लोगों को लेकर ही आगे जाएँगे पर उसने कहा कि पुलिस के पास चलकर रुकना चाहिए और उन्हें यहाँ लेकर आना चाहिए.

पाँच-छह किलोमीटर पर ही पुलिस थी. हम लोगों को वहीं छोड़कर वो ड्राइवर पुलिस के साथ वहाँ गया जहाँ लोगों को रोक लिया गया था.

एक-डेढ़ घंटे के बाद पुलिसवालों के साथ ड्राइवर तो वापस आ गया पर हमारे साथ के लोग वापस नहीं आ सके थे. वजह पूछी तो बताया गया कि सभी लोग और सामान ठीकठाक स्थिति में हैं और पुलिस की कार्रवाई के कारण कुछ वक्त लग रहा है.

 हमने फिर पूछा कि क्या हुआ तो बताया गया कि सब्र करो. साथ ही यह भी बताया गया कि सभी 14 लोगों को मार दिया गया है.

रात भर हम लोग वहीं रहे. पुलिस वालों ने हमें खाना दिया और सोने की जगह भी दी. सुबह फिर पुलिस के साथ हमें करबाला लाया गया. वहाँ पूछने पर भी कोई कुछ साफ़ तौर पर नहीं बता रहा था. बाद में हमने देखा कि मौलाना वगैरह भी पहुँच रहे हैं.

हमने फिर पूछा कि क्या हुआ तो बताया गया कि सब्र करो. साथ ही यह भी बताया गया कि सभी 14 लोगों को मार दिया गया है.

शनिवार को तमाम क़ानूनी कार्यवाही के बाद हमें शव सौंप दिए गए.

ग़लती बस एक बात में हुई और वो यह कि हमारे जो करबला में एजेंट हैं, वो सीमा पर आते थे और अपने सुरक्षा बंदोबस्त के साथ हमें लेकर जाते थे पर इस बार वो नहीं आए. आख़िर में हम ड्राइवर के भरोसे ही आगे बढ़े.

बाद में सभी लोगों को करबला में ही दफ़ना दिया क्योंकि इतनी अच्छी व्यवस्था थी नहीं कि हम लोगों के शवों को वापस ला पाते.

अब यहाँ से हम लोग ईरान जाएँगे. वहाँ की ज़ियारत पूरी करेंगे और फिर वहाँ से वापस मुंबई. बाकी बचे लोगों के परिवार वालों से उनकी टेलीफ़ोन पर बात करा दी है.

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