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बुधवार, 16 अगस्त, 2006 को 16:56 GMT तक के समाचार
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लेबनान में शांतिरक्षा सेना की मुश्किलें
लेबनान
दक्षिणी लेबनान में इसराइली हमले में भारी तबाही हुई है
इसराइल और हिज़्बुल्लाह के बीच युद्धविराम लागू है लेकिन आगे फिर समस्याएँ न उठ खड़ी हों इसके लिए वहाँ तैनात हो रही है संयुक्त राष्ट्र के शांतिरक्षा सेना जिसमें लेबनान की सेना भी शामिल होगी और इनकी कुल संख्या होगी लगभग पंद्रह हज़ार.

इस समय इसराइली सेना लीतानी नदी और इसराइल की सीमा के बीच है. इन्हें पीछे हटना होगा और उनकी जगह शांतिसेना आएगी.

लेकिन पीछे हटना होगा – हिज़्बुल्लाह को भी. हिज़्बुल्लाह इसराइली सेना की तरह तो है नहीं.

हिज़्बुल्लाह के लड़ाके आम लोगों की तरह रहते हैं, रोज़ का काम करते हैं और गुरिल्ला लड़ाकों की तरह हमले कर फिर आम लोगों में घुलमिल जाते हैं.

इन हिज़्बुल्लाह छापामारों का क्या होगा? इनके पास जो हथियार हैं उनका क्या होगा? हिज़्बुल्लाह लेबनान सरकार में भी शामिल है लेकिन उसने अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वो दक्षिणी लेबनान से अपने छापामारों को हटा लेगा.

तो इस तरह संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव नंबर 1701 पास तो हो गया है लेकिन ज़मीन पर इसका असर दिखने में जैसे कि शांतिसेना के सैनिक तैनात होने में कुछ हफ़्तों का समय लग सकता है.

माना जा रहा है कि आने वाले दस पंद्रह दिनों में ही सिर्फ़ 3,500 हज़ार सैनिक ही तैनात हो सकेंगे और उसके बाद चरणबद्ध तरीके से बाक़ी सैनिक तैनात किए जा सकेंगे जिसमें फ़्राँस की महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

ये मसले बड़े पेचीदे हैं और इन्हीं पर बात करने के लिए बुधवार को कई अहम बैठकें हुई हैं. एक बैठक है लेबनान सरकार के मंत्रिमंडल की और एक दूसरी बैठक फ़्राँस के विदेश मंत्री फ़िलिप दूस्त ब्लाज़ी की जिनके बाद कई और देशों के प्रतिनिधि लगातार लेबनान सरकार से बात कर रहे हैं.

यहाँ सवाल ये भी है कि कोशिश हो रही है कि मुस्लिम देशों के सैनिकों को मिलाकर शांतिरक्षक सेना बनाई जाए.

जिन देशों से इस विषय में बात चल रही है वे हैं – तुर्की, इंडोनेशिया, मलेशिया, मोरक्को और पाकिस्तान. लेकिन इसमें भी समस्याएँ हो सकती हैं – इसराइल को जो देश मान्यता ही नहीं देते उनके शांतिरक्षक बनने पर इसराइल को आपत्ति हो सकती है.

साथ ही ये भी देखना होगा कि इन मुस्लिम देशों में लोग इस इलाक़े में शांतिसेना भेजने के बारे में क्या कहते हैं?

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