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इराक़ी संसद ने फ़ैसला बदला | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ी संसद ने पहले का अपना वो फ़ैसला बदल दिया है जिसमें संविधान पर अगले सप्ताह होने वाले जनमंतसंग्रह के नियमों में कुछ फेरबदल की बात कही गई थी. संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने संविधान पर जनमत संग्रह संबंधी नियमों में बदलाव की आलोचना की थी. इस फेरबदल के बाद इराक़ के प्रस्तावित संविधान को ठुकराना देश की जनता के लिए मुश्किल हो जाता. पहले नियम यह रखा गया था कि अगर देश के तीन प्रांतों में कुल मतदान का दो-तिहाई हिस्सा संविधान के ख़िलाफ़ होगा, तो उसे मंज़ूरी नहीं मिलेगी. लेकिन संसद ने नया नियम ये बनाया था कि देश के कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या का दो-तिहाई मत संविधान के ख़िलाफ़ होगा तभी उसे नामंज़ूर माना जाएगा. यानी फ़ैसला वास्तविक मतदान के आधार पर नहीं बल्कि मतदान करने योग्य व्यक्तियों की संख्या के आधार पर होना था. संसद ने एक संक्षिप्त बहस के बाद 119-28 से वो फ़ैसला बदल दिया. संसद के 275 में से क़रीब आधे सदस्यों ने मतदान में हिस्सा लिया, हालाँकि कोरम था. संसद में शिया और कुर्द पार्टियों का बहुमत है और ये पार्टियाँ नए संविधान का समर्थन करती हैं जबकि सुन्नी नेताओं ने संविधान को मंज़ूरी नहीं दी है. |
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