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संयुक्त राष्ट्र ने कहा 'फेरबदल अनुचित' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र ने इराक़ संविधान पर जनमत संग्रह संबंधी नियमों में बदलाव की आलोचना की है, इस फेरबदल के बाद इराक़ के प्रस्तावित संविधान को ठुकराना देश की जनता के लिए मुश्किल हो जाएगा. पहले नियम यह रखा गया था कि अगर देश के तीन प्रांतों में कुल मतदान का दो-तिहाई हिस्सा संविधान के ख़िलाफ़ होगा तो उसे मंज़ूरी नहीं मिलेगी. लेकिन नया नियम ये है कि देश के कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या का दो-तिहाई मत संविधान के ख़िलाफ़ होगा तभी उसे नामंज़ूर माना जाएगा. यानी फ़ैसला वास्तविक मतदान के आधार पर नहीं बल्कि मतदान करने योग्य व्यक्तियों की संख्या के आधार पर होना है. रविवार को शिया और कुर्द नेताओं के दबाव के बाद संसद में यह नया नियम स्वीकार किया गया था लेकिन सुन्नी अरब सांसदों ने इसका पुरज़ोर विरोध किया था. इस बात की भी पूरी आशंका है कि हिंसा के डर से बहुत सारे लोग संविधान पर होने वाले जनमत संग्रह में वोट डालने के लिए सामने नहीं आएँगे. आलोचना इराक़ में जनमत संग्रह के मामले पर संयुक्त राष्ट्र के क़ानूनी सलाहकार होसे अराज़ान ने कहा है, "हमने इराक़ी संसद और सरकार के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है." संयुक्त राष्ट्र के सलाहकार का कहना है कि "संसद का यह फ़ैसला मानने लायक़ नहीं है और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के प्रतिकूल है." उन्होंने आशा व्यक्त की कि अगले कुछ दिनों में स्थिति स्पष्ट हो जाएगी. इराक़ी संविधान पर जनमत संग्रह कराए जाने का उद्देश्य यही था कि अल्पसंख्यक सुन्नी समुदाय को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल किया जाए ताकि सुन्नी विद्रोहियों को मिलने वाले समर्थन में कमी आए. एक प्रमुख सुन्नी नेता सालेह अल मुत्लाक ने कहा, "वे जनता की इच्छा के ख़िलाफ़ संविधान को पारित कराना चाहते हैं." अब सुन्नी गुट इस पूरे बदलाव को 'राजनीतिक जालसाज़ी' कह रहे हैं, ऐसे लगता नहीं है कि मामला आसानी से सुलझने वाला है. |
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