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गुरुवार, 22 सितंबर, 2005 को 12:36 GMT तक के समाचार
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ईरान-इराक़ युद्ध : एक विश्लेषण

ईरान-इराक़ युद्ध
वह युद्ध दोनों देशों के नेताओं के लिए नाक की लड़ाई बन गया था.
इराक़ ने 22 सितंबर 1980 को ईरान पर हमला किया जिससे दोनों देशों के बीच शुरू हुई दुश्मनी आठ साल तक चली और इस दुश्मनी ने न सिर्फ़ मध्य पूर्व क्षेत्र को अस्थिर किया बल्कि दोनों देशों का भारी नुक़सान हुआ.

उस वक़्त इराक़ के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने हमले का कारण शत अल अरब नहर पर विवाद को बताया था जो दोनों देशों के बीच सीमा भी निर्धारित करती थी.

लेकिन संघर्ष का असल मुद्दा क्षेत्रीय संघर्ष था.

सद्दाम हुसैन को दरअसल ईरान में हुई इस्लामी क्रांति से ख़तरा महसूस हो रहा था. दरअसल 1979 में हुई इस्लामी क्रांति के ज़रिए ही आयतुल्ला ख़ुमैनी सत्ता में आए थे.

आयतुल्ला सद्दाम हुसैन को एक ऐसा सुन्नी क्रूर शासक मानते थे जो अपने देश के शिया समुदाय का दमन कर रहा था. आयतुल्ला ख़ुमैनी ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने की अपनी इच्छा को भी नहीं छुपाया.

इसलिए सद्दाम हुसैन के लिए युद्ध का मतलब था - इससे पहले कि आयतुल्ला ख़ुमैनी की सत्ता ख़ुद उनके लिए ख़तरा बन जाए,ख़ुमैनीकी सत्ता को पहले ही उखाड़ फेंकना.

सद्दाम हुसैन का मानना था कि ईरान उस वक़्त अस्थिरता के दौर से गुज़र रहा था और इराक़ी सेनाओं को जीत हासिल करने में ज़्यादा देर नहीं लेगगी.

लेकिन वस्तुस्थिति का यह अंदाज़ा लगाना दरअसल एक ग़लती थी.

नाक की लड़ाई

1982 तक आते-आते ईरानी सेनाओं ने उस क्षेत्र पर फिर से अपने क़ब्ज़े में ले लिया था जिसे इराक़ी सेनाओं ने क़ब्ज़ा लिया था. इतना ही नहीं ईरानी सेनाएं इराक़ के काफ़ी अंदर तक घुस गई थीं.

तब इराक़ ने युद्ध विराम की पेशकश की थी जिसे ईरान ने नामंज़ूर कर दिया था.

इस तरह युद्ध शुरू तो इराक़ ने किया था लेकिन इसे लंबा खींचने का फ़ैसला ईरानी नेता आयतुल्ला ख़ुमैनी ने किया.

ईरान-इराक़ युद्ध का असर
इस युद्ध में दोनों देशों के लाखों लोगों को अपनी जानें गँवानी पड़ी थीं

इस वक़्त तक आते-आते यह युद्ध एक तरह से नाक की लड़ाई में तब्दील हो चुका था और दोनों ही पक्ष इस युद्ध की मानवीय क़ीमत की अनदेखी कर रहे थे.

ख़ुमैनी ने हज़ारों ईरानी युवकों को 'मानव हमलों' की रणनीति के तहत लड़ाई के मैदान में भेजा जो मारे भी गए.

सद्दाम हुसैन ने ईरानियों के ख़िलाफ़ रसायनिक हथियारों का प्रयोग किया.

शहरों की लड़ाई में दोनों देशों की सेनाओं ने एक दूसरे के प्रमुख शहरों पर बमबारी की जिसमें आम लोग भी प्रभावित हुए.

टैंकरों की लड़ाई में दोनों देशों ने खाड़ी में एक दूसरे के तेल टैंकरों और व्यापारी जहाज़ों को निशाना बनाया. इसका मक़सद व्यापारिक हितों को तहस-नहस करना था.

दरअसल टैंकर युद्ध ने दोनों देशों के संघर्ष का अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया.

कुवैत ने अपने जहाज़ों पर ईरान के लगातार हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय जगत से सुरक्षा की अपील की और तब अमरीका और सोवियत संघ ने हस्तक्षेप किया.

इस वक़्त तक पासा ईरान के ख़िलाफ़ पलट चुका था.

ईरानी अधिकारियों ने जब देखा कि उनका देश न सिर्फ़ भारी क़ीमत चुका रहा है बल्कि अलग-थलग भी पड़ने लगा है तो उन्होंने ख़ुमैनी से युद्ध विराम की पेशकश को स्वीकार करने की अपील की.

जब जुलाई 1988 में आख़िरकार युद्ध विराम हो गया तब आयतुल्ला ख़ुमैनी ने कहा था कि यह उनके लिए ज़हर का प्याला पीने जैसा था.

युद्ध की क़ीमत

आठ साल तक चले इस युद्ध का ख़ामियाज़ा बहुत बड़ा था. लगभग पाँच लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. कुछ अनुमान तो मृतकों की संख्या 15 लाख तक होने के भी लगाए गए हैं.

ईरान-इराक़ युद्ध

किसी भी देश को वे उद्देश्य हासिल नहीं हुए जिनकी वजह से युद्ध शुरू हुआ था या फिर लंबा चला. न तो आयतुल्ला ख़ुमैनी सद्दाम हुसैन को और न ही सद्दाम हुसैन आयतुल्ला ख़ुमैनी को सत्ता से हटा सके.

सद्दाम हुसैन का यह मक़सद भी पूरा नहीं हो सका था कि दोनों देशों के बीच की सीमा को इराक़ के हित में फिर से निर्धारित किया जाए.

हालाँकि इराक़ी नेता सद्दाम हुसैन ने अपनी जीत होने का दावा किया था लेकिन असल में स्थिति ये थी कि वह सिर्फ़ अपनी हार से बच गए थे, और उसके लिए भी उन्हें व्यापक बाहरी मदद की ज़रूरत पड़ी थी.

इराक़ पर इस युद्ध का जो असर हुआ था उसी की वजह से सद्दाम हुसैन ने 1990 में कुवैत पर हमला करने का फ़ैसला किया.

बस उसी मोड़ पर उन क्षेत्रीय और पश्चिमी देशों ने इराक़ के ख़िलाफ़ मोर्चा बना लिया जो ईरान के साथ उसकी लड़ाई में उसके साथ थे.

ईरान के लिए भी युद्ध के नतीजे कुछ कम भयावह नहीं थे.

इस युद्ध से भारी मानवीय क़ीमत तो चुकानी पड़ी ही, इसका व्यापक आर्थिक नुक़सान भी हुआ.

युद्ध की वजह से ही बहुत से ईरानियों ने धार्मिक नेताओं की क्षमता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे.

युद्ध ख़त्म होने के कुछ ही समय बाद आयतुल्ला ख़ुमैनी का निधन हो गया ईरान में एक नया दौर शुरू हुआ जिसमें स्वमूल्यांकन किया गया.

ईरान-इराक़ युद्ध ने बहुद दर्दनाक यादें छोड़ीं. आधुनिक काल में कम ही ऐसे युद्ध हुए हैं जो इतने लंबे चले और जो इतने हिंसक और भयावह रहे.

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