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ईरान-इराक़ युद्ध की 25 वीं बरसी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ईरान और इराक़ के बीच 1980 में शुरू हुए युद्ध की गुरूवार को 25वीं बरसी पर उन दिनों को याद किया गया. ग़ौरतलब है कि दोनों देशों के बीच वह युद्ध आठ साल तक चला था जिसमें लाखों लोग मारे गए थे. युद्ध की पच्चीसवीं बरसी पर ईरान की राजधानी तेहरान में गुरूवार को एक विशेष सैन्य परेड आयोजित हुई जिसे राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने संबोधित किया. महमूद अहमदीनेजाद ने कहा कि जो भी कोई ईरान के सम्मान की परीक्षा लेगा उसे पता चल जाएगा कि देश के क्रोध की आग कितनी गरम और विध्वंसकारी है. राष्ट्रपति के ये विचार ऐसे समय में आए हैं जब ईरान पर परमाणु कार्यक्रम को लेकर काफ़ी अंतरराष्ट्रीय दबाव है. उन्होंने किसी का स्पष्ट रूप से तो ज़िक्र नहीं किया लेकिन कहा कि ईरान किसी और देश के हितों के लिए कोई ख़तरा पैदा नहीं करता लेकिन अगर अपने देश के सम्मान और स्वतंत्रता की मज़बूती से हिफ़ाज़त की जाएगी. नई इराक़ी सरकार ने 1980 में ईरान पर हुए हमले के लिए औपचारिक रूप से माफ़ी मांगी है. जब सितंबर 1980 में इराक़ के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने अपनी सेनाएँ ईरान में भेजी थी तो उन्हें भरोसा था कि युद्ध जल्दी ही समाप्त हो जाएगा. लेकिन यह युद्ध काफ़ी लंबा चला और बहुत हिंसक रहा जिसमें क़रीब दस लाख लोगों की जान गई. ईरान सरकार उस युद्ध के लिए सद्दाम हुसैन पर आरोप तैयार कर रही है. उस युद्ध में इराक़ ने रसायनिक हथियारों का भी इस्तेमाल किया था. इराक़ ने उस युद्ध के लिए ईरान के साथ सीमा विवाद को कारण बताया लेकिन ईरान में इस्लामी गतिविधियों और इराक़ में सद्दाम हुसैन सरकार के हाथों शियाओं के दमन का भी मुद्दा था. अमरीका, सोवियत संघ और बहुत से यूरोपीय देशों ने इराक़ का साथ दिया था क्योंकि उन्हें डर था कि अगर ईरान जीत जाता है तो उससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है. |
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