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नए संविधान का मसौदा संसद में पेश हुआ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ में नए संविधान के मसौदे पर संविधान तैयार करने वाली समिति ने हस्ताक्षर कर दिए हैं. समिति के सुन्नी अरब सदस्यों ने दस्तख़त नहीं किए. संविधान के मसौदे को आज वहां की संसद में पेश किया जा रहा है जबकि इस पर सुन्नी नेताओं की सहमति हासिल नहीं की जा सकी है. आख़िरी समय तक सुन्नी नेता यही कहते रहे हैं कि उन्हें संविधान का मसौदा मंज़ूर नहीं है, शिया और कुर्द नेताओं का कहना है कि उनके बीच मसौदे पर सहमति बन चुकी है. इराक़ी संसद के सभापति हाजिम अल हसनी ने घोषणा की है कि नेशनल एसेंबली यानी संसद की बैठक रविवार को होगी जिसमें सांसदों के सामने संविधान का मसौदा रखा जाएगा. हसनी ख़ुद भी एक सुन्नी नेता हैं. इराक़ी संसद में शिया और कुर्दों का बहुमत है और इस बात की संभावना है कि वे इस मसौदे को पारित कर दें, इसके बाद अक्तूबर महीने में इस पर जनमत संग्रह कराया जाएगा. संभावना है कि रविवार को संसद में मसौदा पेश किए जाने से पहले सुन्नी नेताओं से बैठक करके गतिरोध को दूर करने की एक अंतिम कोशिश की जाएगी. रियायतें हसनी ने बताया है कि शनिवार को शिया और कुर्द नेताओं ने देश के संघीय ढाँचे के सवाल पर सुन्नियों को कुछ रियायत देने की घोषणा की है. लेकिन सुन्नी प्रतिनिधि सालेह अल मुत्लाक का कहना है कि यह रियायत काफ़ी नहीं है और संसद को ही इसका फ़ैसला करना होगा.
सुन्नी नेताओं को आशंका है कि अगर संघीय ढाँचा अपनाया गया तो देश के दक्षिणी हिस्से में शिया स्वायत्त क्षेत्र बन जाएगा जो ईरान के प्रभाव में आ जाएगा, उत्तरी हिस्सा कुर्दों के नियंत्रण में है और वह पहले से ही स्वायत्त रहा है. इसके अलावा सुन्नियों को लगता है कि शिया और कुर्द एकजुट हो गए हैं और सत्ता पर उनका पूरी तरह नियंत्रण हो जाएगा जबकि सुन्नी मुसलमान अलग थलग पड़ जाएँगे. तेल से होने वाली कमाई के बँटवारे का भी सवाल है, इराक़ में तेल के कुएँ ज्यादातर उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों में हैं जबकि सुन्नी आबादी मध्य इराक़ में बसती है इसलिए उन्हें लगता है कि तेल पर उनका नियंत्रण नहीं रह जाएगा. इराक़ में अमरीका के दूत ज़ल्मै ख़लीलज़ाद ने शनिवार को दोनों पक्षों के मुख्य वार्ताकारों से मुलाक़ात की और कोई समझौता कराने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी. उन्होंने शिया धार्मिक नेताओं से भी अपील की कि वे इस मामले में मदद करें. इराक़ में बीबीसी संवाददाता का कहना है कि अगर संविधान पर सुन्नी असहमत रहे तो अमरीका के लिए बहुत कठिनाइयाँ होंगी क्योंकि देश में राजनीतिक स्थिरता की संभावना नहीं रह जाएगी और उस स्थिति में अमरीकी सेना वहाँ से नहीं निकल पाएगी. |
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