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गुरुवार, 06 जनवरी, 2005 को 13:42 GMT तक के समाचार
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कितनी कारगर है चेतावनी प्रणाली?
प्रशांत महासागर में चेतावनी प्रणाली
प्रशांत महासागर में प्रणाली काम कर रही है
सूनामी लहरों से मची अभूतपूर्व तबाही के बाद अब दुनिया भर में इस बात पर चर्चा चल रही है कि अगर समय रहते चेतावनी दी जा सकती तो शायद हज़ारों जानें बच सकती थीं.

अब भारत और इंडोनेशिया जैसे देश सोच रहे हैं कि भविष्य ऐसा नुक़सान न हो इसके लिए चेतावनी प्रणाली हिंद महासागर में भी लगाई जानी चाहिए, इस काम में सहयोग का वादा जापान ने भी किया है.

प्रशांत महासागर में सूनामी की चेतावनी देने वाली प्रणाली पहले से मौजूद है जो समय रहते लहरों के उठने की ख़बर दे सकती है.

लेकिन सारी चुनौती इस बात की है कि कंट्रोल रूम में सूचना मिलने के बाद दूर-दराज़ के इलाक़ों में फौरन पहुँचाई जा सके और लोगों को ख़तरे वाली जगह से हटाया जा सके.

प्रमुख ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक फिल मैकफैडेन कहते हैं, "अत्याधुनिक चेतावनी प्रणाली लगाने मोटी रक़म खर्च करने से तब तक कुछ हासिल नहीं होगा जब तक चेतावनी को लोगों तक जल्दी पहुँचाने का पुख़्ता इंतज़ाम न हो."

वे कहते हैं, "इसके लिए बहुत सारा काम करना होगा, अगर सूनामी से जुड़ी चेतावनी हो तो उसे समुद्र तट के आख़िरी छोर तक पहुँचाना होगा, यह काफ़ी कठिन होगा."

उपयोगिता

प्रशांत महासागर में चेतावनी प्रणाली पहले से मौजूद है, 1960 के दशक में जब कई बार सूनामी लहरों ने हमला बोला था तब समय पर चेतावनी मिलने से जान-माल को बचाने में भारी मदद मिली थी.

 अत्याधुनिक चेतावनी प्रणाली लगाने मोटी रक़म खर्च करने से तब तक कुछ हासिल नहीं होगा जब तक चेतावनी को लोगों तक जल्दी पहुँचाने का पुख़्ता इंतज़ाम न हो
ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक

अलास्का में सूनामी चेतावनी केंद्र के प्रमुख पॉल विटमोर कहते हैं, "मैं कोई पक्की संख्या तो नहीं बता सकता लेकिन प्रशांत महासागर में लगी प्रणाली के कारण बहुत सारी जानें बची हैं."

प्रशांत महासागर में लगी प्रणाली पर लाखों डॉलर की लागत आई थी लेकिन अब वैज्ञानिक मानते हैं कि यह एक सही फ़ैसला था.

इसके काम करने का तरीक़ा बड़ा आसान है, समुद्र तल में एक प्रेशर सेंसर लगा होता है जो ऊपर मौजूद पानी का वज़न लेता रहता है, अगर सूनामी लहरें उठती हैं तो पानी का दबाव बढ़ जाता है जिसे यह सेंसर पकड़ लेता है.

यह सेंसर समुद्र के पानी की सतह पर लगे अपने स्टेशन को सिग्नल भेजता है जिसे यह स्टेशन उपग्रह की ओर बढ़ा देता है जो कंट्रोल रूम को चेतावनी देता है, कंट्रोल रूम से जानकारी जनता तक पहुँचा दी जाती है.

चुनौतियाँ

जैसा कि विटमोर कहते हैं, "प्रणाली का काम होगा कंट्रोल रूम तक चेतावनी पहुँचाना लेकिन उसके बाद क्या होगा? उसके बाद आपको चेतावनी का प्रसारण करने की अलग प्रणाली विकसित करनी होगी."

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दूर दराज़ के इलाक़ों में कैसे पहुँचेगी चेतावनी?

वे पूछते हैं, "मान लीजिए, जकार्ता के कंट्रोल रूम को सूनामी की ख़बर मिल जाए तो वह सुमात्रा के मछुआरों, श्रीलंका के पर्यटकों और निकोबार के कबीलों को कैसे सूचित करेंगे?"

इनमें से ज़्यादातर जगहों पर टीवी, रेडियो और फ़ोन के भरोसे नहीं रहा जा सकता, इसलिए ऐसे साधन खड़े करने होंगे जिनके ज़रिए हर व्यक्ति तक पहुँचा जा सके भले ही वह कितनी भी दूर क्यों न हो.

इस बार भी ऐसा ही हुआ, जब इंडोनेशिया में भूकंप आया तो जानकारों को पता था कि सूनामी की आशंका है लेकिन उनके पास लोगों को आगाह करने का कोई ज़रिया नहीं था.

यहाँ तक कि प्रशांत महासागर में लगी प्रणाली ने सूनामी के संकेत पकड़ लिए थे, उन्होंने इंडोनेशिया के अधिकारियों को आगाह भी किया था लेकिन चेतावनी को आगे बढ़ाने का कोई तरीक़ा नहीं था.

ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में एक दफ़्तर में लगे शक्तिशाली कंप्यूटरों ने भी सूनामी के संकेतों को ग्रहण किया था, इन कंप्यूटरों का काम दुनिया में कहीं भी होने वाले परमाणु धमाकों को दर्ज करना है लेकिन भूगर्भीय गतिविधियों पर भी निगरानी रखने में ये कंप्यूटर सक्षम हैं.

सूनामी क्रिसमस के अगले दिन आया था इसलिए दफ़्तर में छुट्टी थी और चेतावनी को आगे नहीं बढ़ाया जा सका.

इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंद महासागर में चेतावनी प्रणाली लगाए जाने की ज़रूरत है लेकिन असली बात है कि चेतावनी उन तक पहुँच सके जिन्हें इसकी ज़रूरत है.

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