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बुधवार, 05 जनवरी, 2005 को 23:40 GMT तक के समाचार
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सहायता राशि के उपयोग पर सवाल?
इंडोनेशिया का आचे प्रांत
पुनर्वास में कई वर्ष लग सकते हैं
सूनामी आपदा से राहत के लिए जिस विशाल स्तर पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता सामने आई है वह अभूतपूर्व है लेकिन ऐसे सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या यह सहायता वास्तव में ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँच पाएगी.

शुरू में भले ही अमरीका ने ज़्यादा उत्साह नहीं दिखाया पर बाद में उसने भी बड़ी उदारता दिखाई है पर राहत कर्मचारी इस मामले में सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं क्योंकि पहले भी मानवीय सहायता के कई वादे किए गए, जो वास्तव में पूरे नहीं हुए.

सूनामी प्रभावितों की मदद के मुद्दे पर विचार के लिए गुरूवार को इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में एक दिन का सम्मेलन हो रहा है.

संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया भर से अपील की है कि हिंद महासागर में आई प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोगों की मदद के लिए होड़ में दक्षिण अफ्रीका के लोगों को भुलाया नहीं जाना चाहिए.

वादे और मदद

पहले जब भी अमीर देशों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने राहत के वादे किए उससे कम सहायता देखने में आई. बांग्लादेश और मोज़ांबिक की बाढ़ और गुजरात का भूकंप और 2003 में ईरान के बाम शहर में भूकंप के दौरान भी यही देखने में आया.

तालेबान के पतन के बाद अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण के लिए 70 करोड़ डॉलर का वादा किया गया जबकि इसके आधे से कम धनराशि ही नसीब हो पाई. इसे लेकर सहायता संगठनों में बहुत रोष भी था.

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि एशियाई सूनामी से पीड़ितों की राहत के लिए तीन से चार अरब डॉलर के बीच सहायता के वादे किए गए हैं. संयुक्त राष्ट्र आपात राहत संयोजक ईयान एगलैंड का मानना है कि ये अनुदान असाधारण है.

वे कहते हैं, “हमारे रिकॉर्ड्स के अनुसार तीन से चार अरब डॉलर की राहत सहायता के वादे किए जा रहे हैं. यह दिखाता है कि दुनिया के लोग किस तरह एक दूसरे के नज़दीक आ रहे हैं जैसी हमने कभी कल्पना ही नहीं की थी, जैसा हमने कभी देखा ही नहीं था.”

पर एक महत्वपूर्ण बात ये भी है कि इतनी विशाल सहायता के समन्वय का कोई निश्चित तरीक़ा नहीं है. राहत संगठनों की एक और चिंता ये है कि सूनामी से उपजा मलबा व तोड़फ़ोड़ की साफ़ सफ़ाई में राहत का काफ़ी धन ख़र्च हो जाएगा.

बहरहाल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की पूर्व संध्या पर जर्मनी, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने सूनामी के लिए राहत में भारी वृद्धि कर इस त्रासदी के निवारण के लिए और आशा का संचार किया है.

अब नज़र इस बात पर होगी कि जकार्ता सम्मेलन में संगठित रूप से क्या सामने आता है.

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