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खींचतान के बाद इराक़ प्रस्ताव पारित | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
30 जून को सत्ता हस्तांतरण के बाद इराक़ के भविष्य के बारे में सुरक्षा परिषद में पेश किया गया अमरीकी प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया है. फ्रांस और जर्मनी ने इस प्रस्ताव पर यह कहते हुए आपत्ति जताई थी कि सत्ता हस्तांतरण के बाद इराक़ में रहने वाली विदेशी सेनाओं पर सरकार के नियंत्रण के बारे में प्रावधान स्पष्ट होने चाहिए. अब प्रस्ताव में यह प्रावधान तो है कि इराक़ सरकार चाहे तो विदेशी सेनाओं को वापस भेज सकती हैं लेकिन ऐसा होने की बहुत कम संभावना है. प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि इराक़ी संसाधनों पर वहीं के लोगों का अधिकार है और इराक़ के राजनीतिक मामलों में संयुक्त राष्ट्र की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है. प्रस्ताव पारित होने के बाद संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने कहा कि पिछले साल के मतभेदों के बाद इस प्रस्ताव के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की इच्छा व्यक्त हुई है. फ्रांस की माँग थी कि इराक़ी सरकार को विदेशी सेनाओं के अभियानों को वीटो करने का अधिकार होना चाहिए. अमरीका और ब्रिटेन फ्रांस की माँग के आधार पर प्रस्ताव में संशोधन करने के लिए राज़ी हो गए थे जिसके बाद प्रस्ताव के सर्वसम्मति से पारित होने का रास्ता साफ़ हो गया था. अमरीका और ब्रिटेन ने इसके लिए राज़ी होते हुए कहा था कि इराक़ी सरकार और अमरीकी नेतृत्व वाली विदेशी सेनाओं के संबंधों के बारे में ज़्यादा विस्तार से प्रावधान किए जाएंगे. संयुक्त राष्ट्र में मौजूद बीबीसी संवाददाता सुसाना प्राइस का कहना है कि इस राज़ीनामे के बाद प्रस्ताव पर सभी 15 सदस्यों के मत हासिल होने का रास्ता साफ़ हो गया था और उसी तर्ज़ पर मतदान हो भी गया. प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कराने के लिए अमरीका और ब्रिटेन को क़रीब एक पखवाड़े तक कड़ी मेहनत करनी पड़ी और मसौदे में पाँच बार संशोधन करने पड़े. यहाँ तक कि मंगलवार को भी अंतिम समय तक इस बारे में मतभेद बने हुए थे कि अमरीका और ब्रिटेन क्या फ्रांस की इस आपत्ति को प्रस्ताव में जगह देंगे कि इराक़ी सरकार को विदेशी सेना की कार्रवाइयों पर वीटो का अधिकार होना चाहिए. फ्रांस और जर्मनी ने वीटो की बात में कुछ नरमी लाते हुए कहा था कि विदेशी सेनाओं के किसी भी अभियान के लिए इराक़ी सरकार की सहमति हासिल होना ज़रूरी होना चाहिए.
अमरीका और फ्रांस ने इसमें कुछ संशोधन करते हुए यह व्यवस्था की कि विदेशी सेनाओं और इराक़ी सरकार संवेदनशील अभियानों के बारे में किस तरह से सहमति बनाएंगे, उसकी एक नीति बनाई जाएगी. इस तरह प्रस्ताव में इस बारे में अब भी साफ़तौर पर नहीं कहा गया है कि आख़िरी फ़ैसला किसका होगा लेकिन अमरीकियों ने साफ़ कह दिया है कि उनकी सेनाएं ख़ुद के ही नियंत्रण में रहेंगी. फ्रांस ने कहा है कि इराक़ के भविष्य के बारे में यह पहली बातचीत है. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ऐसा लगता है कि सुरक्षा परिषद में पिछले साल जो गहरे मतभेद पैदा हो गए थे, वे अब कुछ कम होने लगे हैं. निर्णय अमरीका और ब्रिटेन ने पहले स्पष्ट कर दिया था कि वे अपनी सेना का नियंत्रण इराक़ी सरकार के हाथ में देने को तैयार नहीं हैं. फ्रांस लगातार माँग कर रहा था कि इराक़ी अंतरिम सरकार के पास विदेशी सेना को लेकर कुछ तो अधिकार होने ही चाहिए. फ्रांसीसी विदेश मंत्री ने कहा था कि उनकी सरकार को प्रस्ताव पर अब भी कुछ आपत्तियाँ हैं लेकिन वे इसका विरोध नहीं करेंगे. जर्मनी के विदेश मंत्री जॉस्का फ़िशर ने भी इस प्रस्ताव का स्वागत करते हुए कहा था कि वे इसके पक्ष में वोट डालेंगे. रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने कहा था, "प्रस्ताव में किए गए बदलाव बेहतरी की तरफ़ ले जाएँगे. मुझे पूरा विश्वास है कि इस क़दम के परिणाम सकारात्मक ही होंगे." चीन के विदेश मंत्री ने भी कहा था कि वे इस प्रस्ताव पर समर्थन देने की दिशा में बढ़ रहे हैं. |
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