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प्रोफ़ेसर लोखंडे बताते हैं कि अंबेडकर ने अपने विचार और काम, दोनों ही स्तर पर दलित समाज को जो दिया है, वैसा योगदान किसी और का नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वरिष्ठ स्तंभकार और लेखक मुद्राराक्षस बता रहे हैं कि दलित समाज में बहिष्कृत रहे हैं और उनकी सामाजिक स्थिति दासों से भी बदतर रही है. | प्रोफ़ेसर तुलसीराम कहते हैं कि आज के दलित नेता भटक गए हैं और इनका उद्देश्य राजनीतिक लाभ और उसके ज़रिए आर्थिक लाभ पाना रह गया है. | दलित नेता उदित राज मानते हैं कि आज के दौर में दलित आंदोलन की जो दिशा होनी चाहिए थी, वो तो नहीं है लेकिन आंदोलन चल रहा है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||