BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 09 सितंबर, 2005 को 05:06 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मंडल आयोग ने पूरा किया सपना

सौमित्र मोहन
सौमित्र मोहन मानते हैं कि मंडल ने सामाजिक स्तर पर बदलाव किए हैं
मैं न सिर्फ़ अपने परिवार में बल्कि अपने ख़ानदान की कई पीढ़ियों में उन कुछ लोगों में से हूँ जिन्हें सरकारी नौकरी मिली.

और शायद पहला व्यक्ति हूँ जो भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में आया. इसकी वजह से न सिर्फ़ मेरा अपना परिवार, बल्कि मेरे दायरे में जितने लोग आते हैं, वो सब काफ़ी सम्मानित और गौरवान्वित महसूस करते हैं.

एक परिवार में किसी का आईएएस होना समाज में परिवार की इज़्ज़त को वास्तव में काफी बढ़ा देता है. मेरे परिवार वाले आज इस बात को मानते हैं कि मेरी वजह से समाज में उनकी प्रतिष्ठा काफ़ी बढ़ गई है.

मंडल का योगदान

मैं एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से हूँ.

शुरु से ये बात दिमाग़ में ज़रुर थी कि मुझे कुछ बनना है, लेकिन पृष्ठभूमि की वजह से इस बात का अहसास, कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में भी जाया सकता है – थोड़ी देर से हुआ.

ज़ाहिर है कि मैंने इस प्रक्रिया की शुरुआत भी देर से की.

 वैसे तो मेरा दाख़िला भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में हुआ था. लेकिन सिर्फ़ पिछड़ा वर्ग से होने के कारण मेरी रैंकिंग को बढ़ा दिया गया और मुझे भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईपीएस) में जाने का अवसर मिला

चूँकि भारतीय प्रशासनिक सेवा देश की कठिनतम परीक्षाओं में से एक है, तो मुझे तैयारी के लिए समय भी चाहिए था जो कि मंडल कमीशन लागू होने की वजह से मुझे मिला.

अगर मैं सामान्य श्रेणी से आवेदन करता तो प्रशासनिक सेवा की जो आयु सीमा थी, उसके अंदर मेरा प्रवेश नहीं हो पाता.

मंडल कमीशन के लागू होने की वजह से न सिर्फ निम्न मध्यमवर्गीय लोगों की आयु सीमा दी गई बल्कि परीक्षा में ज़्यादा बार शामिल हो सकने का अवसर भी मिला, जिसका मुझे फ़ायदा मिला.

और शायद इन्ही कारणों की वजह से मैं पास हो पाया.

वैसे तो मेरा दाख़िला भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में हुआ था. लेकिन सिर्फ़ पिछड़ा वर्ग से होने के कारण मेरी रैंकिंग को बढ़ा दिया गया और मुझे भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईपीएस) में जाने का अवसर मिला.

सपना

आईएएस, सिविल सर्विसेज या सरकारी नौकरियों का जो क्रेज़ है वह निम्न मध्यमवर्गीय या पिछड़े मध्य वर्ग में ज़्यादा होता है.

ऐसे लोगों के पास आर्थिक रूप से इतने साधन नहीं होते कि वो अपना कोई व्यापार शुरू कर सकें. आर्थिक सुरक्षा न होने की वजह से उनके पास सिर्फ़ सरकारी नौकरी पाने का ही एक सपना होता है.

 मध्यमवर्ग और निम्न मध्यमवर्ग के लोग भी सोच सकते हैं कि अब वे भी सरकारी नौकरियों में जा सकते हैं

भारत की आधी से ज़्यादा आबादी गाँव में रहती है. न तो गाँव में शिक्षा का स्तर ही इतना ऊँचा होता है और न ही उस तरह की जागरूकता होती है जो लोगों को ऊँची नौकरियों को पाने में सहायक हो सके. और जब तक जागरूकता आती है, तब तक काफ़ी देर हो चुकी होती है.

मंडल आयोग की अनुशंसा लागू होने की वजह से उन लोगों को काफ़ी लाभ हुआ है जो अपनी तैयारी देर से शुरु करते हैं.

पहले जो लोग ऊँची सरकारी नौकरियों में आ रहे ये सारे उच्च मध्यम वर्ग, पिछड़े वर्ग के लोग थे या वो लोग थे जो पढ़े-लिखे तबके थे. इन लोगों को ये सारी जानकारी होती थी और सूचना का महत्व होता है.

मंडल आयोग के आने के बाद बहुत कुछ बदला है. सामाजिक व्यवस्था बदली है और सरकारी नौकरियों में जो लोग आ रहे हैं उनका वर्ग भी बदला है.

मध्यमवर्ग और निम्न मध्यमवर्ग के लोग भी सोच सकते हैं कि अब वे भी सरकारी नौकरियों में जा सकते हैं.

इससे जुड़ी ख़बरें
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>