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'क़ानून बनाने का अधिकार संसद के पास' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यह स्पष्ट है कि संसद का काम क़ानून बनाना है और सुप्रीम कोर्ट का उनकी व्याख्या करना और लागू करना है. संविधान के अनुसार सबका कार्यक्षेत्र निर्धारित है. हमारे संविधान निर्माताओं ने सरकार, संसद और न्यायापालिका तीनों के अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख किया है. मेरा मानना है कि सबको दूसरों के अधिकार क्षेत्र का सम्मान करना चाहिए. साथ ही तीनों के बीच एक समन्वय भी होना चाहिए. इसमें टकराव की कोई बात नहीं है. संविधान के अनुसार सबका अपना काम करना है. क़ानून जब बनता है तो इसकी व्याख्या की बात आती है, या फिर उसके लागू करने की बात आती है तो उस काम को न्यायपालिका को देखना है. उस क़ानून का उल्लंघन न हो, उसका सम्मान हो, शासन-प्रशासन और नागरिक उस क़ानून को लागू करे, यह न्यायपालिका के दायरे में आता है. सारी बात एकदम साफ़ है कि संसद को क़ानून बनाना है और सुप्रीम कोर्ट को उसे लागू करना है. इसमें टकराव की बात कहाँ है. ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने निजी उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण के सवाल पर सरकार के रवैये पर आपत्ति जताते हुए केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट की एक सात सदस्यीय खंडपीठ ने सरकारी अनुदान न लेने वाले उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण ख़त्म करने का फ़ैसला दिया था. इस फ़ैसले की राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और संसद के दोनों सदनों में हंगामा भी हुआ था. (सीमा चिश्ती से बातचीत पर आधारित) |
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