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मंगलवार, 23 अगस्त, 2005 को 07:36 GMT तक के समाचार
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न्यायालय ने सरकार को आड़े हाथों लिया
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकार को अदालतों का सम्मान करना चाहिए
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने निजी उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण के बारे में सरकार के रवैये पर आपत्ति करते हुए केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है.

सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की एक खंडपीठ ने मंगलवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि न्यायालय के फ़ैसलों पर यदि सरकार का यही रुख़ है तो अदालतों को बंद कर दिया जाना चाहिए.

ग़ौरतलब है कि पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट की एक सात सदस्यीय खंडपीठ ने सरकारी अनुदान न लेने वाले उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण ख़त्म करने का फ़ैसला दिया था.

इस फ़ैसले की राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और संसद के दोनों सदनों में हंगामा भी हुआ था.

राजनीतिक दलों ने सरकार से माँग की है कि वह एक विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को बेअसर करे.

 सरकार यह बार बार क्यों कह रही है कि वह इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से कोई टकराव नहीं चाहती. किसका व्यवहार टकराव वाला है?
सुप्रीम कोर्ट

दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति मानने को लेकर दायर एक याचिका पर सुनावाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहोटी की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने यह टिप्पणी की है.

पीठ ने एटॉर्नी जनरल मिलन बैनर्जी से पूछा, "सरकार यह बार-बार क्यों कह रही है कि वह इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से कोई टकराव नहीं चाहती. किसका व्यवहार टकराव वाला है?"

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सात सदस्यीय पीठ ने जो फ़ैसला दिया वह तो सिर्फ़ एक ग्यारह सदस्यीय पीठ और फिर पाँच सदस्यीय पीठ के फ़ैसलों की पुष्टि भर थी.

मुख्य न्यायाधीश लाहोटी ने कहा, "यदि सरकार का रवैया न्यायालय के फ़ैसलों को समझे बिना उस पर प्रतिक्रिया करने का है तो उसे अदालतों को बंद कर देना चाहिए और वही करना चाहिए जो उसकी मर्ज़ी हो."

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार एटॉर्नी जनरल मिलन बैनर्जी और सॉलीसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम ने जब कहा कि वे न्यायालय का सम्मान करते हैं तो पीठ ने कहा, "क्या आप सरकार से नहीं कह सकते कि वह भी अदालतों का सम्मान करे?"

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