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सोमवार, 09 अक्तूबर, 2006 को 13:31 GMT तक के समाचार
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कांशीराम की विरासत का सवाल

कांशीराम ने अपने बूते सब कुछ किया
काश! कांशीराम थोड़ा और जी लेते. इसमें और कुछ नहीं तो उत्तर प्रदेश में पार्टी का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन जरूर देख लेते.

बीमारी वाली अवधि में भी अगर वे सक्रिय रहे होते तो उत्तर प्रदेश ही नहीं अपनी पूरी राजनीति को थोड़ा और मजबूत करते.

ऐसी कामनाओं और चाहों का होना यह बताता है कि कांशीराम और उनकी राजनीति की प्रासंगिकता अभी बाकी है और उनके जाने से समाज का, खासकर दलित समाज का काफी नुकसान हो गया है.

अकेले दम पर और आरक्षण के ज़रिए निकले दलित अधिकारियों-कर्मचारियों की थोड़ी सी मदद से उन्होंने जो मशाल जलाई उसने मुल्क की राजनीति में भारी बदलाव ला दिया है.

लेकिन जाहिर तौर पर उनका मिशन अधूरा है और अगर इसे ढंग से आगे नहीं बढ़ाया गया तो यह बड़ा नुकसान होगा.

कांशीराम ने सबसे बड़ा काम तो मुल्क में और खास तौर से हिंदीभाषी प्रदेशों में दलित समाज में प्राण फूंकने का किया है.

उपलब्धियाँ

हजारों साल से दबा यह समाज आज न सिर्फ मुख्यधारा में आया है बल्कि उत्तर प्रदेश जैसे सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रांत के शासन की बागडोर तीन-तीन बार एक दलित महिला के हाथ में आई है.

दलितों में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान आया कांशीराम के नेतृत्व से

दलितों में कांशीराम और बसपा के लिए जो ललक और प्रेम दिखता है वह विलक्षण है. बसपा के नेतृत्व की अगली चुनौती इन आकांक्षाओं को राजनीतिक हथियार में बदलकर उत्तर प्रदेश जैसी स्थिति बाक़ी राज्यों में करने की है.

यह काम मुश्किल है पर कांशीराम का उदाहरण आश्वस्त भी करता है कि ईमानदार कोशिश हो तो यह असंभव नहीं है.

कांशीराम और उनके आंदोलन की यह उपलब्धि कई मायनों में तात्कालिक या अस्थाई किस्म की है. उनकी असली उपलब्धि है दलित समाज के लोगों के बीच स्वाभिमान और आत्मविश्वास जगाना.

बाबा साहब तो महानायक थे ही. बसपा आंदोलन ने झलकारी बाई और संभाजी महाराज जैसे अपने नए नायक खड़े किए. उनके ऐतिहासिक योगदान को स्पष्ट किया. उनके अपने आंदोलन में लीडर भी अपनी जाति या अपने पुरखों का नाम करते हैं. इस धारा को इसी सोच में कौन आगे बढ़ाएगा?

कांशीराम ने अपने लक्ष्यों को पाने के लिए समझौते किए, पर लक्ष्य कभी ओझल नहीं हुए.

नया नेतृत्व

बसपा के अब के नेतृत्व ने भी अभी तक कोई बड़ी चूक नहीं की है, पर उस पर कांशीराम जैसा भरोसा नहीं होता. इस भरोसे पर खरा उतरना भी नए नेतृत्व की चुनौती होगी.

मायावती पर है विरासत को संभालने की ज़िम्मेदारी

कांशीराम की राजनीति की एक और बड़ी खूबी यह है कि उसमें बाहर से थोपा हु्आ कुछ भी नहीं है.

इस पर अमेरिकी अश्वेत आंदोलन या बाहरी राजनीतिक दर्शनों का ज़्यादा असर नहीं था. उनका अपना जीवन भी न तो अभाव दिखाने वाला था न ब्राह्मणवादी नेतृत्व की विलासिता की कार्बन कापी वाला, दलित नेतृत्व के लिए उनके जीवन जीने का ढंग भी एक चुनौती बना रहेगा.

वे बीते दो-तीन साल से बीमार थे. बसपा बनाने से लेकर अब तक की मात्र दो दशक की उनकी राजनीति और उपलब्धियाँ भी सिर्फ दलित नेताओं के लिए ही नहीं सबके लिए चुनौती रहेगी.

उन लोगों के लिए और ज़्यादा जो दशकों से मई दिवस, रूसी क्रांति दिवस पर रैलियाँ निकालने का काम, गाँधी और नेहरू का नाम भुनाने या फिर राम का नाम लेकर सत्ता हथियाने के खेल में लगे रहे हैं.

आज़ाद भारत के सभी नेताओं की तुलना में अगर कांशीराम 19 नहीं ठहरते तो उनकी गैर मौजूदगी जाहिर तौर पर सबके लिए नुकसानदेह है और उनका नाम और काम समाज राजनीति में नया करने वाले हर आदमी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा.

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