|
शून्य से शुरू हुई सत्ता की राजनीति | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पंजाब में जन्मे और महाराष्ट्र में नौकरी करने वाले कांशीराम ने अपनी राजनीति का अखाड़ा उत्तर प्रदेश को बनाया. पिछले 20 वर्षों में कांशीराम ने उत्तर प्रदेश और उसके माध्यम से भारत की राजनीति में उथल-पुथल मचा दी. कांशीराम की राजनीति शुरू हुई ब्राह्मणवाद के विरोध से लेकिन सत्ता सोपान पर पार्टी को चढ़ाने के लिए उन्होंने किसी से समझौता करने से परहेज़ नहीं किया, न ही समझौता तोड़ने में संकोच किया. उनकी राजनीति का आधार बने सरकारी सेवाओं में काम करने वाले दलित अधिकारी, वोट बैंक बढ़ाने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी को अति पिछड़ों और मुसलमानों के गरीब तबक़े से जोड़ा. कांशीराम की इस राजनीति का पहला शिकार बनी काँग्रेस पार्टी. कांशीराम के ख़तरे को भाँपकर 1986 में दलित अफ़सरों को वीर बहादुर सिंह की सरकार ने महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया लेकिन इन अधिकारियों ने अपनी प्रतिबद्धता नहीं बदली और तन-मन-धन से बीएसपी का ही साथ दिया. इसका परिणाम ये हुआ कि दलितों और मुसलमानों का समर्थन खोकर काँग्रेस पार्टी सत्ता से 1989 में बाहर हो गई जिसके बाद आज तक उसकी वापसी नहीं हो सकी. तेज़ प्रगति 1984 में गठित बहुजन समाज पार्टी पाँच वर्ष बाद 1989 में दर्जन भर विधायकों के साथ विधानसभा में पहुँची. इसके बाद कांशीराम ने इलाहाबाद से वीपी सिंह के ख़िलाफ़ और अमेठी से राजीव गाँधी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा लेकिन नाकाम रहे.
मुलायम सिंह यादव की मदद से वे इटावा से लोकसभा में पहुँचे और 1992 में उन्होंने नारा दिया--'मिले मुलायम कांशीराम, हवा हो गए जयश्री राम.' बाबरी मस्जिद टूटी, विधानसभा चुनाव हुए और सपा-बसपा गठबंधन सरकार में आई, लेकिन कांशीराम चैन से कहाँ बैठने वाले थे. अपनी शिष्या मायावती को 'उत्तर प्रदेश की महारानी' बनवाने के लिए कांशीराम ने दो ब्राह्मण नेताओं--पीवी नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी से साँठगाँठ करके मुलायम को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतार फेंका. मायावती मुख्यमंत्री बनीं. फिर भारतीय जनता पार्टी के साथ नई पारी खेलते-खेलते बहुजन समाज से सर्वसमाज की बातें शुरू हुईं लेकिन मायावती ने बीजेपी को भी गच्चा दे दिया, अगले चुनाव में कांग्रेस से तालमेल कर लिया. लेकिन इसका फ़ायदा बहुजन समाज पार्टी नहीं बल्कि काँग्रेस को हुआ. कांशीराम ने तय किया कि अगला चुनाव पार्टी अपने दम पर लड़ेगी. अपनी कूटनीति से 2002 में उन्होंने मुलायम सिंह यादव को सत्ता में आने से रोकने के लिए एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिला लिया. अब तक मायावती का अपना क़द अपने गुरू कांशीराम से भी ऊँचा हो चुका था. कांशीराम की सेहत ख़राब रहने लगी थी. मायावती को लगा कि भाजपा के साथ मिलकर सरकार चलाना दीर्घकालिक राजनीतिक हित में नहीं है इसलिए वे सरकार से बाहर हो गईं. बदली चाल मायावती ने रणनीति बदली और सवर्ण बहुल पार्टियों की जगह सीधे सवर्ण जातियों के साथ गठबंधन बनाना शुरू किया.
कांशीराम के साथियों की नाराज़गी से बचने के लिए उनके जीते जी लखनऊ में लाल बहादुर शास्त्री मार्ग पर अपनी और कांशीराम की प्रतिमाएँ स्थापित करके स्मारक बनवाया. ब्राह्मणवाद के विरोध पर बनी कांशीराम की पार्टी में एक ब्राह्मण सतीश मिश्र अब मायावती के दाहिने हाथ कहे जाते हैं. इसके बाद कांशीराम के अनुयायियों को आश्वस्त करने के लिए उन्होंने घोषणा की कि उनका उत्तराधिकारी दलित ही होगा. कांशीराम को मसीहा मानने वाले दलित समुदाय में कसमसाहट है. मायावती का सर्वण प्रेम वे पचा नहीं पा रहे हैं. कांशीराम के बाद दलित समुदाय मायावती से कितना जुड़ा रहता है इसका फ़ैसला अगले विधानसभा चुनाव में हो जाएगा. | इससे जुड़ी ख़बरें मुलायम बाँटेंगे 250 करोड़ की साड़ियाँ22 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस यूपी में चुनावी सरगर्मी तेज़ हुई14 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस उत्तर प्रदेश के दो मंत्रियों का इस्तीफ़ा01 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस मुलायम ने विश्वास मत हासिल किया 28 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस स्टिंग ऑपरेशन के बाद विधायक निलंबित15 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस स्पीकर ने बसपा की याचिका रद्द की07 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||