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'आरक्षण से समाज में विघटन बढ़ा है' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अभी तक जाति के आधार पर ही किसी भी विषय को क्यों देखा जा रहा है? क्यों अभी भी दलित- दलित ही करते रहते हैं? इस तरह क्यों नहीं देखते कि जो ग़रीबी रेखा से नीचे के लोग हैं, उन्हें ये सारी सुविधाएँ दी जाएँ? ऐसा करने में क्या मुश्किल है? आज के वर्तमान परिवेश में बात निजी क्षेत्र की हो या अन्य क्षेत्रों की, आरक्षण को बढ़ावा देने से कोई लाभ नहीं होगा बल्कि समाज का बँटवारा ही होगा. इससे एक तरह की ग़लत संस्कृति ही फैलेगी और फैल ही रही है. सरकारी महकमों में तो ऐसा हो ही गया है क्योंकि जैसे ही आप इस तरह की चीज़ को अधिकार के तौर पर देते हैं तो लोग उसके लिए काम करना बंद कर देते हैं. (आप उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिए जाने पर अपने विचार साथ दिए गए फ़ॉर्म का इस्तेमाल करते हुए हिंदी या अंग्रज़ी में हमें भेज सकते हैं. अपने विचार पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें.) अगर इस तरह की व्यवस्था का पैमाना जन्म, जाति या संप्रदाय हो जाता है तो राजनीति में ताकत और प्रभाव का समीकरण भी उसी की दिशा में चलने लगता है और इससे समाज में इसकी खाई और भी गहरी होती जाती है. अंग्रेज़ों ने मुसलमानों के लिए उस दौर में चुनाव के क्षेत्र में अलग से व्यवस्था की थी जिसका ख़ामियाजा राष्ट्रवादी आंदोलन को उठाना पड़ा था. जाति आधारित आरक्षण का भी वही नतीजा रहा है. पहली बार वैश्विक स्तर पर हमारा खड़ा होना शुरू हुआ है और ऐसी स्थिति में अगर आरक्षण की और माँग करते रहेंगे तो इससे किसी को फायदा नहीं होगा बल्कि सभी को नुकसान ही होगा. आरक्षण से ज़मीनी तौर पर कोई लाभ नहीं हुआ है बल्कि गुणवत्ता में गिरावट ही आई है. दलित हो या कोई भी हो, अगर समानता के स्तर से देखने पर ऐसा महसूस होता है कि किसी को शिक्षा, संसाधन या आय के स्तर पर कोई पिछड़ा हुआ है तो उसे जितनी संभव हो सके, सकारात्मक मदद दी जानी चाहिए. उन्हें छात्रवृत्ति दी जाएं, मुफ्त किताबें और कंप्यूटर दिए जाएं, मुफ्त छात्रावास की सुविधा दें, अतिरिक्त पोषण उपलब्ध कराएं ताकि उनका स्तर ऊपर उठ सके और वो औरों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें. आप अभावों में रह रहे बच्चे को एक मुफ्त लंच नहीं तीन बार मुफ्त खाना दीजिए, आप उनके लिए स्टडी रूम बनवाइए, जो भी मदद चाहिए, दीजिए ताकि जब कोई रेस शुरू हो तो सभी बराबर हों. ऐसा नहीं होना चाहिए कि गुणवत्ता के स्तर को नीचे गिरा दिया जाए या उन्हें नौकरियों के अवसर एक अधिकार के रूप में दे दिए जाएं. शोषण के इतिहास का सच पहले तो इसी बात की पड़ताल होनी चाहिए कि पिछले हज़ार वर्षों में दलितों के शोषण के तर्क का सच क्या है मगर इसके अलावा अगर यह मान भी लें कि कोई चीज़ पिछले 1000 वर्षों से चल रही है तो उसे आप किसी भी तरीके से 20-30 साल में ही ठीक नहीं कर पाएँगे. सोवियत संघ का उदाहरण ले लें. समानता की स्थिति लाने से वहाँ तानाशाही ही आई. तो यह तो राजनेताओं के नारे भर हैं. ऐसा कहना ग़लत है कि ये लोग प्रतिस्पर्धा में ठहर नहीं पाएंगे. अभी हाल के आकड़े देखिए तो पाएंगे कि तमिलनाडु में मेडिकल की प्रवेश मेरिट में कॉम्पटीशन से जगह बनाने वाले 85 प्रतिशत से ज़्यादा बच्चे अन्य पिछड़ी जातियों और दलित परिवारों से हैं. मुझे इसे लेकर कोई संदेह नहीं है कि राजनीतिक स्वार्थों की वजह से ही आरक्षण आगे बढ़ता जा रहा है. देखिए, एक तरफ देश तरक्की कर रहा है और दूसरी तरफ दलित जातियों की सूची लंबी होती जा रही है. कर्नाटक में जो जातियाँ राजनीति को नियंत्रित कर रही हैं, उनके बारे में कमीशन की राय रही है कि वे अब पिछड़ी नहीं रहीं पर राजनेता उन्हें पिछड़ा बनाए रखना चाहते हैं. इसी तरह पिछली बार जाटों को राजस्थान में पिछड़ा घोषित कर दिया गया. आप बिहार की ही बात ले लें और उस सिलसिले में मंडल आयोग कि सिफारिशों को देखें तो पता चलता है कि यादव, कुर्मी वहाँ की प्रभावशाली जातियाँ हैं और ये हरिजनों का शोषण करती रही हैं. ये लोग तो अंबेडकर की भी बात नहीं मान रहे हैं. उन्होंने संविधान में जो कहा था उसे नकारा ही गया है. उन्होंने कहा था कि इसे अपवाद के रूप में देखा जाना चाहिए जो ऐसा न हो कि नियमों को ही ख़त्म कर दे. उन्होंने 30 प्रतिशत आरक्षण की बात कही थी, आज तमिलनाडु की स्थिति यह है कि वहाँ 69 प्रतिशत आरक्षण हो गया है. (भारत में जारी आरक्षण व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर अरुण शौरी ने पाणिनी आनंद के साथ कुछ समय पूर्व हुई बातचीत में ये विचार व्यक्त किए) | इससे जुड़ी ख़बरें 'आरक्षण की व्यवस्था एक सफल प्रयोग है'05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस आरक्षण और सामाजिक समता का सवाल05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस शिक्षा व्यवस्था और दलित समाज05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस दलित होने का मतलब और मर्म05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस मानवाधिकार और दलित समाज की स्थिति05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस आज का दलित: उपलब्धियाँ और भटकाव05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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