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वर्तमान दलित आंदोलन का स्वरूप | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज के दौर में दलित आंदोलन की जो दिशा होनी चाहिए थी, वो तो नहीं है लेकिन आंदोलन चल रहा है. जितना दम-खम होना चाहिए था, जो उपलब्धियाँ होनी चाहिए थी, वो भी नहीं है. डॉक्टर अंबेडकर की जो मुख्य लड़ाई थी वो वर्ण व्यवस्था के ख़िलाफ़ थी. वो चाहते थे कि इस देश में इंसान रहें, जातियाँ न रहें. हम प्रयास कर रहे हैं कि अंबेडकर जी की बात को आगे लेकर चल रहे हैं, मायावती जी, पासवान जी और आरपीआई वाले भी अपने-अपने तरीके से दलित आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं. लेकिन अंबेडकर जी की जो मूल लड़ाई थी यो उनकी मुख्य विचारधारा थी, बाकी के लोग उसमें शामिल होने से कतराते हैं. राजनीतिक लड़ाई ये लोग ज़रूर लड़ रहे हैं और यह ज़रूरी भी है लेकिन विधानसभा हो या संसद हो, ये लोग दलितों के हित में आवाज़ नहीं उठाते हैं. उदाहरण के तौर पर बहुजन समाज पार्टी ने दलितों के हित के लिए सीधे तौर पर कोई आंदोलन नहीं किया. दलितों के उत्थान के लिए जो पैसा आवंटित होता है उसे दूसरे विभागों को खर्च करने के लिए दे दिया जाता है. इसपर कोई आंदोलन नहीं है. उत्तर प्रदेश में दलित बच्चों को छात्रवृत्ति नहीं मिल रही है, उसपर बसपा का कोई आंदोलन नहीं है. होना तो यह चाहिए कि विपक्ष में रहकर आप आंदोलन करें और सत्ता में आएं तो उन माँगों के लिए क़ानून बनाए पर इससे इतर बसपा ने वोट और नोट के लिए ही राजनीति की है. निजीकरण, भूमंडलीकरण जैसे मुद्दों पर, निजी क्षेत्र में आरक्षण के सवाल पर दलित नेता बिखरे हुए हैं और कोई साथ नहीं आ रहा है, न सवाल खड़े कर रहा है. वजहें कुछ तो इस देश का परिवेश ही ऐसा है कि सभी जनांदोलन की स्थिति ऐसी है. केवल दलित आंदोलन ही नहीं, यहाँ के कम्युनिस्टों में भी वो धार नहीं है जो कि नेपाल या देश के और कम्युनिस्टों में है. किसानों का आंदोलन भी कमज़ोर है. दरअसल, इस देश में जाति धर्म से भी ज़्यादा मज़बूत है. जाति ही आगे आकर खड़ी हो जाती है. जब भी इस देश में चुनाव होते हैं, सरकार को चुनने का समय आता है तो न विकास मुद्दा रहता है, न बिजली, न पानी, किसान की समस्या. जो किसान आज आत्महत्या कर रहा है, कल उसी परिवार के लोग मुद्दे की जगह जाति के आधार पर वोट देंगे. बस जाति ही निर्णायक हो गई है. दूसरे हमारी सांस्कृतिक धरोहर भी कुछ ऐसी ही रही है. इस देश में सच्चाई कम और दोहरे चरित्र ज़्यादा कामयाब रहे हैं. इसके अलावा लोगों की मानसिकता भी ज़िम्मेदार है. जिन हाथों ने काम किया, उनकी हमेशा उपेक्षा हुई और जो लोग बैठकर खाते रहे, पाखंड फैलाते रहे उनकी पूजा की जाती रही. काम के ज़रिए सम्मान कभी नहीं मिला. मीडिया की भी बड़ी भूमिका है. सही आंदोलन को ग़लत दिशा में दिखाना और ग़ैर-ज़रूरी चीज़ों को मुख्य ख़बर बनाने का काम भारतीय मीडिया कर रहा है. दलितों में भी आपस में काफी भेदभाव है, छुआ-छूत है. तो वजहें दोनों तरह की हैं. आंतरिक भी और बाहरी भी. दलित आंदोलन: दक्षिण बनाम उत्तर दक्षिण भारत में दलित आंदोलन और उत्तर भारत में दलित आंदोलन में हमें तो कोई फ़र्क नज़र नहीं आता बल्कि उत्तर की स्थिति मैं बेहतर पाता हूँ. महाराष्ट्र में अंबेडकर जी का शुरू किया हुआ आंदोलन, आरपीआई आज कई हिस्सों में बँट गया है. आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के भी दलित आंदोलनों की स्थिति अच्छी नहीं है. मदुरै का उदाहरण लें तो वहाँ पंचायत चुनावों में दलित खड़े तो होते थे पर कुछ ही दिनों में उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ता था क्योंकि तथाकथित संभ्रांत वर्ग उन्हें कुछ करने ही नहीं देता था. ऐसा कहना उचित होगा कि दोनों ही तरफ के आंदोलन अधूरे हैं. हाँ, दक्षिण की स्थिति ठीक इसलिए दिखती है क्योंकि वहाँ पूरे तौर पर स्थिति उत्तर से बेहतर है. शिक्षा से लेकर आर्थिक स्थिति और क़ानून व्यवस्था भी उत्तर के मुकाबले बेहतर है. तकनीक विकास में भी वो आगे हैं. (पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें दलित आंदोलन और राजनीति की कमियाँ05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस मानवाधिकार और दलित समाज की स्थिति05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस आज का दलित: उपलब्धियाँ और भटकाव05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'दलित साहित्य के बिना साहित्य की बात संभव नहीं'05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस दलित होने का मतलब और मर्म05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस बाबा साहेब का दलित आंदोलन को योगदान05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस आरक्षण और सामाजिक समता का सवाल05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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