आपके ऑफ़िस में कोई बॉस ही न हो तो!

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नौकरीपेशा लोगों की एक शिकायत हमेशा रहती है कि बॉस बहुत परेशान करता है. खाली बैठा देख ही नहीं सकता. एक काम ख़त्म होता नहीं कि दूसरा थमा देता है.

बॉस को तो बर्दाश्त करना ही पड़ता है, साथ ही कई बार उसकी जी हुज़ूरी करने वालों को भी. क्योंकि डर रहता है बॉस का क़रीबी है, अगर कुछ गुस्से में कुछ कह दिया तो, कहीं बॉस तक बात ना पहुंच जाए. इस ख़ौफ़ में एक बॉस के साथ कई बॉस झेलने पड़ जाते हैं.

ऐसे में अगर हम ये कहें कि आप अपने ऑफ़िस को बॉस के बिना ही चलाइए तो आपको ये बात मज़ाक़ लगेगी. आप कहेंगे ऐसा तो हो ही नहीं सकता, बिना बॉस के ऑफ़िस का तसव्वुर ही नहीं कर सकते.

लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया में बहुत से ऑफ़िस बॉस के बग़ैर ही चल रहे हैं. इसी तरह का एक ऑफ़िस लंदन में है- ज़ेड बुक्स. यहां किताबें प्रकाशित की जाती हैं.

इसके दफ़्तर में हर कर्मचारी अपना बॉस ख़ुद है. यहां बारह लोगों की टीम है. हर कोई अपने फैसले ख़ुद लेता है. किसी भी मसले को लेकर, जब कोई मीटिंग होती है तो वो काफ़ी लंबी चलती है. सब खुलकर अपने बात रखते हैं. सभी के मशवरों पर ग़ौर किया जाता है फिर किसी नतीजे पर पहुंचा जाता है.

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इससे काम के नतीजे तसल्लीबख़्श होते हैं. ज़ेड बुक्स के एडिटर केन बार्लो कहते हैं कि इस तरह के माहौल में काम करने से सभी को अपनी प्रतिभा सामने लाने का मौक़ा मिलता है. एक बड़ा फ़ायदा और भी है कि किसी काम की इजाज़त लेने के लिए बहुत से मैनेजर्स के हाथ से फ़ाइल को गुज़रना नहीं पड़ता.

जहां बॉस और सब-बॉस की लंबी चौड़ी क़तार होती है, वहां काम करने में अक्सर ही दुश्वारी आती है. एक मैनेजर किसी काम के लिए हामी भरता है तो दूसरा उसमें अड़ंगा लगा देता है. ऐसे में काम और उस काम को करने वाले दोनों ही नुक़सान उठाते हैं. केन बार्लो कहते हैं कि उन्हें अपने पुराने ऑफ़िस में ऐसी चीज़ों से दो चार होना पड़ता था.

अमरीका के मेसाचुस्सेटस इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी लीडरशिप सेंटर की डायरेक्टर डेबोरारा एनकोना कहती हैं कि आज ये ट्रेंड बढ़ता जा रहा है. बहुत सी कंपनियां नौकरशाहों की फौज कम करके काम को सरल और तेज़ी से पूरा करने में यक़ीन कर रही हैं. वैसे, बिना बॉस के ऑफिस का ख़याल सिर्फ छोटी कंपनियों में ही चल सकता है या फिर बड़ी कंपनियां भी इसी राह पर चल सकती हैं? ये भी एक सवाल है.

हो सकता है बड़ी कंपनियों को नौकरशाहों की फौज की ज़रूरत ना हो लेकिन एक बॉस की ज़रूरत तो होगी ही जो सारे काम कंट्रोल में करके सभी कर्मचारियों से उनकी क़ाबिलियत के मुताबिक काम ले सके.

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अमरीका में एक ऐसी ही मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी है 'गोर'. यहां दस हज़ार मुलाज़िम काम करते है और इनका एक ही सीईओ है. मुलाज़िमों की क़ाबिलियत के मुताबिक़ उनके छोटे छोटे ग्रुप बने हैं. हर ग्रुप का एक एक ग्रुप लीडर होता है. किसी भी कर्मचारी के बिज़नेस कार्ड पर कोई टाइटिल नहीं लिखा जाता. ये सभी मुलाज़िम असोसिएट कहलाते हैं.

गोर कंपनी के मार्केटिंग मैनेजर हेनरी ब्रायन इस सिस्टम की हिमायत नहीं करते हैं, क्योंकि इस तरह के सेटअप में बहुत से चापलूसों की भीड़ इकट्टा हो जाती है. लेकिन इन सबके बावज़ूद वो यहां काम करके खुश हैं. उनका कहना है इस सिस्टम ने रिवायती बंदिशों को तोड़ा है, जो अक्सर मैनेजर और उसके मातहतों के दरमियान देखी जाती थी.

वो एक और बात की तारीफ़ करती हैं. उनका कहना है कि अगर आपने वादे को पूरा नहीं किया है, तो आपकी टीम आपको ही इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराएगी.

समतावादी नज़रिये का एक और बड़ा फ़ायदा है इससे कंपनी पर मैनेजरों की तनख़्वाह और बाक़ी भत्तों का बोझ कम पड़ता है. सभी मुलाज़िमों की तनख़्वाह बराबर करने से, क्या उत्पादकता पर इसका अच्छा असर पड़ेगा, इस सवाल को लेकर भी अलग अलग राय है. कुछ रिसर्च साबित करती हैं कि इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा.

भारत में दिल्ली की एक कंपनी है निस्वे. इस कंपनी के को-फाउंडर अभिनव साही कहते हैं मैनेजरों की चेन कंपनी से हटाने के बाद उन्हें काम करने में काफ़ी आसानी होने लगी.

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इसका सबसे बड़ा फ़ायदा तो यही रहा कि हर मुलाज़िम को बेझिझक अपने विचार सामने लाने का मौक़ा मिला. इसकी वजह से सभी के आइडिया पर काम किया गया इससे मुलाज़िमों का हौसला भी बढ़ा और वो नए विचारों के साथ काम करने लगे.

इस तज़ुर्बे पर काम करने से सिर्फ आप बॉस की 'हां' का इंतज़ार नहीं करते रहते. आपको जो आइडिया अच्छा लगता है आप उस पर काम करते हैं. साही कहते हैं ऐसे माहौल में काम करना मुश्किल होता है, जहां कुछ मैनेजर सिर्फ इसलिए रखे जाएं कि वो मुलाज़िमों पर नज़र रख सकें. इसके अलावा एक ही ऑफिस में ज़्यादा बॉस होने से सिफारिशियों की भर्ती ज़्यादा होने लगती है.

बिना बॉस के कंपनी चलाने के अपने फायदे ज़रूर हो सकते हैं, लेकिन ये सभी कंपनियों के लिए मुनासिब नहीं है. बहुत सी ऐसी कंपनियां भी हैं जिन्हों ने इस फार्मूले को अपनाया, लेकिन बाद में उन्हें छोड़ना पड़ा.

ऐसी ही एक कंपनी है गिटहब. कंपनी ने दो साल तक बिना मैनेजर के काम चलाया. लेकिन 2014 में फिर से कुछ मैनेजरों को नौकरी पर रखा गया. कंपनी के प्रवक्ता का कहना जैसे जैसे कंपनी आगे बढ़ती है, कंपनी की ज़िम्मेदारियां भी बढ़ती हैं. ऐसे में सभी मुलाज़िमों को दिशा निर्देश देने के लिए एक अच्छी लीडरशिप ज़रूरी होती है.

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लंदन बिज़नेस स्कूल के प्रोफेसर का कहना है अगर कंपनी में कोई लीडरशिप ही नहीं होगी तो सब से बड़ी परेशानी कंपनी में होने वाले झगड़ों के निपटारे को लेकर होगी. ऐसी कोई कंपनी नहीं है, जहां किसी काम को लेकर आपस में मुलाज़िमों में मतभेद नहीं होते. इन मतभेदों को ख़त्म करने के लिए अच्छी लीडरशिप की ज़रूरत होती ही है.

मेलबर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पीटर गाहा का कहना है लीडरशिप के न होने पर कर्मचारियों की किसी को जवाबदेही नहीं रहेगी और ये कंपनी की ग्रोथ के लिए सही नहीं हैं.

किसी कंपनी के आगे बढ़ने के लिए ये ज़रूरी है कि अलग अलग विचारों के लोग एक साथ काम करें. अगर सभी एक जैसा ही सोचेंगे और एक जैसा ही काम करेंगे तो वो कंपनी ठहरे हुए पानी की तरह हो जाएगी और ये ना तो किसी कंपनी के लिए मुफ़ीद है और ना ही कर्मचारियों के लिए.

लिहाज़ा कंपनी और कर्मचारियों, दोनों की तरक़्क़ी के लिए किसी की जवाहदेही का तय होना और अनुशासन का होना बहुत ज़रूरी है.

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