लोगों को आज़ादी नहीं, दंगे, लूट और मारकाट याद आती हैं- ब्लॉग

- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान से
आज से 75 साल पहले पंजाब में जो हुआ था, मैंने शायद ही कभी किसी बुज़ुर्ग को यह कहते सुना हो कि हमें आज़ादी मिली है. वे हमेशा यही कहते हैं वह समय जब बेघर हो गए थे, जब दंगे हुए थे, जब लूट हुई थी.
मैं कई ऐसे बुज़ुर्गों से मिला, जिन्हें बंटवारे से पहले का समय अच्छी तरह याद है. उस लम्हे को याद करके वो हमेशा आहें भरते हैं, कहते हैं वो वक़्त कितना हसीन था, सिख हमारे भाई जैसे थे.
हिंदू लड़कियां हमारी बहनें थीं, हम एक साथ गुड़ियों के साथ खेलते थे, कभी-कभी वे हमारे घर अपने अपने परिवारों से छिपकर मांस खाने के लिए भी आती थीं.
ज़ाहिर है, कट्टर लोग भी थे, वे एक ही बर्तन से खाना नहीं खाते थे, एक-दूसरे से संबंध नहीं रखते थे, लेकिन फिर भी वे एक-दूसरे के प्यार में पड़ जाते थे.
ऐसे लोग भी थे जो एक ही थाली में खाना न खाएं, लेकिन बाहर बैठकर एक ही बोतल से शराब की चुस्की लेते और एक ही हुक्के से धूम्रपान भी करते थे.
भूख थी, लेकिन वे साझा थी, गीत भी साझा थे और तमन्नाएं भी साझा थी. जाहिर है बड़े-बुज़ुर्ग झूठ नहीं बोलते, प्यार की ये बातें सच होंगी.

लेकिन इन सब मीठी बातों को सुनने के बाद जब मैं बड़ों से पूछता हूं कि अगर इतनी दोस्ती थी तो 75 साल पहले क्या हुआ था, इतने प्यारे सज्जन क्यों दुश्मन बन गए?
बड़े-बुज़ुर्ग खामोश रहते हैं, फिर कहते हैं कि रातों-रात जत्थे बन गए, उनके, फिर हमारे, औरतों, बच्चों को छीन ले गए, काफिले लूटे, गाड़ियों में लोगों को काटकर मौत के घाट उतार दिया गया.
मैंने भी बचपन में एक जंग लगा हुआ खंजर देखा था, एक बुज़ुर्ग ने कहा, लड़का, इसे मत छुओ, पता नहीं कि इस पर किसका ख़ून लगा होगा.
मैं तब से सोच रहा था कि हमने गिनती पूरी नहीं की, लेकिन इस आज़ादी के लिए हमने 15-20 लाख लोगों को मार डाला.
और जो हमसे कहते हैं कि 'हमने अपनी आज़ादी के लिए जीवन की कुर्बानियां दी हैं' मेरे विचार से सच नहीं कह रहे हैं.
क्योंकि लोगों से किसी ने नहीं पूछा कि हम तुम्हारी औरतों और बच्चों को तुमसे छीन कर तुम्हें आज़ादी देने जा रहे हैं, मंजूर हैं.
अगर किसी जानवर की बलि देनी हो तो भी उसे मारने के लिए पांच या सात आदमियों की ज़रूरत होती है और आज़ादी के समय हमने पंद्रह से बीस लाख लोगों को हाथ से मार डाला.

बंदूकें और बम शायद उस समय किसी प्रधान के पास होंगे, बाकी हमने कुल्हाड़ियों, भालों, तलवारों, लाठी और डंडों के साथ हमने यह किया था.
पंजाब के बंटवारे से क़रीब 200 साल पहले बुल्ले शाह ने कहा था कि पंजाब में शक-ओ-शुबह का समय आ गया है, लेकिन अब पिछले 75 सालों में वह शक-ओ-शुबह हमारी हड्डियों में आ गया है.
अब हम इसे अपनी माँ की गोद में प्राप्त करते हैं. '47 के जत्थे कहां से आए और किसने बनाए, यह हमें किसी ने कभी नहीं बताया, लेकिन अब चारों ओर देखिए तो आपको पता चलेगा कि ये हमारे शासकों के जत्थे हैं और उन्हें भाले, कुल्हाड़ी और खंजर की ज़रूरत नहीं है.
उनके पास अब कोई 12-14 हज़ार (तोपें) बंदूकें, 5-7 हज़ार टैंक और कोई डेढ़ से दो हज़ार लड़ाकू विमान हैं, मिसाइलों की संख्या बेशुमार है. हम किसी को परमाणु बमों की संख्या गिनने तक नहीं देते.

ये सारा सामान हमने भारत, पाकिस्तान का सफ़ाया करने के लिए नहीं रखा है. हम यह भी जानते हैं कि हमने इसे अपने लोगों को बर्बाद करने के लिए रखा है.
एक पंजाबी एक पंजाबी को प्याज़ और टमाटर नहीं बेच सकता है, लेकिन उसे सियाचिन भेज दिया गया है, जहां वह ठंड में जम जाता है और एक दूसरे पर फ़ायर भी करता है.
फिर भी हमने एक-दूसरे के लोगों को युद्धों में उतना नहीं मारा, जितने अपने घरों में मारे हैं.
एक बार फिर अँधेरी रात है, जहां जत्थे दोनों तरफ फिर साथ आ गए हैं, भूख भी है, लेकिन यह भी याद रखना कि हमारी भूख भी साझा है, हमारे गीत भी साझा हैं और हमारी तमन्नाएं भी साझा हैं.
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