कोरोना महामारी के दौरान जापान में औरतों की आत्महत्या के मामले बढ़े

- Author, रुपर्ट विंगफ़िल्ड-हेस
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, टोक्यो
दुनिया की किसी भी और जगह के मुक़ाबले जापान में आत्महत्या के मामले अधिक तेज़ी से सामने आ रहे हैं. ज़्यादातर देशों की अपेक्षा जापान में हर महीने इसके आंकड़े इकट्ठे किए जाते हैं. कोरोना महामारी के दौरान यहाँ आत्महत्या के जो आंकड़े सामने आए हैं, वो परेशान करने वाले हैं.
2020 में 11 सालों में पहली बार यहां आत्महत्या की दर में बढ़ोत्तरी हुई है. इन आंकड़ों से एक अचरज की बात और सामने आई है कि मर्दों की तुलना में औरतों में आत्महत्या के मामले ज़्यादा देखने को मिले हैं. आत्महत्या करने वाली औरतों के आंकड़ों में क़रीब 15 फ़ीसद का इज़ाफ़ा देखा गया है.
पिछले साल अक्तूबर के महीने के आंकड़ों के मुक़ाबले इस साल इस महीने के आंकड़ों में 70 फ़ीसद से ज़्यादा का इज़ाफ़ा देखा गया है.
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? महिलाओं पर पुरुषों की तुलना में कोविड-19 का असर इतना बुरा क्यों देखने को मिल रहा है?
चेतावनी: इस रिपोर्ट में दी गई कुछ बातों से पाठक परेशान हो सकते हैं.
एक ऐसी महिला से आमने-सामने मिलना काफी परेशान करने वाला अनुभव था जिसने कई बार खुद को मारने की कोशिश की हो. इस अनुभव ने मुझे आत्महत्या रोकने के बारे में काम करने वालों के प्रति और सम्मान से भर दिया.
मैं योकोहामा के रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट में बॉड प्रोजेक्ट की ओर से चलाए जा रहे एक केंद्र में बैठा हुआ था. यह आत्महत्या रोकने पर काम करने वाली एक चैरिटी संस्था है.
मेरी टेबल के सामने छोटे बालों वाली 19 साल की एक महिला बैठी हुई थीं. उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे.
उन्होंने इसी तरह भावहीन रहते हुए मुझे अपनी कहानी सुनानी शुरू की. उन्होंने बताया कि इसकी शुरुआत तब हुई जब वो 15 साल की थीं. उनका बड़ा भाई उनके साथ हिंसक रूप से पेश आने लगा था. आख़िरकार वो अपना घर छोड़कर भाग गईं, हालांकि इससे उनकी पीड़ा और अकेलेपन में कमी नहीं आई. अपने जीवन को ख़त्म करना ही उन्हें इस पीड़ा को ख़त्म करने का एकमात्र रास्ता लगने लगा.

वो बताती हैं, "पिछले साल इस वक्त मैं कई बार अस्पताल गई थी. मैंने एक से ज़्यादा बार ख़ुद को मारने की कोशिश की थी. लेकिन मैं इस काम में कामयाब नहीं हो सकी. इसलिए अब मैंने इसकी कोशिश छोड़ दी है."
आत्महत्या की कोशिश छोड़ने में बॉन्ड प्रोजेक्ट ने उनकी मदद की. प्रोजेक्ट के लोगों ने उनके लिए एक सुरक्षित जगह तलाशी और उनकी काउंसेलिंग शुरू की.
जून तचिबाना बॉन्ड प्रोजेक्ट की संस्थापक हैं. उनकी उम्र चालीस से अधिक है. है. उनके अंदर जीवन को लेकर जब़रदस्त उम्मीदें हैं.
वो कहती हैं, "जब लड़कियाँ वाकई में मुश्किल और पीड़ा में होती हैं तो उन्हें पता नहीं होता कि क्या करना है. हम उनकी मुश्किलें और उनकी भावनाएं सुनने के लिए यहाँ हैं. उनसे कहना चाहते हैं कि हम आपके साथ हैं."
तचिबाना कहती हैं कि कोविड महामारी ने पहले से ही मुश्किल में पड़े लोगों को और जोख़िम में डाल दिया है. उन्होंने बताया कि हाल के महीनों में हमारे स्टाफ़ को कई परेशान करने वाले फ़ोन कॉल्स आए हैं.
वो बताती हैं कि हमने इस तरह की बहुत आवाज़ें सुनी हैं कि "मैं मरना चाहता हूं. मेरे पास कोई ऐसी जगह नहीं जहाँ मैं जाऊं. कोई कहती थीं कि ये बहुत तकलीफदेह है. मैं बहुत अकेली हूँ. मैं गायब हो जाना चाहती हूँ."
शारीरिक और यौन उत्पीड़न के शिकार महिलाओं के लिए कोविड-19 महामारी ने स्थिति और भी बदतर बना दी थी.
तचिबाना ने मुझे बताया कि, "एक लड़की ने बताया था कि उसके पिता उसका यौन उत्पीड़न कर रहे हैं. कोविड की वजह से उसके पिता के पास ज़्यादा काम नहीं था इसलिए उसके पास अपने पिता से बचने की ज़्यादा गुंजाइश नहीं थी."

एक 'असधारण पैटर्न'
अगर आप जापान में 2008 में आए बैंकिंग और 1990 के दशक की शुरुआत में स्टॉक मार्केट में आए संकट के वक्त को देखे तो उस वक्त अधेड़ उम्र के मर्द अधिक प्रभावित हुए थे. उस वक्त मर्दों में आत्महत्या की दर में काफी इज़ाफ़ा देखा गया था.
लेकिन इस महामारी का मामला अलग है. यह युवाओं को प्रभावित कर रहा है ख़ासकर महिलाओं को. इसके पीछे की वजह भी काफी जटिल है.
विकसित देशों में सबसे ज़्यादा आत्महत्या दर जापान में है. पिछले दशक में आत्महत्या की दर क़रीब एक तिहाई तक कम करने में कामयाबी हासिल हुई है.
प्रोफे़सर मिचिको उएदा आत्महत्या के मुद्दे पर काम करने वाली जापान की एक जानीमानी विशेषज्ञ हैं. उनका कहना है कि पिछले कुछ महीनों में आत्महत्या के मामलों का बढ़ना चौंकाने वाला है.
उन्होंने कहा, "महिलाओं में आत्महत्या का यह पैटर्न काफी असधारण है. मैंने अब तक इस मुद्दे पर रिसर्च करते हुए इस तरह का इज़ाफ़ा नहीं देखा था. कोरोना वायरस ने उन उद्योग-धंधों को सबसे ज़्यादा बर्बाद किया है जिसमें महिलाएँ बड़े पैमाने पर काम करती हैं. जैसे कि पर्यटन और खाने-पीने के धंधे को."
जापान में अकेली महिलाओं की संख्या में इज़ाफ़ा देखा जा रहा है. कई महिलाएँ शादी करने के बजाए अकेली रहने का निर्णय ले रही हैं क्योंकि शादी में अब भी उन्हें पारंपरिक तौर पर निर्धारित भूमिकाओं को ही निभाना पड़ता है.
प्रोफे़सर उएदा बताती हैं कि महिलाएँ की अब भी ऐसे रोज़गार में रहने की संभावना अधिक रहती हैं जो अनिश्चित होती है. वो कहती हैं, "बहुत सारी महिलाएँ शादीशुदा नहीं हैं. उन्हें अपना गुज़ारा चलाना होता है. उनके पास कोई स्थायी नौकरी नहीं होती. इसलिए जब कुछ होता है तब उन पर सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ता है. पिछले आठ महीनों में ऐसी नौकरियों पर अधिक असर पड़ा है."
इसमें से तो एक महीना महिलाओं की आत्महत्या के आंकड़ों के लिहाज़ से और भी उल्लेखनीय रहा है. पिछले साल अक्तूबर में 879 महिलाओं ने आत्महत्या की थी. साल 2019 के इसी महीने के आंकड़ों से लिहाज़ से ये क़रीब 70 फ़ीसदी से भी अधिक है.
जापान में अख़बारों की सुर्खियां आत्महत्या की खबरों से पटी पड़ी थीं. कुछ ने अक्तूबर में हुई कुल आत्महत्या की तुलना कोरोना वायरस के दौरान हुई कुल आत्महत्या के मामलों से की है. सिर्फ अक्तूबर के महीने में जहाँ महिलाओं और पुरुषों में आत्महत्या के 2199 मामले सामने आए हैं तो वहीं जापान में कोरोना महामारी के दौरान मरने वालों की कुल संख्या 2,087 तक रही है.
इस दौरान कुछ बहुत ही अजीब घट रहा था.

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पिछले साल 27 सितंबर को जापान की एक मशहूर अभिनेत्री यूको ताकेची अपने घर में मृत पाई गई थीं. बाद में ऐसी ख़बरें आईं कि उन्होंने आत्महत्या कर ली थी.
पूर्व पत्रकार यासुयुकी शिमिजु एक ग़ैर-लाभकारी संगठन चलाते हैं जो जापान में आत्महत्या की समस्या से निपटने को लेकर काम कर रही है.
वो कहते हैं, "जिस दिन किसी सेलिब्रिटी की मौत की ख़बर आती है उस दिन के बाद से आत्महत्या के मामले बढ़ जाते हैं और लगभग 10 दिनों तक उसी तरह से रहते हैं. आंकड़ों में हम देख सकते हैं कि 27 सितंबर के दिन अभिनेत्री की मौत के बाद अगले 10 दिनों में 207 महिलाओं ने आत्महत्या की."
अगर आप आंकड़ों पर और ग़ौर से नज़र दौड़ाए तो पाएँगे कि यूको ताकेची की उम्र के आसपास की महिलाओं ने इस दौरान अधिक आत्महत्या की थी.
शिमिजु कहते हैं, "दूसरे आयुवर्ग की अपेक्षा 40 से अधिक की उम्र की महिलाएँ अधिक प्रभावित हुई थीं. इनमें आत्महत्या की दर दोगुनी से ज्यादा थी."
अन्य विशेषज्ञों ने भी इस पर सहमति जताई कि सेलिब्रटी की आत्महत्या और उसके बाद बढ़ते आत्महत्या के मामलों में बढ़ोत्तरी के बीच कुछ संबंध है.
सेलिब्रिटी का असर
जापान में यह एक अनोखी प्रवृत्ति देखने को मिलती है और इस वजह से भी जापान में आत्महत्या पर रिपोर्टिंग करना मुश्किल काम है. किसी सेलिब्रिटी की आत्महत्या के बाद उसकी मीडिया और सोशल मीडिया में जितनी चर्चा की जाती है, उसका असर कमज़ोर लोगों पर पड़ता है.
मेई सुगानुमा ग़ैर लाभकारी संगठन में काम कर रही शोधकर्ता हैं. वो खुद भी आत्महत्या की एक घटना से प्रभावित रही हैं. जब वो छोटी थीं तब उनके पिता ने अपनी जान खुद ले ली थी. अब वो उनके परिवारों की मदद करती हैं जिन्होंने खुद को मार लिया है.

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वो कहती हैं कि कोविड महामारी की वजह से रिश्तेदार अपने परिजनों की मौत का शोक भी नहीं मना पा रहे हैं. ऐसे में ये वक्त आत्महत्या के शिकार लोगों के परिवारों के लिए और भी मुश्किल होता जा रहा है.
मेई सुगानुमा कहती हैं, "मैं जब परिवार के सदस्यों से बात करती हूँ तब यह महसूस करती हूँ कि उनके अंदर किसी अपने को नहीं बचा पाने का एहसास बेहद मज़बूत है. वो अक्सर इसके लिए खु़द को दोषी ठहराते रहते हैं."
"मैं खु़द अपने पिता को नहीं बचा पाने के लिए अपने आप को जिम्मेदार ठहराती हूँ.
"अब महामारी के कारण उन्हें घर में रहने को कहा जा रहा है. मैं इस बात को लेकर चिंतित हूँ कि इससे उनके अंदर अपराधबोध और और बढ़ जाएगा. जापानी लोग मौत के बारे में बात नहीं करते हैं. हमारी संस्कृति आत्महत्या पर बात करने की नहीं रही है."
जापान में अब कोविड संक्रमण की तीसरी लहर चल रही है और सरकार ने आपातकाल लागू करने को लेकर आदेश दिए हैं. ये आदेश फरवरी तक लागू रहने की संभावना है. देश में कई रेस्तराँ, होटल और बार बंद हो रहे हैं. कई लोग अपनी नौकरियाँ गवां रहे हैं.
प्रोफे़सर मिचिको उएदा एक और सवाल उठाती हैं. वो कहती हैं कि यह सब जापान में हो रहा है जहाँ कोई सख्त लॉकडाउन नहीं लगाया गया हैऔर कोरोना से अपेक्षाकृत कम मौतें हुई हैं, तो फिर दूसरे देशों में क्या स्थिति होगी जहाँ महामारी और भी बुरे स्वरूप में मौजूद है?

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