'कौन सा ये आख़िरी दाना मांझी हैं'

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- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, इस्लामाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए
किसी को याद है भोपाल गैस त्रासदी. अभी 32 साल पहले की ही तो बात है. याद नहीं है उस बच्चे की ब्लैक एंड व्हाइट फोटो जिसका बस चेहरा ही मिट्टी से बाहर था.
और उस चेहरे पर दो खुली आंखें जैसे बादाम के खाली छिलके. कैसी झुरझुरी आई थी उस तस्वीर को देखकर.
फिर कितना गुस्सा आया था. यूरेनियम कार्बाइड कंपनी, लालची नेताओं और पत्थर दिल राष्ट्र पर.
मेरी तो पूरे सात दिन तबीयत ख़राब रही. पूरे सात दिन.
अफ्रीका में भूखमरी ख़बर थोड़े ही है. अफ्रीका तो बना ही भूख, बीमारी, जंग और लूटमार के लिए. फिर भी हमलोगों का दिल पत्थर का तो नहीं है.

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1993 में एक अमरीकी फोटोग्राफर ने सूडान में एक तस्वीर खींची जिसने दुनिया को हिलाकर रख दिया.
तस्वीर में एक बच्चा औंधे मुंह पड़ा मर रहा है और उसके बिल्कुल पीछे एक गिद्ध बच्चे की सांसें गिन रहा है.
तस्वीर इतनी दुखभरी थी कि इसे खींचने वाले फोटोग्राफर ने चार महीने बाद आत्महत्या कर ली.
किसी और ने भी आत्महत्या की? की होती तो ख़बर ज़रूर आती. अभी पिछले साल की ही तो बात है.
एक तीन साल के बच्चे <link type="page"><caption> अयलान कुर्दी</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150904_syrian_father_speaks_out_pm" platform="highweb"/></link> की लाश तुर्की के साहिल पर औंधे मुंह पड़ी मिली थी. इस तस्वीर ने दुनिया को सीरिया में होने वाली ट्रैजडी की गंभीरता बताई.

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ख़ुद मुझे तीन चार दिन तक अपने इंसान होने पर शर्म आती रही. और दो हफ़्ते पहले इसी सीरिया के शहर एलेप्पो के पांच साल के बच्चे <link type="page"><caption> ओमरान दकनीश </caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/international/2016/08/160818_syria_boy_image_ia" platform="highweb"/></link>की तस्वीर की वायरल हो गई. जिसे मलबे से निकाल कर एंबुलेंस की कुर्सी पर बिठा दिया गया था.
करोड़ों लोगों ने इस तस्वीर को शेयर किया. दुख भी हुआ कि ओमरान का एक भाई मर भी गया. मगर खुशी भी हुई कि ओमरान तो बच गया कम से कम.
लेकिन साहब ओडिशा के इलाके भवानीपटना के अस्पताल से अपनी पत्नी की लाश कंधे पर उठाकर बारह किलोमीटर पैदल चलने वाले दाना मांझी और उसके बेटी की तस्वीर मुझे आज भी उतना ही बेकल कर रही है कि क्या बताऊं.
कल रात सुनील की पार्टी में बिल्कुल मज़ा नहीं आया. शिवास (शराब का ब्रांड) का पैग का सामने पड़ा रहा.
मुझसे तो एक चुस्की तक नहीं ली गई. कैवियार (ख़ास किस्म की मछलियों के अंडे) के काले मोतियों जैसे चमकते अंडों की तरफ आंख उठाकर नहीं देखा गया.

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हालांकि सुनील ने ईरान से एक हज़ार डॉलर पाव के हिसाब से ख़ास मेरे लिए मंगवाए थे.
मैं जब भी कैवियार का चम्मच भरता, दाना मांझी के कंधों पर रखी लाश सामने आ जाती.
कितने दुख की बात है कि दाना मांझी के पास बीवी की लाश अस्पताल से घर ले जाने के पैसे नहीं थे और यहां मेरी बीवी को इसी हफ़्ते मर्सिडीज़ एस खरीदनी है क्योंकि पिछले साल की जगुआर एफ से उसका जी भर गया है.
वैसे दाना मांझी की कहानी पूरे देश के मुंह पर एक तमाचा है. सरकार को शर्म आनी चाहिए, इतनी संगदिली...तौबा...तौबा...तौबा.
अगर मुझे कल एक हाइवे कॉन्ट्रैक्ट का डेढ़ हज़ार करोड़ रुपए का टेंडर ना भरना होता तो मैं ज़रूर दाना मांझी के गांव जाता. मगर कोई बात नहीं. कौन सा ये आख़िरी दाना मांझी हैं. अगली बार चला जाऊंगा अगर समय मिला तो.
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