'फ़ौजी हुकूमत के ख़िलाफ़ लिखने का मज़ा ही कुछ और'

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- Author, उरूज जाफरी
- पदनाम, कराची से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
कराची ना सिर्फ पाकिस्तान का सबसे बड़ा शहर है बल्कि सांस्कृतिक गहमा-गहमियों की वजह से लंबे समय से एक दिलचस्प शहर माना जाता रहा है. चाहे यहां के हिंदू और मुस्लिम जिमखाना के रंगारंग समारोह हों या मोहट्टा पैलेस की नयाब नुमाइश.
फिर अस्सी और नब्बे के दौर में कराची सियासी उठापटक का शिकार हुआ और यह सांस्कृतिक सरजमीं जैसे गुम सी हो गई.
इस दौर में कराची के थियेटर को भी नज़र लग गई. मगर पाबंदियों के दौर में भी कराची के थियेटर में गज़ब का काम हुआ.
पिछले दिनों मैं नेशनल एकैडमी ऑफ़ परफॉर्मिंग आर्ट्स (एनएपीए) में एक नाटक का रिहर्सल देखने पुहंची और जाना वहां कराची के थियेटर का मौजूदा हाल.
वहां मेरी मुलाकात जोशिंदर कौर चग्गर से हुई जो ऑस्ट्रेलिया में पैदा हुईं एक थियेटर डायरेक्टर हैं. वो पिछले कुछ सालों से सुनील शंकर के साथ मिलकर कराची में थियेटर करती हैं.
मैंने उनसे जाना चाहा कि पाकिस्तान में थियेटर करने का उनका तजुर्बा कैसा रहा जब कि वो यहां के लिए ग़ैर-मज़हबी हैं.
क्या कभी दोस्तों से या मिलने वालों से उन्हें ग़ैर होने का अहसास हुआ.

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उनका कहना था, "मुझे तो बिल्कुल भी ऐसा नहीं लगता कि कुछ ऐसी अलग बात है."
थियेटर किस हद तक एक कलाकार की ज़िंदगी पर असर डालती है, इसे एनएपीए की एक कलाकार एरम बशीर के इस बयान से समझा जा सकता है, "मैं नहीं समझती हूं कि एक कलाकार ऐसी बात सोच सकता है. क्योंकि हो सकता है उसे उसी वक़्त वैसी ही हालात पेश करनी हो. एक कलाकार का पूरा दिमाग पूरी तरह से खुल चुका होता है. कराची के हालात के बारे में तो आपको ख़ुद भी नहीं पता होता है कि कब बिगड़ जाए."
कराची शहर में हाल में ही मशहूर शायर अमजद साबरी का क़त्ल कर दिया गया और उस वक्त पूरे शहर में गम का मौहाल छा गया था. ऐसे वाकये एक कलाकार पर क्या असर डालती है.
भारतनाट्यम करने वाली सुआही अबरो कहती हैं कि यह सब मायुस तो करता है मगर डराता नहीं.
यह तो आज के थियेटर वालों की बात हुई क्या अस्सी और नब्बे के दशक में भी थियेटर करना मुश्किल था जब मुल्क और कराची शहर में जबान बंदी का दौर था.

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मंच की मशहूर कलाकार और तहरीक-ए-निस्वां की चेयरपर्सन सीमा किरमानी कहती हैं, "पहले तो सिर्फ ज़बान बंदी का दौर था. यानी स्टेट या हुकूमत की कलाकारों और लिखने वालों पर सख़्त नज़र होती थी लेकिन अब तो समाज में ही बर्दाश्त करने की प्रवृति कम हो गई है."
जब उनसे मैंने पूछा कि अस्सी और नब्बे के दशक में या आज भी कभी थियेटर के ज़रिए से कही जाने वाली विषयों पर उन्हें समझौता करना पड़ा.
सीमा किरमानी ने समझौता करने की बात से साफ़ इंकार किया.
कराची शहर के थियेटर की बात हो और डायरेक्टर-एक्टर, लेखक और पत्रकार इमरान शीरवानी का नाम ना आए, ऐसा हो ही नहीं सकता.

कराची में मौजूदा थियेटर की हालत और गुजरे जमाने पर उनका मानना है, "थियेटर करना जितना पहले मुश्किल था उसमें और आज में कोई ख़ास फ़र्क नहीं आया है. नब्बे के दशक की शुरुआत में हमारे नाटकों में समाज में बढ़ रही असहिष्णुता की बात पूरे जोर-शोर से रखी जाती थी फिर चाहे वो खालिद अहमद का लिखा हुआ नाटक 'यहां से शहर को देखो' हो या फिर मोहम्मद हनीफ का नाटक 'मरने के बाद क्या होगा' या फिर मोईन कुरैशी का 'गूंगा दर्पण'. सबमें इसी मुद्दे पर बात होती थी."
उनका मानना है कि कराची में अब थियेटर करने की जगहें कम हो गई हैं. वो कहते हैं कि फ़ौजी हुकूमत के दौरान जो लिखने का मज़ा था, वो शायद अब नहीं.
रौशनियों का शहर कराची आज भी सांस लेता है, हंसता है, मुस्कुराता है और कितने ही बेघरों को सहारा देता है.
यहां लोग रोज़ ज़िंदगी की तलाश में नई सुबह का इंतज़ार करते हैं और यही इसकी ख़ूबसूरती है.
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