..तभी भारत घुटने टेकने को मजबूर होगा: पाक मीडिया

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने कश्मीर समस्या को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए 22 सांसदों का एक दल बनाया है

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    • Author, अशोक कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत-प्रशासित कश्मीर के हालात हों या फिर बलूचिस्तान में अशांति, पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में भारत पर लगातार निशाना साधा जा रहा है.

‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि भारत ने कश्मीर मुद्दे पर बात करने से साफ़ इनकार कर दिया है और कहा है कि सिर्फ़ सीमापार से होने वाली दहशतगर्दी पर बात होगी.

अख़बार की राय में भारत अंतरराष्ट्रीय दबाव में ही कश्मीरियों का हक़ देने और उनके ऊपर ज़ुल्म बंद करने के लिए मजबूर हो सकता है.

अख़बार कहता है कि पाकिस्तान अपनी राजनयिक सरगर्मियां और तेज़ करे ताकि भारत अगले महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा में घुटने टेकने को मजबूर हो जाए.

‘औसाफ़’ लिखता है कि पाकिस्तान भारत के साथ कश्मीर समेत सभी मुद्दों पर सार्थक बातचीत चाहता है लेकिन भारत कोई न कोई बहाना बनाकर वार्ता की प्रक्रिया से भाग जाता है.

कश्मीर में जारी अशांति को 50 दिन पूरे हो गए हैं

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अख़बार के मुताबिक़ पाकिस्तान और भारत के बीच बातचीत कश्मीर मुद्दे को एजेंडे में सबसे ऊपर रखे बिना नहीं हो सकती.

वहीं ‘एक्सप्रेस’ ने बलूचिस्तान के बंदरगाह शहर ग्वादर में गुरुवार को एक हमले में एक तहसीलदार समेत सात लोगों की मौत का ज़िक्र करते हुए भारत की तरफ़ उंगली उठाई है.

अख़बार के मुताबिक़ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों बलूचिस्तान को लेकर जो बयान दिया, उससे साफ़ हो जाता है कि भारत पाकिस्तान को नुक़सान पहुंचाने के लिए चरमपंथियों को ट्रेनिंग और हथियार मुहैया करा रहा है.

अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान बलूचिस्तान में भारत की दख़लंदाज़ी के सबूत अमरीका को मुहैया करा चुका है लेकिन वो इस बारे में पूरी तरह ख़ामोश है.

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वहीं रोज़नामा ‘दुनिया’ का कहना है कि बलूचिस्तान में दहशतगर्दी की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए वहां सैन्य ऑपरेशन तेज़ करने की ज़रूरत है.

ग्वादर को पाकिस्तान-चीन आर्थिक कोरिडोर के ज़रिए शिनचियांग से जोड़े जाने की परियोजना की तरफ़ इशारा करते हुए अख़बार लिखता है कि ग्वादर बंदरगाह से पाकिस्तान का भविष्य जुड़ा है.

अख़बार के मुताबिक़ भारत ने तो खुल्लम खुल्ला एलान कर रखा है कि वो आर्थिक कोरिडोर परियोजना को कामयाब नहीं होने देगा.

अख़बार कहता है कि ज़रूरत इस बात की है कि सेना बलूचिस्तान और क़बायली इलाक़ों में अपनी कार्रवाई को जारी रखे और साथ ही अफ़ग़ानिस्तान में भारत समर्थक और पाकिस्तान विरोधी लॉबी पर नज़र रखी जाए और उनकी साज़िशों और गतिविधियों का मुक़ाबला किया जाए.

वहीं ‘जंग’ ने लिखा है कि काबुल में स्थित अमरीकी यूनिवर्सिटी में दहशतगर्दी हमले की योजना अफ़ग़ान राष्ट्रपति के मुताबिक़ पाकिस्तान में बनी थी.

अख़बार कहता है कि इससे पहले पेशावर आर्मी स्कूल में मासूम बच्चों के क़त्ल-ए-आम समेत पाकिस्तान में दहशतगर्दी के कई बड़ी वारदातों की साज़िश अफ़ग़ानिस्तान में रची गई थी.

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अख़बार लिखता है कि दोनों देश दहशतगर्दों के निशाने पर हैं और इसलिए उन्हें एक दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय मिल कर काम करना होगा.

रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ लिखता है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने अफ़ग़ान राष्ट्रपति को टेलीफ़ोन बातचीत में भरोसा दिलाया है कि पाकिस्तानी सरज़मीन को अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ इस्तेमाल नहीं होने दिया जाए.

अख़बार कहता है कि अस्थिर अफ़ग़ानिस्तान की वजह से पाकिस्तान समेत पूरा क्षेत्र अस्थिरता का शिकार है इसलिए अफ़ग़ानिस्तान को पाकिस्तान की बात पर भरोसा करना चाहिए और आरोप लगाने से गुरेज़ करना होगा.

रुख़ भारत का करें तो ओडिशा में एक आदिवासी के कंधे पर पत्नी का शव रख कर 10 किलोमीटर तक पैदल चलने की घटना पर 'हमारा समाज' का संपादकीय है- शर्मिंदगी.

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अख़बार लिखता है कि कालाहांडी ज़िले के दीना मांझी का कहना है कि पत्नी की मौत के कई घंटों तक वो अस्पताल प्रशासन के सामने गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन उन्हें गाड़ी नहीं मुहैया कराई गई और हार कर वो शव को एक कपड़े में लपेट कर उसे कंधे पर उठाकर चल दिए.

अख़बार की राय है कि राज्य में बीजेडी की सरकार अपनी हर रैली और कार्यक्रम में ख़ुद को जनता की हमदर्द बताती है लेकिन उसी बीजेडी के प्रशासन ने दीना माझी के ऐसा सलूक किया कि सब इंसानों की आंखें नम हो गईं.

वहीं 'हमारा समाज' ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के इस बयान का ज़िक्र किया है जिसमें वो महात्मा गांधी के हत्या के सिलसिले में आरएसएस पर दिए अपने बयान पर क़ायम हैं.

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अख़बार लिखता है कि आरएसएस समर्थक पत्रकारों ने ये बात फैला दी थी कि राहुल ने संघ को गांधी की हत्या का ज़िम्मेदार नहीं ठहराया है, बल्कि सिर्फ़ इतना कहा है कि संगठन के कुछ लोग इसके लिए ज़िम्मेदार थे.

लेकिन राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा कि वो अपने बयान के एक-एक शब्द पर क़ायम हैं.

अख़बार कहता है कि 2014 में मिली भारी जीत के बाद भाजपा और संघ परिवार को भ्रम हो गया कि उन्हें राष्ट्रवादी होने के नेता ही लोगों ने वोट दिया है और वो हिंदू राष्ट्र के गठन को ही अपना लक्ष्य मानने लगे, लेकिन अब समाज के कई वर्गों से उन्हें चुनौती मिल रही है.

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