'मोदी का जो यार है, ग़द्दार है, ग़द्दार है'

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    • Author, अशोक कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बलूचिस्तान पर दिए गए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों को पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में बहुत तवज्जो दी गई है.

'जंग' ने संपादकीय लिखा है- मोदी को बलूचिस्तान का जवाब.

अख़बार कहता है कि प्रांतीय राजधानी क्वेटा समेत सभी छोटे बड़े शहरों में लोग सड़कों पर निकले और ज़ुबान पर ‘मोदी का जो यार है, ग़द्दार है ग़द्दार है’ और ‘बलूचिस्तान में भारतीय दख़ल नामंज़ूर’ जैसे नारे थे.

अख़बार ने बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सनाउल्लाह ज़हरी के इस बयान को भी अहमियत दी है कि मुट्ठी भर लोग चंद टकों की ख़ातिर भारत को सलाम कर रहे हैं.

मोदी की तारीफ़ करने वाले बलोच अलगाववादी नेता बराहमदाग़ बुगती को ग़द्दार बताते हुए 'नवा-ए-वक़्त' कहता है कि वो जिस सूबे की नुमाइंदगी का दावा कर रहे हैं, वहां क़दम रखने की भी जुर्रत नहीं कर सकते.

अख़बार के मुताबिक़ बलूचिस्तान पर बयान देकर मोदी ने रेड लाइन पार की है तो इसका जबाव सरकार की तरफ़ से आना चाहिए और ख़ासकर प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को मोदी को फ़ोन कर नाराज़गी जतानी चाहिए.

'जसारत' लिखता है कि ये प्रदर्शन मोदी के इस दावे का जवाब है कि बलूचिस्तान का मुद्दा उठाने के लिए उनका आभार जताया है.

अख़बार कहता है कि मोदी ने भारत प्रशासित कश्मीर की तुलना बलूचिस्तान और गिलगित से करके ऐसी हिमाक़त की है कि भारत में भी उनकी आलोचना हो रही है.

'दुनिया' लिखता है कि ये प्रदर्शन इस बात का सबूत हैं कि बलूचिस्तान के लोगों का दिल पाकिस्तान के साथ धड़कता है और वो इससे अलग होने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं.

लेकिन अख़बार ये भी कहता है कि अगर ये प्रदर्शन सिर्फ़ बलूचिस्तान ही नहीं, बल्कि बाक़ी तीन प्रांतों में भी होते तो इनका और ज़्यादा असर होता.

अख़बार के मुताबिक़ फिर 'मोदी एंड कंपनी' को ये संदेश मिलता कि अन्य तीन प्रांतों को बलूचिस्तान इस क़दर अज़ीज़ है कि वो अपने भाइयों को कभी अलग नहीं होने देंगे.

उधर रोज़नामा 'इंसाफ़' ने पाकिस्तान की तरफ़ से भारत को कश्मीर के मुद्दे पर वार्ता के न्योते पर संपादकीय लिखा है- बातचीत का बेमक़सद खेल बंद होना चाहिए.

अख़बार ने भारत प्रशासित कश्मीर में जारी हालात के बीच 80 से ज़्यादा लोगों की मौत का दावा करते हुए लिखा है कि ये अब किसी एक क्षेत्र या देश का नहीं बल्कि इंसानियत का मसला बन गया है.

अख़बार के मुताबिक़ अमरीका ने भी कभी कश्मीरियों का हक़ दिलाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई, बल्कि यही रट लगा रखी है कि पाकिस्तान न सिर्फ़ अपनी सरज़मीन पर बल्कि पूरे क्षेत्र में दहशतगर्दी को रोके.

वहीं 'एक्सप्रेस' ने 'भारत की पुरानी रागनी' शीर्षक से लिखा है कि भारत ने कश्मीर मसले पर बातचीत की दावत को ख़ारिज करते हुए सिर्फ़ दहशतगर्दी पर बातचीत की इच्छा जताई है.

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अख़बार के मुताबिक़ पर्यवेक्षक कहते हैं कि भारत की सरकार फ़ैसला कर चुकी है कि कश्मीर पर पाकिस्तान से कोई बात न की जाए ताकि दुनिया को लगे कि जम्मू कश्मीर विवादित हिस्सा नहीं बल्कि भारत का ही हिस्सा है.

अख़बार कहता है कि तो फिर मसला कैसा हल होगा, ऐसे में वैश्विक ताक़तों को चाहिए कि वो दक्षिण एशिया में शांति क़ायम करने के लिए हस्तक्षेप करें.

रुख़ भारत का करें तो 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' ने संपादकीय लिखा है- कमाल की लड़कियां.

अख़बार लिखता है कि पहले रियो में फ्री स्टाइल कुश्ती में साक्षी का कांस्य पदक जीतना और उसके अगले ही दिन महिला बैडमिंटन सिंगल्स के फाइनल में पीवी सिंधू का जगह बनाना साबित करता है कि बेटियों को मौक़ा मिले तो वो आसमान को छू सकती हैं.

अख़बार के मुताबिक़ दीपा कर्मकार जिमनास्टिक्स में चौथे स्थान पर रहीं और पदक से महरूम रह गईं लेकिन इस मुक़ाम तक पहुंचने वाली वो पहली भारतीय खिलाड़ी हैं.

इसी तरह स्टेपल चेज़ में पहुंचने वाली ललिता बाबर के बारे में अख़बार कहता है कि उनकी कामयाबी को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता क्योंकि तीन दशक बाद किसी भारतीय महिला ने ये कारनामा किया है.

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अख़बार की राय है कि साक्षी की कामयाबी न सिर्फ़ लैंगिक अनुपात के मामले में सबसे पीछे उनके राज्य हरियाणा बल्कि पूरे देश को प्रेरणा देगी कि मौक़ा मिले तो लड़कियां कमाल कर सकती हैं.

रोज़नामा 'ख़बरें' ने ओलंपिक में भारत को उम्मीद से मुताबिक़ पदक न मिलने का मुद्दा उठाया है.

अख़बार ने लिखा है कि जब तक खेलों में ईमानदारी नहीं बरती जाएगी, तब तक चमन में एक दो फूल ही खिलेंगे लेकिन उसे गुलज़ार बनाना है तो तमाम भेदभावों को छोड़ सभी खेलों को एक नज़र से देखना होगा.

अख़बार की राय है कि कंपनियां क्रिकेट के साथ साथ अन्य खेलों पर भी ध्यान केंद्रित करें तो खिलाड़ियों का हौसला बरक़रार रहे.

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