‘गाय हो या कोई और बहाना, हमले बर्दाश्त नहीं’

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
धार्मिक अल्पसंख्यकों पर होने वाले हमलों को लेकर भारत की आलोचना करने वाली अमरीकी रिपोर्ट पाकिस्तानी उर्दू मीडिया की तवज्जो का केंद्र है.
‘औसाफ़’ लिखता है कि अमरीकी विदेश मंत्रालय ने धार्मिक आज़ादी से जुड़ी 2015 की अपनी रिपोर्ट जारी कर दी है.
अख़बार कहता है कि धार्मिक आज़ादी को लेकर विशेष अमरीकी दूत डेविड स्टेन ने भारत में मुसलमानों समेत सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ होने वाली बर्ताव पर चिंता जताई है.
अख़बार ने अमरीकी रिपोर्ट में पाकिस्तान पर कहीं गई नकारात्मक बातों का जिक्र भर किया है, जबकि उसके संपादकीय के शीर्षक से भारत को लेकर तल्खी साफ़ दिखती है.
शीर्षक है: अमरीका की नरेंद्र मोदी से मांग, मानवाधिकार का ध्यान रखा जाए.
वहीं ‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि डेविड स्टेन ने एक सवाल के जबाव में कहा, “गौमांस हो या कोई और बहाना, मुसलमानों समेत अल्पसंख्यकों पर हमले स्वीकार नहीं किए जा सकते.”

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अख़बार लिखता है कि भारत में लोग गाय का गोश्त रखने भर के संदेह में हिंदू कट्टरपंथियों की जुनूनियत का शिकार बन रहे हैं.
अख़बार की राय में आज अमरीका को भी अहसास हो रहा है कि भारत में मुसलममानों और अन्य अल्पसंख्यकों को तंग किया जा रहा है तो फिर उसे भारत के हाथ रोकने चाहिए.
रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ ने क्वेटा में हालिया हमले के लिए जहां भारतीय ख़ुफिया एजेंसी रॉ की गतिविधियों पर सवाल उठाया है, वहीं पाकिस्तान के सुरक्षा प्रबंधों को भी नाकाफ़ी कहा है.
अख़बार लिखता है कि कहीं न कहीं कमज़ोरी तो ज़रूर है, जिसका फ़ायदा उठाकर दहशतगर्द धमाके करने में कामयाब हो जाते हैं.

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अख़बार कहता है कि दहशतगर्दी को ख़त्म करना है तो सभी पहलुओं को ध्यान में रख कर रणनीति बनानी होगी.
वहीं ‘जंग’ ने पाकिस्तानी क्रिकेटर हनीफ़ मोहम्मद के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है कि वो उन चंद खिलाड़ियों में शामिल थे जिन्होंने युवाओं की तीन पीढ़ियों में क्रिकेट का शौक़ और जज़्बा पैदा किया.
अख़बार लिखता है कि हनीफ़ मोहम्मद की ज़िंदगी की पारी तो ख़त्म हो गई है लेकिन उनका शानदार किरदार और खेल आने वाले कई दशकों तक युवाओं को प्रेरित करता रहेगा.
‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि 1958-59 में हनीफ़ मोहम्मद ने सर डॉन ब्रेडमैन से फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट की एक पारी में सबसे ज़्यादा व्यक्तिगत स्कोर का रिकॉर्ड छीन लिया था.

अख़बार के मुताबिक़ ये रिकॉर्ड उन्होंने 499 रन बनाकर अपने नाम किया और किसी क्रिकेटर को ये रिकॉर्ड तोड़ने में 35 साल लग गए जब 1994 में ब्रायन लारा ने 501 रन बनाए.
रोज़नामा ‘दुनिया’ ने पाकिस्तानी संसद में विपक्ष के विरोध के बावजूद साइबर बिल के पास होने को बेहद अहम बताया है.
अख़बार कहता है कि ये क़ानून भड़काऊ, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और चरमपंथ को बढ़ावा देने वाली सामग्री को फैलने से रोकने में मदद करेगा.
लेकिन अख़बार ने ये भी लिखा है कि दूसरे मामलों में इसे लागू करने पर सवाल भी उठेंगे.
अख़बार के मुताबिक़ ये विचारों पर पाबंदी का दौर नहीं बल्कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का जमाना है.
रुख़ भारत करें तो ‘जदीद ख़बर’ ने तथाकथित गौरक्षकों पर जारी बहस को अपने संपादकीय का विषय बनाया है.
अख़बार कहता है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकारों को भेजी अपनी एडवायज़री में लिखा है कि गौरक्षा के नाम पर किसी भी हिंसक घटना को बर्दाश्त न करें.
प्रधानमंत्री के बयानों के बाद आई इस एडवायजरी पर अख़बार लिखता है कि दो साल से मुसलमानों के ख़िलाफ़ देश में गौरक्षकों ने जो बर्बरियत का बाज़ार गर्म कर रखा था, उस पर मोदी इसलिए चुप थे कि मुसलमान उनका वोट बैंक नहीं हैं.

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अख़बार की राय है कि जब प्रधानमंत्री ने महसूस किया कि गौरक्षा की ये मुहिम अब मुसलमानों से आगे बढ़ कर दलितों की गर्दन तक पहुंच गई है तो उन्होंने 80 फीसदी गौरक्षकों को फ़र्ज़ी क़रार दे दिया है.
वहीं भारत प्रशासित कश्मीर के हालात पर ‘राष्ट्रीय सहारा’ का संपादकीय है- कश्मीर मसले पर संजीदगी की ज़रूरत.
अख़बार लिखता है कि कश्मीर के सभी ग्रुपों के साथ बातचीत करनी होगी, लेकिन ये शर्त ज़रूरी है कि पाकिस्तान के समर्थन वाले संगठन पहले हथियार डालें.
अख़बार कहता है कि आज कश्मीर में कुछ गुमराह लोग ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के नारे लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें भी ये विश्वास दिलाना होगा कि भारत उन्हें वो सब सुविधाएं मुहैया कराएगा जो अन्य राज्यों में लोगों के पास हैं.

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वहीं ‘रोज़नामा ख़बरें’ ने भी यही लिखा है कि जब तक वहां की जनता को भरोसे में नहीं लिया जाएगा, वहां ऐसे ही हालात बने रहेंगे.
साथ ही अख़बार ने सुरक्षा व्यवस्था को चाकचौबंद करने पर ज़ोर दिया है ताकि सीमापार से कथित ‘घुसपैठ और दखलंदाजी’ को रोका जा सके.
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