सिर्फ़ पढ़ाई नहीं, नई ज़िंदगी की शुरूआत है ये

पश्चिम में कॉलेज में जाने के साथ ही एक नई जिंदगी शुरू हो जाती है

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    • Author, ब्रजेश उपाध्याय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन

वॉशिंगटन डीसी में अगस्त की एक ठहरी हुई, उदास सी दोपहर.

उदास इसलिए क्योंकि ये शहर बहुतों को वैसे भी उदास और बंद गले का कोट सा नज़र आता है, ख़ासकर न्यूयॉर्क वालों को. ठीक उसी तरह जैसे मुंबई वाले दिल्ली को बोरिंग और डेड सिटी कहते हैं.

और अगस्त में तो डीसी जैसे थम सा जाता है. कांग्रेस छुट्टी पर, ओबामा छुट्टी पर, स्कूल कॉलेज बंद, पैसे वाली जनता दूर-दराज़ की ख़ूबसूरत वादियों में सैर पर और बिन पैसे वाली जनता दो तीन घंटे की ड्राइव पर पास के समंदर में ग़ोते लगाने निकली होती है.

ऐसी ही एक उदास सी दोपहर को मैं जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के पास से गुज़र रहा था. यूनिवर्सिटी के हॉस्टल या जिन्हें यहां डॉर्म्स कहते हैं ख़ामोश नज़र आ रहे थे. अभी एक हफ़्ते की छुट्टियां और बाक़ी थीं. नज़र पड़ी एक बड़ी सी गाड़ी पर और उसमें से सामान उतार रहे एक परिवार पर.

मां-बाप, एक बेटी उम्र सत्रह-अठारह, एक बेटा उम्र बारह-तेरह, एक कुत्ता उम्र पता नहीं और ढेर सारा सामान.

बेटी ने सबसे भारी दिखनेवाले सूटकेस को उतारने की कोशिश की, पिता ने उसे पीछे हटाकर सूटकेस उतार दिया, कुछ कहा जो मैं उतनी दूर से सुन नहीं पाया लेकिन बेटी ने कंधे-उचकाए और बेटा हंसने लगा.

बेटी देख रही थी कि कोई और तो नहीं देख रहा. ये उसकी नई ज़िदगी की शुरूआत हो रही थी, आज़ाद, मां-बाप से दूर और यहां उसे हर कुछ ख़ुद करना था.

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परिंदा चिड़िया का घोंसला छोड़ रहा था. अब उसे अपना घोंसला तैयार करना था.

गाड़ी से और भी सामान उतारा जाने लगा. एक पुरानी सी साइकिल, एक गिटार, बिस्तर का मैट्रेस, किताबें और न जाने क्या क्या. कुत्ता बार-बार बेटी के पास भागना चाहता था लेकिन मां ने उसे पकड़ रखा था.

मैं थोड़ी देर वहां ठहर गया. न जाने कितनी अमरीकी फ़िल्मों में ये सीन पर्दे पर देख चुका था, पहले भी कुछ यूनिवर्सिटीज़ के बाहर अगस्त में इस तरह का माहौल देख चुका था लेकिन उस दिन न जाने क्यों वहां रुक कर सबकुछ देखता रहा.

पंद्रह-बीस मिनट में सारा सामान अंदर चला गया और मिनटों बाद मां-बाप, बेटा और कुत्ता बाहर आ गए. बेटी साथ नहीं आई. बेटा और कुत्ता गाड़ी के अंदर बैठ गए, मां-बाप गाड़ी के दरवाज़े से टेक लगाकर डॉर्म के दरवाज़े की तरफ़ देख रहे थे. और फिर वो बाहर आई, पिता ने हल्के से गले लगाया, मां ने कसकर भींच लिया. बेटा बस हाथ हिलाकर अपने फ़ोन में लग गया.

अमरीकी ज़िंदगी का ये एक बेहद अहम पड़ाव था. कॉलेज जाने का मतलब सिर्फ़ पढ़ाई नहीं एक नई, अलग, आज़ाद ज़िंदगी की शुरूआत होती है यहां.

बेटी के फ़ैसले अब उसके होंगे, सलाह-मशविरा होगा लेकिन ज़िम्मेदारी उसकी होगी.

कोई कहता नहीं है लेकिन ये एक परमांनेट किस्म की गुडबाय होती है और ये सबको पता होता है.

फ़िलहाल मां-बाप बेटी के एक खाली कमरे को बार-बार देखेंगे, कुत्ता बार-बार उस कमरे का चक्कर लगाएगा और लेकिन घर का वो कमरा अब बेटी का नहीं होगा.

उसके बचपन के खिलौने वहां होंगे, तस्वीरें वहां होंगी, गुलाबी चादर और लिहाफ़ भी होंगे लेकिन मां-बाप के साथ वो तभी रहेगी जब मजबूरी होगी. और ऐसा अगर हुआ तो समाज की नज़रों में वो "लूज़र" कहलाएगी, नाकामयाब कहलाएगी.

छुट्टियां, शादियां, क्रिसमस और शायद कोई जन्मदिन - अब यही मौक़े होंगे जब पूरा परिवार साथ होगा.

बेटा शायद अब पहले से कहीं ज़्यादा मैच्योर नज़र आएगा क्योंकि कुछ दिनों में उसे भी इसी दौर से गुज़रना होगा.

सितबंर में पतझड़ का मौसम आएगा. पत्ते पेड़ का साथ छोड़ने को मचलेंगे और फिर हवा के एक झोंके के साथ अलग हो जाएंगे.

अमरीकी ज़िंदगी का एक और चक्र शुरू हो जाएगा.

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