'अमरीका की राजनीति बनी रियलिटी शो'

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    • Author, ब्रजेश उपाध्याय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन

प्रिय इवांका

तुम्हारे पिता की तबियत ठीक नहीं है. वो दिन ब दिन नीचे गिर रहे हैं. उन्हें मदद की ज़रूरत है. कुछ करो. उन्हें इस भीड़ से दूर ले जाओ.

ये ख़त लिखा है जानेमाने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मकार माइकल मूर ने डॉनल्ड ट्रंप की सबसे चहेती बेटी इवांका ट्रंप के नाम.

एक और साहब ने भी इवांका को सुझाव दिया है कि वक़्त आ गया है कि वो अपने पिता को लेकर किसी सैर पर निकल जाएं, मार्टिनी की चुस्की लें और ज़िंदगी के मज़े लूटें. बहुत हो ली राजनीति.

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वैसे सुझाव बुरा नहीं है.

देखा जाए तो ट्रंप साहब ने पिछले एक साल में जो कर दिखाया है वो बरसों से कोई नहीं कर पाया.

अमरीका की उबाऊ राजनीति को उन्होंने बिल्कुल रियलिटी शो की तरह मसालेदार बना दिया. हर दिन वो कोई ऐसा कारनामा कर जाते हैं कि आप कोई भी न्यूज़ चैनल लगा लें, वेबसाइट पर चले जाएं--बस ट्रंप, ट्रंप, ट्रंप की गूंज सुनाई देती है.

राजनीति को उन्होंने सही मायने में मज़ाक नहीं तो मज़ाकिया ज़रूर बना दिया है. एक बयान देते हैं, मीडिया में हंगामा मचता है और फिर कहते हैं मैंने तो बस मज़ाक किया था.

कभी रोते हुए बच्चे को अपनी रैली से बाहर निकलवाते हैं, कभी वो वीडियो देखने का दावा करते हैं जो किसी और ने देखा ही नहीं है, कभी हिलेरी को बंदूक की धमकी दे डालते हैं, कभी रूस को अमरीका में सेंध लगाकर क्लिंटन के ईमेल चुराने की दावत देते हैं--और फिर स्कूली बच्चे की तरह कह देते हैं कि मैं तो मज़ाक कर रहा था.

अमरीकी कॉमेडी शोज़ की रेटिंग इन दिनों मैंने देखी नहीं है लेकिन मेरा अंदाज़ा है कि वो कम हो गई होगी. आख़िर जब चौबीस घंटे की कॉमेडी चल रही हो तो रात ग्यारह बजे तक जग कर कॉमेडी शो का इंतज़ार कोई क्यों करे.

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इतने भोले-भाले इंसान की राजनीति में क्या ज़रूरत है?

ब्रिटेन हो, रूस हो, मेक्सिको हो, सऊदी अरब हो, भारत हो, पाकिस्तान हो--बच्चा-बच्चा अब ट्रंप का नाम जानता है.

कोई उन्हें सर पर बिठाकर पूज रहा है तो कोई ठोकर मार रहा है लेकिन ट्रंप को अब जानते सब हैं.

ऐसी ब्रांडिंग के बाद तो अब वक्त है बिज़नेस करने का. राजनीति में क्या रखा है.

वैसे भी सुना है कि जब से इस चुनावी अभियान में कूदे हैं उनका अपना कारोबार थोड़ा मंदा हो गया है.

ट्रंप के होटलों और गॉल्फ़ कोर्स में जानेवालों की तादाद कम हो रही है. अमरीका को महान बनाते-बनाते वो ख़ुद न कंगाल हो जाएं.

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जो इंसान मेक्सिको की सीमा पर ऐसी ऊंची दीवार बनाने की बात कर रहा हो जिसको पार करके कोई अमरीका में घुस नहीं सकेगा, उसके अपने घर यानि 58-मंज़िला ट्रंप टावर की दीवार पर एक सरफिरा 21वीं मंज़िल तक चढ़ आया और न्यूयॉर्क की ट्रैफ़िक ठप्प हो गई.

जिस रिपबलिकन पार्टी के टिकट पर वो चुनाव में खड़े हैं उसके बड़े-बड़े नेता अब कह रहे हैं कि पार्टी फंड का इस्तेमाल ट्रंप के चुनाव में नहीं बल्कि अमरीकी कांग्रेस के चुनाव में किया जाए.

ऐसे में तो राजनीति को बोरिंग लोगों के हवाले छोड़कर ट्रंप को अपनी दुनिया में लौटने की सलाह देनेवालों की बातें उन्हें सुन लेनी चाहिए.

शेन वार्न की तरह पूरे फ़ॉर्म में रहते हुए रिटायर करेंगे तो उसका अंदाज़ ही कुछ और होगा. वर्ना, नाम नहीं लूंगा, लेकिन कई ऐसे महारथी हुए हैं जिन्हें लोग सामने तो सराहते थे, पीछे से कहते थे--कब जाएगा--वाली हालत न हो जाए.

प्राइमरी मुकाबलों में सत्रह उम्मीदवारों को धूल चटाकर उन्होंने इतिहास रच दिया. अगर चुनाव से ढाई महीने पहले उम्मीदवारी वापस ले लें, तो वो भी ऐतिहासिक होगा.

लोग उन्हें बरसों तक याद करेंगे, दुनिया भी चैन की सांस लेगी.

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