लीडरशिप ट्रेनिंग से मिलेगी नई प्रतिभाएं

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किसी भी कंपनी की कामयाबी के लिए सबसे ज़रूरी है, नई प्रतिभाओं को तलाशना, उन्हें निखारना और बढ़ावा देना.
इसके बग़ैर कोई कंपनी तरक़्क़ी नहीं कर सकती. कामयाब नहीं हो सकती.
नई प्रतिभाएं तलाशने के लिए अक्सर कंपनियां लीडरशिप ट्रेनिंग के कार्यक्रम चलाती हैं.
मगर इनके कुछ ख़ास फ़ायदे नहीं होते. अक्सर ट्रेनिंग लेने वाले इनमें दिलचस्पी नहीं लेते.
वहीं ट्रेनिंग देने वाले बस औपचारिकता पूरी करके चलते बनते हैं.
लिहाज़ा कंपनियां नए टीम लीडर तैयार करने में अरबों रुपए ख़र्च करती हैं और नतीजा सिफ़र से ज़रा सा ही ज़्यादा होता है.
तो आख़िर क्या है सही तरीक़ा, जिसके ज़रिए कंपनियां नए रहनुमा तैयार कर सकती हैं?
जानकार इसके चार फॉर्मूले बताते हैं.
नियम नंबर 1: 70-20-10

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कंपनियों के नए टीम लीडर्स को ट्रेनिंग देने वाली संस्था सेंटर फॉर क्रिएटिव लीडरशिप ने ये फॉर्मूला ईजाद किया है.
इसके मुताबिक़ आपके सीखने में 70 फ़ीसदी हिस्सा आपके मुश्किल काम के तजुर्बे से आना चाहिए.
जिसमें आप नई चुनौतियों का सामना करना सीखते हैं. वहीं आपके सीखने का 20 फ़ीसदी हिस्सा साथियों के साथ तजुर्बे बांटकर आना चाहिए.
बाक़ी 10 फ़ीसदी आपको किसी पेशेवर कोर्स के ज़रिए सीखना चाहिए.
कुल मिलाकर ये कहें कि आपको मैनेजमेंट के लिए तैयार होना है तो सबसे ज़्यादा ज़ोर नए और चुनौती भरे काम करने पर होना चाहिए.
इसी दौरान ग़लतियों और नाक़ामियों से आप बहुत कुछ सीख सकते हैं.
इस बारे में साथियों से राय-मशविरा करके आप अपनी ग़लतियां सुधार सकते हैं.
कमियां दूर कर सकते हैं. मैनेजमेंट सीखने के लिए कोर्स से ज़्यादा असल काम करना फ़ायदेमंद रहता है.
नियम नंबर 2: खुद पकाकर खाइए

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कहने का मतलब ये कि मैनेजमेंट ट्रेनिंग के किसी भी कोर्स में कंपनी के सीनियर अधिकारियों की भागीदारी ज़रूरी है.
ये लोग अपने मातहत से रोज़ बातें करते हैं. उनसे काम लेते हैं.
दोनों के बीच अक्सर नए आइडिया पर चर्चा होती है. तमाम मुद्दों पर बहस होती है.
तो सीनियर अफ़सर अपने तजुर्बे, अपने मातहतों से बांटकर, ज़रूरत के नुस्खे बताकर, उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर सकते हैं.
इससे ये भी होता है कि नए टीम लीडर्स का भरोसा, अपने सीनियर पर होता है.
उन्हीं से सीखेंगे तो ज़्यादा आसानी होगी. कंपनी की ज़रूरतों को वो अच्छे तरीक़े से समझा भी पाएंगे.
नियम नंबर 3: हर कंपनी के लिए अलग ट्रेनिंग कोर्स ज़रूरी
बिज़नेस पढ़ाने वाले तमाम संस्थान मैनेजमेंट का एक कोर्स तैयार करके उसे सभी क्षेत्र की कंपनियों को बेच देते हैं.
मगर होता ये है कि हर कारोबार के लिए अलग नज़रिए की ज़रूरत होती है.
फ़ैशन के कारोबार में अलग तरह का हुनर चाहिए. वहीं खनन उद्योग के लिए अलग ट्रेनिंग की ज़रूरत होगी.
हर क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी की अपनी अलग चुनौती होती है.

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उसकी अपने टॉप मैनेजमेंट से अलग तरह की उम्मीदें होती हैं.
इसलिए हर क्षेत्र के लिए अलग मैनेजमेंट कोर्स होना चाहिए. इस काम में ऑनलाइन कोर्स काफ़ी कारगर हो सकते हैं.
नियम नंबर 4: आपके बॉस आपके सबसे अच्छे टीचर हैं
कोई भी टॉप मैनेजर अपने मातहतों के बीच से नए टीम लीडर तैयार करना चाहता है.
तो उसका सबसे अच्छा तरीक़ा है कि वो इसमें कामयाबी के नुस्खे ख़ुद अपने मातहतों को बताए.
अपना तजुर्बा बांटे. अपनी ग़लतियों से जो सबक़ लिया वो बताए.
अक्सर हम लोग अपने बॉस के साथ ज़्यादा वक़्त बिताते हैं.
ऐसे में उनके तजुर्बों से सीखना सबसे बेहतर तरीक़ा है.
अब ये बात बॉस को भी समझनी होगी कि उन्हें अगली पीढ़ी के टीम लीडर तैयार करने हैं.
वो कंपनी की ज़रूरतों, उसकी चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझते हैं.
फिर वो इस बात की निगरानी भी कर सकते हैं कि जिन लोगों से नए टीम लीडर बनने की उम्मीद है, वो कुछ सीख रहे हैं या नहीं.
उनके काम में बेहतरी आ रही है या नहीं. कुछ नयी बातें बताने की ज़रूरत हो तो बॉस फ़ौरन बुलाकर उन्हें कह सकते हैं.
किसी प्रोफ़ेशनल कोर्स में ये मुमकिन नहीं होगा.
हर साल तमाम कंपनियां मैनेजमेंट ट्रेनिंग देने के लिए अरबों रुपए ख़र्च करती हैं.
मगर इससे उम्मीद के मुताबिक़ नतीजे नहीं निकलते. फिर भी साल दर साल ये सिलसिला दोहराया जा रहा है.
इस उम्मीद में कि शायद इस बार किसी कोर्स से कामयाबी मिल जाए.
बेहतर होगा कि तमाम कंपनियां और उनका टॉप मैनेजमेंट, कुछ नए नुस्खे आज़माए.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160719-why-we-loathe-leadership-training" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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