ऐसे खुले मोदी के लिए अमरीका के बंद दरवाज़े

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    • Author, रौनक देसाई
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

अमरीकी कांग्रेस की प्रतिनिधि सभा के स्पीकर पॉल रायन के आमंत्रण पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आठ जून को अमरीकी संसद के साझा सत्र को संबोधित करेंगे.

यह दो सालों में नरेंद्र मोदी की चौथी अमरीकी यात्रा होगी.

नरेंद्र मोदी को मिला यह आमंत्रण दोनों देशों के बीच मज़बूत संबंधों का प्रतीक है.

लेकिन साथ ही साथ यह नरेंद्र मोदी को लेकर अमरीकी संसद के नज़रिए में बदलाव का भी संकेत है.

एक वो वक़्त था जब अमरीका में नरेंद्र मोदी के प्रवेश पर संसद ने रोक लगा रखी थी और आज वो अमरीका के एक अहम सहयोगी के रूप में देखे जा रहे हैं.

पहली नज़र में स्पीकर पॉल रायन का आमंत्रण एक रस्मी क़दम लगता है. 1984 के बाद से जिन भारतीय प्रधानमंत्रियों ने अपना निर्धारित पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है, उन सभी ने अमरीकी संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया है.

मोदी पांचवें भारतीय प्रधानमंत्री होंगे जो अमरीकी संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करेंगे.

इससे पहले 2005 में मनमोहन सिंह ने संयुक्त सत्र को संबोधित किया था. इस लिहाज से देखने पर यह एक औपचारिकता जैसा लगता है.

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लेकिन इस तरह से देखेंगे तो हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमरीका के साथ मुश्किल रिश्तों को नज़रअंदाज़ करेंगे.

2005 में अमरीकी संसद ने नरेंद्र मोदी के अमरीका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था. उस वक्त वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे.

उनका आरोप था कि नरेंद्र मोदी गुजरात में 2002 में सांप्रदायिक दंगे तो रोकने में नाकाम रहे. इन दंगों में लगभग 1000 लोगों की जान गई थीं.

अमरीकी अधिकारियों ने नरेंद्र मोदी का अमरीकी वीज़ा रद्द कर दिया था. इसके लिए अमरीकी संसद ने 1998 में बने क़ानून का सहारा लिया जिसके मुताबिक़ 'धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करने वाले' विदेशी अधिकारियों को अमरीका का वीज़ा नहीं दिया जाएगा.

वे अब तक अकेले ऐसे नेता हैं जिन्हें इस क़ानून की वजह से वीज़ा देने से इंकार किया गया.

क़रीब दस साल तक कई अमरीकी सांसद उनकी आलोचना करते रहे. इसके बावजूद कि भारत में हुई कई जांचों की रिपोर्ट में उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला है.

मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने के कुछ महीने पहले नवंबर 2013 में अमरीकी संसद के कई सदस्यों ने मोदी के वीज़ा रद्द किए जाने की सराहना की थी.

इसी दौरान उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में एक ऐसे प्रभावी प्रशासक की अपनी छवि गढ़ी जिसने गुजरात में जबरदस्त विकास किया.

दुनिया के कई नेताओं ने उन्हें गंभीरता से लेना शुरू कर दिया था.

अमरीकी संसद में भी कई सदस्यों ने कहना शुरू कर दिया था कि अमरीका को नरेंद्र मोदी के साथ अपने संबंध बेहतर करने चाहिए क्योंकि वो एक दिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री बन सकते हैं.

आख़िरकार 2014 में नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन ही गए और अमरीकी संसद में माहौल उनके पक्ष में होने लगा.

ओबामा प्रशासन ने तुरंत उनके लिए अपनी बाहें फैला दीं. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले अमरीका दौरे पर गए तो उनका जोरदार स्वागत हुआ.

ख़ुद राष्ट्रपति बराक ओबामा उन्हें मार्टिन लूथर किंग जूनियर स्मारक ले गए, जबकि उनके आधिकारिक कार्यक्रम में शामिल नहीं था.

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उपराष्ट्रपति जो बाइडन और विदेश मंत्री जॉन केरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मान में भोज दिया. इस भोज में अमरीकी संसद के दर्जनों सदस्यों ने शिरकत की थी.

उस वक्त अमरीकी संसद का सत्र नहीं चल रहा था, फिर भी सांसद भारत के प्रधानमंत्री मोदी से मिलने के लिए वॉशिंगटन आए थे.

लेकिन इस दौरे की सबसे अहम बात वॉशिंगटन में नहीं बल्कि न्यूयॉर्क में घटी थी जहां प्रवासी भारतीयों ने मैडिसन स्कवेयर में मोदी के स्वागत में एक रैली रखी.

इसमें भारतीय समुदाय के करीब बीस हज़ार भारतीय प्रवासियों ने पूरे जोश के साथ हिस्सा लिया. दर्जन भर अमरीकी सांसद मंच पर नरेंद्र मोदी के साथ खड़े थे.

इसने निश्चित तौर पर अमरीकी संसद के अंदर नरेंद्र मोदी की छवि को सुधारने में मदद की.

जब पहली बार मोदी अमरीका आए थे तब 100 सांसदों ने तब स्पीकर रहे जॉन बोहेनर को पत्र लिखकर कहा था कि नरेंद्र मोदी से संयुक्त सत्र को संबोधित करवाया जाए.

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हालांकि उस वक्त यह संभंव नहीं हो पाया था, इससे मोदी के प्रति कांग्रेस के बदले रुख़ का बख़ूबी अंदाज़ा हुआ.

अब दो साल के अंदर प्रधानमंत्री उस संसद को संबोधित करेंगे जिसने कभी मोदी के अमरीका में प्रवेश पर करीब एक दशक तक पाबंदी लगा रखी थी.

संयुक्त सत्र को संबोधित करना उनकी अकेले की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि ये उनके प्रवासी समर्थकों के लिए भी काफी मायने रखता है जो लगातार बाहर के देशों में उनकी छवि सुधारने में लगे हुए हैं.

प्रवासियों की कोशिशों के अलावा अमरीकी संसद के कई सदस्यों ने भी भारत को अमरीका के नज़दीक लाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोशिशों पर भी ध्यान दिया है.

वो शायद भारत को बदलने और उसे अमरीका के करीब लाने के नरेंद्र मोदी के प्रयासों की सराहना करते हैं.

हालांकि अब भी कुछ अमरीकी सांसद नरेंद्र मोदी के आलोचक हैं. लेकिन अब अमरीकी कांग्रेस में मोदी के समर्थकों की तादाद उनके आलोचकों से कहीं ज़्यादा है. कुछ साल पहले से तुलना करें तो ये एक बड़ा बदलाव है.

वॉशिंगटन में अमरीकी कांग्रेस की जो इमारत कभी मोदी विरोधी भावनाओं का स्रोत थी, अब वही उनके लिए पलकें बिछाए हुए है.

(रौनक देसाई न्यू अमरीका संस्था में फेलो हैं और हावर्ड यूनिवर्सिटी के बेल्फर्स सेंटर्स इंडिया एंड साउथ एशिया प्रोग्राम से संबद्ध हैं.)

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