पठानकोट हमला: 'भारत के झूठ की पोल खुली'

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान की उर्दू मीडिया में भारतीय जांच एजेंसी एनआईए के प्रमुख शरद कुमार का ये बयान छाया है कि पठानकोट हमले में पाकिस्तान सरकार या वहां की किसी एजेंसी का हाथ नहीं था.
'जंग' ने अपने संपादकीय की सुर्ख़ी लगाई- 'पठानकोट हमला: भारत के झूठ की पोल खुल गई'.
अख़बार लिखता है कि इस साल 2 जनवरी को भारतीय वायुसैनिक अड्डे पर हुए हमले को लेकर छह महीने से लगाए जा रहे आरोपों की झड़ी के बाद भारत ने आख़िर स्वीकार कर लिया है कि इस हमले में पाकिस्तान सरकार या उसकी एजेंसी की कोई भूमिका नहीं थी.

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अख़बार के मुताबिक़ शरद कुमार ने हमले की ज़िम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद पर डालते हुए उसके प्रमुख मौलाना मसूद अहज़र और उनके भाई के नाम चार्जशीट में डालने की बात कही है.
वहीं 'एक्सप्रेस' लिखता है कि सच्चाई को सात पर्दों में भी छिपाओ तो वो सबके सामने आकर रहती है, ये बात पठानकोट हमले को लेकर बिल्कुल सही साबित होती है.
अख़बार के मुताबिक़ पांच महीनों बाद ही सही, भारत की जांच एजेंसी एनआईए ने पाकिस्तान को क्लीन चिट दे दी है.
रोज़नामा 'दुनिया' लिखता है कि पाकिस्तान पहले ही दिन से कह रहा था कि पठानकोट हमले में हमले में उसका और उसकी एजेंसियों का कोई हाथ नहीं है, लेकिन भारत की यही नीति नज़र आई कि इस बारे में ज़्यादा से ज़्यादा शोर मचाया जाए और बार-बार आरोप लगाकर पाकिस्तान पर दबाव डाला जाए.
अख़बार के अनुसार इस बारे में अमरीकी अधिकारियों से भी झूठ बोला गया और इसलिए अमरीका भी पाकिस्तान पर दबाव डालता रहा.

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अख़बार कहता है कि पाकिस्तान विश्व समुदाय को बताए कि भारत न सिर्फ़ उसके ख़िलाफ़ झूठ फैलाता है बल्कि उसके आंतरिक हालात को भी ख़राब करने में लगा रहता है.
उधर 'औसाफ़' ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख राहील शरीफ़ के इस बयान को तवज्जो दी है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक कोरिडोर (सीपैक) समझौते के ख़िलाफ़ साज़िशों को नाकाम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.
अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान की पूरी कोशिश है कि विश्व स्तर पर सकारात्मक बदलाव का संकेत देने वाले इस महान समझौते को इसकी निश्चित अवधि में पूरा किया जाए.
अख़बार के मुताबिक़ भारत और अफ़ग़ानिस्तान के सहयोग से ईरान ने भी अपने चाबहार बंदरगाह को लेकर एक योजना बनाई है लेकिन ये किसी भी तरह सीपैक समझौते का विकल्प नहीं हो सकती है.
सीपैक पर आर्मी चीफ़ के बयान पर अख़बार लिखता है कि सेना ने जो भी चुनौती स्वीकार की है, वो देश की उम्मीदों पर खरी उतरी है, अब भी उसे कामयाबी मिलेगी.

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वहीं 'नवा-ए-वक़्त' ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि पाकिस्तान में होने वाले ड्रोन हमलों को लेकर राष्ट्रीय नीति पर सैन्य और असैन्य नेतृत्व को एकजुट होना चाहिए.
अख़बार लिखता है कि पाकिस्तानी संसद देश में हमले के इरादे से दाख़िल होने वाले ड्रोन को मार गिराने की मंज़ूरी दे चुकी है, इसलिए अगर हुक्मरान तबक़ा जुर्रत दिखाए तो ड्रोन मार गिराए जा सकते हैं.
अख़बार कहता है कि ईरान ने अमरीका के दो ड्रोन मार गिराए जबकि एक तो सुरक्षित उतार लिया, ऐसे में पाकिस्तान के पास तो ईरान से कहीं ज़्यादा उन्नत तकनीक मौजूद है.
अख़बार के मुताबिक सेना प्रमुख कहते हैं कि चरमपंथियों के ख़िलाफ़ जर्बे अज़्ब ऑपेरशन में 99 फ़ीसदी कामयाबी हासिल कर ली गई है, तो फिर एक फ़ीसदी के लिए अमरीकी ड्रोन हमलों की इजाज़त क्यों दी गई है.
अख़बार सवाल करता है कि अगर इजाज़त नहीं दी गई है तो ड्रोन्स मार क्यों नहीं गिराए जाते.
रुख़ भारत का करें तो अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी को लेकर पिछले दिनों आए विशेष अदालत के फ़ैसले की हर तरफ़ चर्चा है.

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'हमारा समाज' लिखता है- 'गुलबर्ग के क़ातिलों को सज़ा'.
अख़बार लिखता है कि 2002 के दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसाइटी में 400 लोगों की भीड़ ने जो क़त्ले आम मचाया उसके 14 साल बाद अदालत का फ़ैसला आया है.
अख़बार लिखता है कि ये बड़े संतोष की बात है गुलबर्ग के कातिलों को सज़ा मिलेगी.
अख़बार लिखता है कि गुलबर्ग सोसाइटी में मारे गए पूर्व सांसद एहसान जाफ़री की पत्नी ज़किया जाफ़री फैसले से संतुष्ट नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष एक अहम पैग़ाम देता है कि लगातार संघर्ष किया जाए तो एक दिन मुजरिमों को सज़ा और पीड़ितों को इंसाफ़ मिलता है.
वहीं 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' ने इसे निराश करने वाला फ़ैसला बताया है.
अख़बार के मुताबिक़ जकिया जाफ़री ने कहा है कि उन्हें अधूरा न्याय मिला है.
अख़बार के मुताबिक़ आम तौर पर यही माना जाता है कि ये हमला योजनाबद्ध तरीक़े से किया गया था और एक स्टिंग ऑपरेशन में भी लोगों को इसकी तैयारियों पर बात करते देखा गया था, लेकिन अदालत ने इसे साज़िश क़रार नहीं दिया है.
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