सिनेमा देखने गया था, चरमपंथी बन गया

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- Author, ओवन बेनेट-जोन्स
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लाहौर में हाल में हुआ आत्मघाती हमला, जिसमें 70 लोग मारे गए थे, एक युवक ने किया था.
ऐसे हमलों की वजह अक्सर साफ़ नहीं होती. लेकिन बीबीसी संवाददाता ओवेन बेनेट जोन्स को एक आदमी ने बताया कि एक चरमपंथी गुट में शामिल होते हुए उस युवक को पता नहीं था कि वह किस चक्कर में पड़ रहा है.
हमला करवाने वाले चरमपंथी समूह ने बाद में आत्मघाती हमलावर की तस्वीर जारी की. इससे अंदाज़ लग रहा था कि वह शायद 21 साल का होगा.
यह सोच-समझकर खींची गई तस्वीर थी. वह बैठा हुआ था. एक भारी गन उसके कंधों से लटकी थी. उसका दायां हाथ उसके चेहरे के सामने था और वह अपनी तर्जनी उंगली उठाए हुआ था, जैसे वह किसी बात पर ध्यान खींचना चाहता हो.
ऐसा लगता था कि वह कह रहा हो, "सुनो, मेरी बात ध्यान से सुनो."

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और एक बार फिर वही सवाल उठता हैः आख़िर वह क्या सोच रहा था?
कुछ महीने पहले लाहौर में मेरी मुलाक़ात ख़ालिद महमूद नाम के एक युवक से हुई थी, जो इस्लामी चरमपंथियों के एक समूह में शामिल होने जा रहा था.
और वह इसके लिए चल भी पड़ा था. लेकिन उसकी यात्रा कसी हुई मुट्ठियों, डेटोनेटर के फटने और फिर विस्फोट में घायल होने के साथ ही ख़त्म हो गई.
वह बहुत ज़्यादा दूर नहीं जा सका. लेकिन फिर भी यह सवाल तो उठता है कि आख़िर उसने क्यों सोचा कि हिंसक जिहाद उसके लिए सही है?
ख़ालिद महमूद के गांव में एक स्कूल था. लेकिन वह उसमें नहीं गया. वह अपने पिता के साथ खेती के कामों में हाथ बंटाता था. और फिर बहुत से किशोरों की तरह उसने भी चाहा कि वह यह घोंसला छोड़कर उड़ जाए.
12 साल की उम्र में वह लाहौर चला गया और एक फ़ैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया. जब वह 15 साल का था तब एक दिन उसने सोचा कि एक फ़िल्म देखेगा. उसने पहले कभी कोई सिनेमा नहीं देखा था और उसे लगा कि अब इसका समय आ गया है.

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जब वह लाहौर से गुज़र रहा था तब एक रैली से उसका ध्यान भटक गया. अब यह काफ़ी पुरानी बात हो गई है- 9/11 के बाद के महीनों की. तब भावनाएं उबाल पर थीं.
पता चला कि रैली का आयोजन पाकिस्तान के सबसे ख़तरनाक़ चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने किया था. इसमें हर कोई अमरीका विरोधी नारे लगा रहा था. वहां ऐलान किया जा रहा था, "हमें लोग चाहिए जो अफ़ग़ानिस्तान जाकर अमरीकियों से लड़ सकें!"
ख़ालिद ने तुरंत वहीं इसके लिए हामी भर दी. वो कहते हैं, "मुझे लगा कि मैं एक दूसरे देश को देख पाऊंगा".
फिर बिना समय गंवाए उन्हें कंधार ले जाया गया, जो दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में ताबिलान का गढ़ था. वहां पहुंचकर उन्हें अहसास हुआ कि वह धर्म के बारे में कितना कम जानते हैं.
उन्होंने मुझे बताया, "मैंने पाकिस्तान में कभी नमाज़ नहीं पढ़ी थी. मैं सही अल्फ़ाज़ जानता ही नहीं था."

एक अफ़ग़ान विद्वान ने उन्हें इबादत करना सिखाया, उनमें हिंसक जिहाद के बारे में कुछ नहीं था.
ख़ालिद कहते हैं कि फिर भी ज़िंदगी मुश्किल थी, "वह सभी पश्तून थे और मैं उनकी भाषा नहीं समझता था. मैं एक दूसरी दुनिया में पहुंच गया था. चारों तरफ़ गोलियां चल रही थीं. मैं वापस घर जाना चाहता था."
लेकिन उन्हें यह कतई अंदाज़ा नहीं था कि वह थे कहां, इसलिए पाकिस्तान में अपने घर लौटने का सवाल ही पैदा नहीं होता था.
उन्हें 15 दिन बाद उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान ले जाया गया, जहां तालिबान लड़ रहे थे. उन्होंने वहां घायल लड़ाकों की तीमारदारी की.
लेकिन ज़ल्द ही तालिबान पीछे हटने लगे. ख़ालिद और दूसरे पाकिस्तानियों को कहा गया कि वो वापस घर जा सकते हैं. उन्होंने बस से यात्रा शुरू की लेकिन एक चौकी पर उतारे जाने के बाद पैदल ही आगे बढ़े.

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कुछ घंटे चलने के बाद उन्हें अफ़ग़ानिस्तान के सबसे खूंख़ार सरदार ने पकड़ लिया और पाकिस्तानियों से कहा कि वो एक कंटेनर में बैठ जाएं, जो उन्हें उनके देश पहुंचा देगा.
जिसने इससे इनकार किया उसे गोली मार दी गई. अंदर ठुंसे हुए आदमी डर गए और लड़ने लगे. ख़ालिद बेहोश होकर गिर पड़े, और शायद इससे उनकी जान बच गई.
बाद में उन्हें पता चला कि जब वह बेहोश थे तब सरदार के आदमी कंटेनर के बाहर घूमकर उसके भीतर गोलियां चलाने लगे. जो 15 या 16 लोग ज़िंदा बचे उनमें ख़ालिद भी एक थे.
बाकियों की लाशों को रेगिस्तान में फेंक दिया गया और पैट्रोल छिड़ककर जला दिया गया.
ख़ालिद को मज़ार-ए-शरीफ़ के पास के एक कस्बे में ले जाया गया. लेकिन वहां खाना बिल्कुल नहीं था और पानी भी बमुश्किल एक गिलास ही होगा. कैदी इसके विरोध में चिल्लाए, "या तो हमें मार दो या छोड़ दो."

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आखिरकार उऩ्हें वहां से काबुल की एक जेल में ले जाया गया. छह महीने बाद पाकिस्तानी राजदूत ने दखल दिया और 40-50 कैदियों को वापस उनके देश भेजा गया.
इसके बाद भी ख़ालिद आज़ाद नहीं थे. क़रीब एक साल तक वो पाकिस्तान की इस जेल से उस जेल में घूमते रहे. अंततः उन्हें रिहा कर दिया गया. कम से कम अब वह वापस घर जा सकते थे.
वो कहते हैं, "सचमुच अच्छा लग रहा था. मुझे लगा कि मैं जन्नत में हूं. मेरे परिवार ने मेरी शादी कर दी और मुझे एक नई नौकरी मिल गई. अब ख़ुश हूं."
तो अब वह उन महत्वपूर्ण घटनाओं को याद करते हैं तो क्या सोचते हैं?
वो कहते हैं, "मैं अनाड़ी था. मैंने एक फ़ैक्ट्री में तब काम करना शुरू कर दिया था जब मैं सिर्फ़ 12 साल का था. मैं बस एक दूसरे देश को देखना चाहता था. यह बहुत अच्छा लग रहा था. लेकिन सब बुरी तरह गुड़-गोबर हो गया."

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यह थी ख़ालिद महमूद की कहानी- और उस दिन की, जब उसने सोचा कि एक फ़िल्म देखी जाए, मज़ा आएगा.
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