'ऐसा ईरान या पाकिस्तान में करते तो'

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- Author, सलीम रिज़वी
- पदनाम, न्यूयॉर्क से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में 9 फ़रवरी को हुए एक कार्यक्रम से शुरू होने वाले विवाद पर अमरीका में भी बहस जारी है.
भारतीय संसद पर हमले के मामले में फांसी की सज़ा पाए अफ़ज़ल गुरू की याद में जेएनयू में 9 फ़रवरी को मनाए गए एक समारोह में कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाए गए थे. उस सिलसिले में जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष समेत कई छात्रों को गिरफ़्तार किया गया था.
जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को दिल्ली हाईकोर्ट ने तो अंतरिम जमानत दे दी है. लेकिन भारत में देशद्रोह और अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसे मुद्दों पर ज़ोरदार बहस हुई है.
अमरीका में भी इस सिलसिले में बहस हो रही है. कुछ लोगों का ख्याल है कि छात्रों को यूनिवर्सिटी परिसर में अपने विचारों को खुलकर रखने की आज़ादी होनी चाहिए. तो कुछ का कहना है कि देशद्रोही विचारों के लिए कोई रियायत नहीं होनी चाहिए.
न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों और अध्यापक समेत कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने न्यूयॉर्क में जेएनयू के छात्रों की हिमायत में एक विरोध प्रदर्शन भी किया.

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इस विरोध प्रदर्शन में अमरीकी छात्रों के साथ-साथ भारतीय मूल के कई छात्रों ने भी भाग लिया. बल्कि कुछ भारतीय मूल के छात्र तो विरोध प्रदर्शन के आयोजक भी हैं.
जेएनयू के छात्रों के हक में विरोध प्रदर्शन के एक आयोजक सुधांशु कौशिक भारतीय मूल के हैं जिनका जन्म अमरीका में ही हुआ था लेकिन वह कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में 6 महीने पढ़ाई भी कर चुके हैं. अब वे न्यूयॉर्क विश्विद्यालय के छात्र हैं.
जेएनयू के छात्रों की गिरफ़्तारी पर सुधांशु कौशिक का कहना है, "जब छात्रों को कुछ गलत या सही लगता है तो वह बोलेंगे, वह विरोध करेंगे, अपनी आवाज़ उठाएंगे. मगर उनको चुप कराना, उनको जेल में डालना, उनको मारना पीटना. मुझे तो यह नहीं पढ़ाया गया था कि जनतंत्र में ऐसा होता है."
लेकिन कुछ भारतीय मूल के अमरीकी लोगों का मानना है कि देशद्रोह के नारे लगाने की आज़ादी नहीं होनी चाहिए.
न्यूयॉर्क में पेशे से डॉक्टर राज गुप्ता दो दशक से अधिक समय से अमरीका में रह रहे हैं. उनका मानना है कि देशद्रोह के लिए कोई रियायत नहीं होनी चाहिए.

वह कहते हैं,"देशद्रोह के नारे तो नहीं लगाने चाहिए. जिस देश में रहो, उसका खा पी रहे हो, उस देश के खिलाफ तो नहीं जाना चाहिए. क्या ऐसा पाकिस्तान में हो सकता है? सऊदी अरब में ऐसा हो सकता है? ईरान में हो सकता है? नहीं हो सकता है, वहां तो फांसी दे दी जाएगी. तो यहां क्यूं हो रहा है? देशद्रोह के आरोप तो कुछ नहीं हैं ऐसे लोगों को तो फांसी दे देनी चाहिए."
इसी तरह मूल रूप से भारत के उत्तर प्रदेश के रहने वाले शेर बहादुर सिंह अमरीका में 30 वर्षों से रह रहे हैं और रिटायर हो चुके हैं. वह जेएनयू छात्रों द्वारा देशद्रोह के नारे लगाए जाने से तो आहत हैं लेकिन उनके खिलाफ़ सख्त कार्रवाई के हक में नहीं हैं.
शेर बहादुर सिंह कहते हैं,"मैं देशद्रोह के नारे लगाए जाने के खिलाफ़ हूं. लेकिन अब सभी छात्रों को डांट फटकार कर रिहा कर देना चाहिए. नारे वाली बात तो गलत थी, लेकिन मैं नहीं चाहता कि उन छात्रों का जीवन बर्बाद हो. हो सकता है उनको कुछ बाहरी लोगों ने बहका दिया हो."
अमरीका में रहने वाले कुछ भारतीय मूल के युवा तो छात्रों के खिलाफ सिरे से ही किसी कार्रवाई का विरोध करते हैं.
न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की छात्रा सुमंथी कुमार भी जेएनयू के छात्रों के हक में विरोध प्रदर्शन में शामिल थीं. उनका कहना है कि छात्रों को अभिव्यक्ति की आजादी होनी चाहिए.

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वह कहती हैं कि अमरीका में भी छात्रों को कभी कभी आवाज़ उठाने से रोका जाता है लेकिन छात्र विरोध करते हैं और अपनी आवाज़ ज़ोर शोर से उठाते हैं.
सुमंथी कुमार कहती हैं, "मैं खुद एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हूं और हम तो अपने विरोध करने के हक़ को सामान्य तौर पर लेते हैं. अमरीका में भी कभी कभार छात्रों की आवाज़ दबाने की कोशिश की जाती है लेकिन हमारे पास उसका विरोध करने और ज़ोर शोर से आवाज़ उठाने के विकल्प भी मौजूद हैं. मुझे लगता है कि भारत में छात्रों के पास आवाज़ उठाने के कम विकल्प हैं."
सुमंथी कुमार कहती हैं कि छात्रों के खिलाफ़ देशद्रोह के आरोप तो आज़ादी के पहले के कानून के तहत लगाए गए हैं और ऐसे कानून पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए.
वह कहती हैं, "मुझे लगता है कि यह कानून गलत है और उस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए. हमें छात्रों के विरोध करने और आवाज़ उठाने के हक का सम्मान करना चाहिए."
अमरीका में जेएनयू के विवाद पर समाचार पत्रों में भी खासी चर्चा हो रही है और कुछ समाचार पत्रों में इसको भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी और इससे जुड़े मानवाधिकारों से भी जोड़कर देखा जा रहा है.
अब सुमंथी कुमार और सुधांशु कौशिक जैसे छात्रों ने यह बीड़ा भी उठाया है कि वह अमरीकी जनता को भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी और इससे जुड़े मुद्दों के बारे में और जानकारी देने के लिए गोष्ठियों का भी आयोजन करेंगे.
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