भारत को दोस्त कहने पर नंबर कटते थे: मलाला

मलाला युसुफ़ज़ई

शांति के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने वाली मलाला यूसुफ़ज़ई का कहना है कि पेशावर में स्कूल पर चरमपंथी हमले के बाद सरकार ने चरमपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई तो की पर वहां के बच्चों की शिक्षा और पाठ्यक्रम पर ध्यान नहीं दिया.

मलाला कहती हैं कि सैन्य कार्रवाई के ज़रिए चरमपंथियों को तो मार सकते हैं, लेकिन चरमपंथी विचारधारा को केवल शिक्षा से ही ख़त्म किया जा सकता है.

बीबीसी संवाददाता आदिल शाहज़ेब से उनकी बातचीत के अंश.

आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमले के बाद पाकिस्तान के नागरिक और फ़ौजी नेतृत्व ने चरमपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है पर क्या आप समझती हैं कि पाकिस्तान के स्कूलों में बच्चे सुरक्षित हैं?

अपने परिवार के साथ मलाला युसुफ़ज़ई

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हमले के बाद लगा था कि अब मुल्क में चरमपंथ के विरुद्ध एकराय बनेगी. नेशनल एक्शन प्लान भी लागू हुआ पर उसका पूरा फ़ोकस दहशतगर्दों को मारने पर था. उसमें सबसे अहम चीज़ गायब थी - तालीम, जिस पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया.

अगर हम चाहते हैं कि हम प्रगतिशील सोच पैदा करें और सब्र और बर्दाश्त का संदेश दें तो ज़रूरी है कि हमें बच्चों को अच्छी तालीम देनी होगी.

यानी नेशनल एक्शन प्लान पर उस तरह अमल नहीं हुआ जैसे होना चाहिए था?

नेशनल एक्शन प्लान के 20 प्रमुख बिंदु थे, जिनमें तालीम शामिल नहीं थी.

क्या आपको लगता है आज पाकिस्तान में स्कूली बच्चे सुरक्षित हैं?

कभी-कभी तो लगता है कि पाकिस्तान में हर शख्स, जिसमें नेता भी शामिल हैं, ख़तरे में हैं क्योंकि हमने जो देखा है, उससे निराशा पैदा होती है. मगर पिछले एक साल में हालात ठीक हो रहे हैं. कहा जा रहा है कि चरमपंथी हमलों में 70 फ़ीसद की कमी आई है.

थोड़ी उम्मीद है क्योंकि फ़ौजी आॅपरेशन ठीक से हो रहा है. हूकूमत और सभी पार्टियां एकमत हैं. लेकिन अभी तालीम को प्राथमिकता देने की ज़रूरत है.

इस दौरान जिस तरह सरकार और फ़ौज ने काम किया, चरमपंथियों को सज़ा-ए-मौत की दोबारा शुरू कराई. तो क्या ये क़दम सही थे.

मैं एक्सपर्ट तो नहीं लेकिन मुझे इतना पता है कि आप लोेगों को शिक्षित कर सकते हैं. अगर कोई लोगों को उग्र बनाने में कामयाब हो रहा है तो आप उन्हें अच्छी तालीम भी दे सकते हैं. आप उन्हें अमन और इस्लाम के सही अर्थ भी समझा सकते हैं. किसी को मारना अकेला हल नहीं. मुझे लगता है कि हमारे पास विकल्प मौजूद हैं.

मलाला युसुफ़ज़ई

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आपकी राय में जर्बे अज़्ब (स्वात वैली में चल रहे फ़ौजी ऑपरेशन) के बजाय जर्बे क़लम (शिक्षा के लिए अभियान) चलाया जाना चाहिए? लोगों का ख्याल है कि पाकिस्तानी स्कूलों का पाठ्यक्रम भी शायद समाज में उग्रवादी सोच को बढ़ावा दे रहा है. तो क्या उसे भी बदलना चाहिए?

मैं यह नहीं कह रही हूं कि जर्बे अज़्ब होना चाहिए या नहीं. मगर मेरा मानना है कि हमें जर्बे क़लम की सख़्त ज़रूरत है. इसके बगैर हम उग्रवाद की सोच नहीं बदल सकते. क्योंकि बंदूक़ से दहशतगर्द को तो मार सकते हैं लेकिन दहशतगर्दी की सोच को नहीं. इसे सिर्फ़ तालीम ही के ज़रिए ख़त्म कर सकते हैं.

तो इस शिक्षा में पाठ्यक्रम की क्या भूमिका है? क्या आप पाकिस्तान जाकर वही पाठ्यक्रम पढ़ने को तैयार हैं?

जब मैं कक्षा तीन की छात्रा थी, तो मेरी किताब में लिखा था कि चीन, पाकिस्तान का सच्चा दोस्त है. हमारे भारत के साथ काफ़ी विवाद होते हैं. अगर सही-गलत पर निशान लगाने के फ़ॉर्मेट में सवाल आता है, कि भारत पाकिस्तान का दोस्त है या नहीं तो भारत पर ग़लत का निशान लगाना पड़ता है और चीन पर सही का निशान. यह ग़लत है.

अगर आप बच्चों को ऐसी शिक्षा देते हैं तो हमारे समाज में कभी धैर्य और बर्दाशत पैदा नहीं होगा.

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अगर हम चाहते हैं कि समाज में शांति और बेहतरी आए, तो पाठ्यक्रम को ठीक करना बहुत ज़रूरी है. इसकी किसी निष्पक्ष एजेंसी से समीक्षा करवानी चाहिए.

आपने शिक्षा को फैलाने के लिए दुनियाभर में अभियान चलाया है. आप सबसे ज़्यादा किससे प्रभावित हुईं?

मैं जिससे भी मिलती हूं,सबसे सीखती हूं और प्रेरित होती हूं. मुझे उनकी अच्छाई और कमजोरी दोनों से सीखने को मिलता है. मैं एंजेलिना जोली से मिलकर बहुत ख़ुश हुई. वह काफी समर्पित हैं.

पेरिस में हमला, कैलिफोर्निया में गोलीबारी और फिर डॉनल्ड ट्रंप का बयान आया. ट्रंप ने कहा कि मुसलमानों के अमरीका आने पर रोक लगनी चाहिए. तो ट्रंप को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

मलाला युसुफ़ज़ई और कैलाश सत्यार्थी.

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सभी के लिए मेरा पैग़ाम है कि इस्लाम अमन का दूसरा नाम है. जो लोग दहशतगर्दी के लिए इस्लाम का नाम इस्तेमाल कर रहे हैं, मुझे लगता है कि उन्होंने कभी क़ुरान को पढ़ा ही नहीं. मैंने भी कुरान को तर्जुमे से पढ़ा है. उससे मैंने जितना शांति के बारे में सीखा उतना कहीं और नहीं सीखा.

मैं तो यही कहूंगी कि पश्चिमी या पूर्वी मीडिया अगर चरमपंथी हमलों के लिए सिर्फ़ दुनिया के डेढ़ अरब मुसलमानों पर आरोप लगाएगा, तो इससे दहशतगर्दी ख़त्म नहीं होगी बल्कि और ग़ुस्सा पैदा होता है. नए दहशतगर्द पैदा होते हैं. हमें चाहिए कि हम अमन का पैग़ाम फैलाएं.

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