बांग्लादेश में हत्याओं के पीछे कौन है?

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बांग्लादेश में लगातार हो रहे जानलेवा हमलों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एक किस्म की खलबली मच गई है.

लेकिन हमले करने वाले कौन लोग हैं, इस बारे में बहुत कम ही जानकारी मिल पाई है.

बीबीसी बांग्ला के अकबर हुसैन इन हत्याओं के पीछे की मंशा जानने की कोशिश कर रहे हैं.

हालिया सप्ताह में दो विदेशी नागरिकों की हत्या से देश में सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं.

क्या आईएस का हाथ हो सकता है?

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इटली के सहायताकर्मी चेज़ारे टावेला और जापान से एक कृषि परियोजना पर काम करने आए कुनिओ होशी की हत्या एक ही तरीक़े से की गई थी.

इन हत्याओं की ज़िम्मेदारी कथित तौर पर इस्लामिक स्टेट ने ली थी.

हालांकि बांग्लादेश सरकार ने देश में इस्लामिक स्टेट की मौजूदगी से इनकार किया था.

सुरक्षा एजेंसियां ये तो मानती हैं कि इन हत्याओं के पीछे कट्टरपंथी इस्लामी ग्रुप हैं, लेकिन उन्हें बांग्लादेश में आईएस की मौजूदगी पर संदेह है.

सुरक्षा विश्लेषक, पूर्व ब्रिगेडियर जनरल शख़ावत हुसैन कहते हैं, “हर गुप्त इस्लामी संगठन आपस में कुछ संवाद तो रखते हैं क्योंकि उनकी एक ही विचारधारा होती है. लेकिन मैं इस बारे में पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि इन विदेशी नागरिकों की हत्याओं के पीछे आईएस का हाथ है.”

किसे ज़िम्मेदार माना जा सकता है?

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अवामी लीग पार्टी की मुखिया प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इन हत्याओं के लिए विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) पर आरोप लगाया है.

हालांकि बीएनपी ने इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि प्रधानमंत्री का यह बयान स्वतंत्र जांच में बाधा पहुंचाएगा.

हत्यारों को पकड़ने के लिए पुलिस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव है.

हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि देश में राजनीतिक अशांति से चरमपंथी समूहों को मदद मिल रही है. इससे जांच भी प्रभावित हो सकती है.

क्या हत्या के तार कहीं और जुड़ते हैं?

बांग्लादेश ब्लॉगर
इमेज कैप्शन, निलोय नील इस साल मारे जाने वाले चौथे ब्लॉगर थे.

इस साल देश में चार ब्लॉगरों को मौत के घाट उतार दिया गया है, हर हत्या के बाद सरकार पर सवाल उठे.

हाल में हुई अन्य हत्याओं ने मुस्लिम बहुल इस सेक्युलर देश में बेचैनी बढ़ा दी है.

पिछले सप्ताह देश के उत्तरी इलाक़े में एक ईसाई पादरी की गला रेतकर हत्या कर दी गई थी.

पुलिस ने प्रतिबंधित इस्लामी समूह जमात उल मुजाहिदीन के पांच सदस्यों को गिरफ़्तार किया.

अभी हाल ही में बांग्लादेश पॉवर डेवलपमेंट बोर्ड के अध्यक्ष मोहम्मद खिज़िर ख़ान की ढाका में उनके घर पर हत्या कर दी गई.

ख़ान इस्लाम की सूफ़ी धारा के धार्मिक उपदेशक थे.

पिछले साल भी दो अन्य पीरों की उनके घर में हत्या कर दी गई थी, लेकिन हत्यारे अभी तक पकड़े नहीं जा सके.

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सुन्नी बहुल बांग्लादेश में इस्लाम की अलग-अलग धाराएं परम्परागत रूप से मौजूद रही हैं.

हालांकि मारे गए लोगों में अलग-अलग धर्म, राष्ट्रीयता और यहां तक कि नास्तिक ब्लॉगर तक आते हैं.

नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर एक पुलिस सूत्र ने कहा, “ब्लॉगर और इस्लामी पीरों की हत्या के मामले में शायद एक ही ग्रुप का हाथ है.”

सूत्रों का कहना है कि पादरी की हत्या में भी शायद इसी समूह का हाथ हो क्योंकि हत्याएं एक ही तरह की गईं.

एक अन्य पुलिस स्रोत के अनुसार, ब्लॉगरों और विदेशी नागरिकों की हत्या में कुछ संबंध हो सकता है, हालांकि ग्रुप अलग-अलग हो सकते हैं.

पुलिस का कहना है कि ब्लॉगरों की हत्या में कट्टरपंथी इस्लामी ग्रुप अंसरुल्ला बांग्ला टीम का हाथ था.

ब्लॉगरों की हत्या के आरोप में 10 से 12 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है लेकिन वो सीधे तौर पर इस ग्रुप से जुड़े नहीं हैं.

चरमपंथी हिंसा की वजह क्या?

शेख हसीना

हालांकि हत्यारों के बारे में कोई साफ-साफ जानकारी नहीं है लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि बांग्लादेश में चरमपंथी समूहों की सक्रियता बढ़ गई है.

एक सुरक्षा सूत्र के मुताबिक़, देश में 10 से 15 चरमपंथी समूह मौजूद हैं.

विभिन्न इस्लामी ग्रुपों से जुड़े होने के शक के आधार पर पुलिस ने पिछले साल 100 लोगों को गिरफ़्तार किया था.

इसके अलावा 20 अन्य लोगों को भी गिरफ़्तार किया गया था, जिनमें एक बांग्लादेशी मूल का ब्रिटिश नागरिक भी है, जिसने कथित रूप से आईएस के साथ सम्पर्क स्थापित करने की कोशिश की थी.

कुछ पश्चिमी देश शेख हसीना सरकार को संदेह से देखते हैं क्योंकि वर्ष 2014 के आम चुनाव में विपक्षी गठबंधन ने बहिष्कार कर दिया था और इस चुनाव के बाद शुरुआती तीन महीने बहुत हिंसा और प्रदर्शन वाले थे, क्योंकि विपक्षी पार्टियां शेख हसीना पर दबाव बनाना चाह रही थीं.

इस दौरान क़रीब 100 लोग मारे गए थे.

पूर्व ब्रिगेडियर जनरल शख़ावत हुसैन का कहना है कि चरमपंथियों के ख़तरे को बांग्लादेश को हल्के में नहीं लेना चाहिए.

हालांकि वो कहते हैं कि इस चुनौती से लड़ने के लिए देश में राजनीतिक स्थिरता होनी चाहिए.

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