वो छोटा सा, नन्हा सा लड़का कहाँ...

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    • Author, वुसतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान

ये तब की बात है जब दादा-दादी, नाना-नानी आसपास थे और मुझे उन सबकी तरफ़ से सुबह सुबह ईद की नमाज़ के बाद 1 रुपए का खनकता हुआ एक-एक सिक्का मिलता और फिर मैं अपने बहन-भाइयों और मोहल्ले के दूसरे बच्चों के साथ मि़साइल की तरह बाहर जाता और ईदी को ठिकाने लगाए बग़ैर घर नहीं लौटता था.

चांदी के वर्क लगी मीठी इमली का छाबा हम बच्चों का पहला निशाना होता, क्योंकि रफ़ीक चरसी को भी पता था बच्चे उसकी इमली के कितने दिवाने हैं क्योंकि वो हर एक को दो आने की इमली देने से पहले उसमें माचिस लगाकर शोला निकालता था.

उसके बराबर में मोटू कोलावाले का ठेला जिसमें लोहे की मशीन में से सोडा निकलता और जो बच्चा दो गिलास गटागट पी जाए उसे तीसरा गिलास मुफ़्त में मिलता.

कई बच्चों के पेट तो मोटू के ठेले पर ही तीन-तीन गिलास चढ़ाकर फूल जाते और फिर वो सदरू हलवाई की मिठाई खाने के भी काबिल न रहते.

रंग-बिरंगी गोल-गोल मिठाइयाँ

फ़िल्म अभिनेता आमिर ख़ान अपनी पत्नी किरण राव और बेटे आज़ाद के साथ.
इमेज कैप्शन, ईद पर फ़िल्म अभिनेता आमिर ख़ान अपनी पत्नी किरण राव और बेटे आज़ाद के साथ मीडिया से मुखातिब हुए.

सदरू रात से ही अपनी दुकान के बाहर लकड़ी के बड़े बड़े तख्त सीढ़ियों की तरह बिछाकर अपनी दुकान आधी सड़क तक बढ़ा लेता और फिर गुलाबी, पीली, हरी, काली, सफ़ेद, कत्थई रंग की गोल-गोल मिठाइयाँ बड़े बड़े थालों में सज जातीं.

मगर मुझे सदरू की मिठाई में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी. उसके बजाय कमालू शरबत वाले से दो-दो, तीन-तीन गोले ले-ले कर खाने और कपड़े पर गिराने और गोले के रस से उंगलियों में चिपचिपाहट का मज़ा ही कुछ और था.

और फिर उसके बाद बंजारों का चूँ-चूँ करता ऊपर से नीचे जाने वाला लकड़ी का गोल झूला जिसमें बैठकर हम इतना शोर मचाते कि गले बैठ जाते. झूले वाले बंजारे की बंजारन मिट्टी और रंगीन काग़ज़ से बने घूघ्घू घोड़े बेचती थी.

अगले साल की कसम

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हम बच्चे बहुत सारी चीज़ें और भी करना चाहते थे जैसे पठान की बंदूक़ से गुब्बारे फोड़ना, लकी ईरानी सर्कस देखना, मौत के कुएं में मोटरसाइकिल चलाने वाले से हाथ मिलाना, मगर तब तक चार रुपए ख़र्च हो चुके होते और हम ग़ुस्से में तिलमिलाते हुए कसम खाते कि अगले साल ईद पर वो सब करेंगे जो इस साल नहीं कर पाए.

मगर हर ईद पर चार रुपए मिलते ही सब कुछ भूलभाल के फिर रफ़ीक चरसी के शोले वाली इमली के छाबे पर पहुँच जाते.

आज भी मेरे पास बंजारन से ख़रीदे कई घूघ्घू घोड़े आलमारी में पड़े हैं. मेरा सात साल का बेटा जब भी आलमारी खोलता है, पूछता है, बाबा ये घूघ्घू घोड़े अब क्यों नहीं मिलते? हाँ, अब घूघ्घू घोड़े नहीं मिलते, अब बंजारे भी तो नहीं आते.

अब वो नन्हा सा लड़का कहाँ?

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इसीलिए मैं कई बरस से ईद का दिन दोपहर तक सो कर गुजारता हूँ और बच्चे एकाध घंटे के लिए अपनी दादी की तरफ़ चले जाते हैं या फिर टीवी पर ईद का विशेष प्रसारण देखते हुए ये हिसाब-किताब करते हैं कि इस बार उन्हें कितने सौ रुपए की ईदी मिली और मैं बिस्तर पर लेटा-लेटा इब्ने इंशा की नज़्म गुनगनाता रहता हूँ...

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों, एक मेले में पहुँचा हुमकता हुआ

जी मचलता था इक इक शय पे मगर, जेब खाली थी कुछ मोल न ले सका

लौट आया लिए हसरतें सैंकड़ों, एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों

ख़ैर महरूमियों के वो दिन तो गए, आज मेला लगा है उसी शान से

आज चाहूँ तो इक इक दुकाँ मोल लूँ, आज चाहूँ तो सारा जहाँ मोल लूँ

ना-रसाई का अब जी में धड़का कहाँ, पर वो छोटा सा नन्हा सा लड़का कहाँ?

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