मोसुलः इस्लामिक स्टेट के दमन का चेहरा

इराक के शहर मोसुल पर इस्लामिक स्टेट के कब्ज़े को एक साल पूरे हो रहे हैं.
बीबीसी की एक जांच में पता चला है कि शहर पर क़ब्ज़े के दौरान चरमपंथी संगठन ने जनजीवन के लगभग हर पहलू पर गहरा असर छोड़ा है.
इनमें मस्जिद, स्कूल से लेकर लिबास तक शामिल हैं.
ढही हुई मस्जिद, वीरान स्कूल, सिर से पांव तक पर्दे में महिलाएं आदि कुछ ऐसे प्रतीक हैं जो आईएस के दमन की दास्तान कहते हैं.
लोगों का कहना है कि स्कूलों का इस्तेमाल बच्चों के ज़हन को आईएस के हिसाब से ढालने के लिए किया जा रहा है.
समाचार एजेंसी एपी के मुताबिक आईएस लड़ाकों ने मोसुल विश्वविद्यालय के पुस्तकालय से किताबों को निकालकर जलती हुई आग में झोंक दिया गया.

मोबाइल सिग्नल काट दिए गए हैं और ख़बरों पर उनका कब्ज़ा है.
ड्रेसकोड
महिलाओं को सिर से पांव तक पर्दे में रहने को मज़बूर किया जा रहा है.
स्थानीय नागरिक हना बताती हैं, "आईएस महिलाओं के लिबास को लेकर बेहद सख़्त है."

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उन्होंने बताया कि जो महिलाएं पूरा बदन जैसे की चेहरा या बाहें तक नहीं ढंकती उनके पति को कोड़े मारने की सज़ा दी जाती है.
एक महिला के माता पिता के कार चलाने पर पाबंदी लगा दी गई और जब उसने आपत्ति की तो उसे मारा-पीटा गया.
धार्मिक अल्पसंख्यक
शहर की सबसे मशहूर मस्जिद की रूपरेखा बदल दी गई है और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार किए जा रहे हैं.
इसी तरह यहां के जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों का भी दमन हो रहा है. उनके घर पर कब्ज़ा किया जा रहा है.

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वैसे लगभग सभी इलाके आज वीरान नजर आ रहे हैं जहां अल्पसंख्यक बसते थे.
इसके अलावा यहां के मंदिर और मस्जिदों को भी नष्ट किया जा रहा है.
धार्मिक पाबंदियां
जो भी व्यक्ति आईएस के इस्लामिक कानून की व्याख्या के दायरे से बाहर जाने की कोशिश करता है उसे सज़ा दी जाती है.
स्थानीय नागरिक जैद बताते हैं, जब से आईएस ने शहर पर अधिकार किया है उन्होंने यहां खिलाफ़त कानून की घोषणा कर रखी है. इसमें न्यूनतम सज़ा कोड़े लगाना है जो सिगरेट पीने जैसे छोटे मोटी बातों के लिए लागू हो सकती है.

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हिशाम ने बताया, मेरे भाई को 20 कोड़े केवल इसलिए लगाए गए क्योंकि उसने प्रार्थना के समय अपनी दूकान बंद नहीं की थी. यहां धर्म को भी जबरदस्ती लाद दिया गया है.
सरकारी हमलों से बचने के लिए धोखे से फट जाने वाले बम, खुफ़िया भूमिगत रास्तों और दूसरी रुकावटें पैदा कर रखी है.
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