अफ़ग़ानिस्तानः ठंडी पड़ती उम्मीदें!

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- Author, संजॉय मजूमदार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, काबुल से
अफ़ग़ानिस्तान में नैटो के सैन्य अभियान की समाप्ति के बाद एक नई तरह की मुश्किल पेश आ रही है.
पिछले कुछ सालों से अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी सहायता एजेंसियों, दूतावासों और कंपनियों के लोग बड़ी तादाद में आते रहे हैं.
लेकिन बाहर से आने वाले लोगों की संख्या में अब एक ठहराव आ गया है. विदेशी लोगों को निशाना बनाकर किए गए हाल के हमलों की वजह से असुरक्षा का माहौल भी बढ़ा है.
काबुल में अब ये हालात हैं कि हैं उन कारोबारों पर असर पड़ रहा है जिनसे विदेशी लोगों की ज़रूरतें पूरी होतीं थीं.
ग्राहकों का पता नहीं!

काबुल के एक फ़्रेंच रेस्त्रां की रसोई में बीते साल तक क्रिसमस और नए साल की छुट्टियों में ख़ूब रौनक़ हुआ करती थी.
यहाँ के रसोईयों के हाथ का खाना विदेशी ग्राहकों को बड़ा पसंद था. लेकिन इस बार नज़ारा अलग है, खाना है, पर खाने वाले दूर-दूर तक नहीं.
रेस्त्रां की मैनेजर हसीब मरवान ने बताया, "क्रिसमस के मौक़े पर हमारे यहाँ एक भी रिज़र्वेशन नहीं था, हम खाना बना रहे थे, मगर ग्राहकों का पता नहीं था."
विदेशियों का डर

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पिछली जनवरी में काबुल के एक लेबनानी रेस्त्रां पर तालिबान के हमले में 21 लोग मारे गए थे. मरने वालों में आधे से ज़्यादा विदेशी थे.
जिनमें कई संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी थे. उसके बाद से ही विदेशी मेहमानों को खिलानेवाले अधिकतर ऐसे रेस्त्रां बंद हो गए हैं. जो चंद रेस्त्रां खुले हैं, वहाँ भी विदेशी लोग डर से नहीं जाते.
असर सिर्फ़ रेस्त्रां चलानेवालों पर ही नहीं पड़ा है, काबुल का रिएल्टी सेक्टर भी मुश्किल में है, जहाँ पिछले 10 सालों से विदेशी राजनयिकों, राहतकर्मियों और ठेकेदारों के कारण मकान किराए काफ़ी ऊपर चले गए थे. अब कई घर ख़ाली पड़े हैं.
शांति और संपन्नता

बदलते अफ़ग़ानिस्तान में सबसे ज़्यादा मार पड़ी है, आम अफ़ग़ानियों पर. काबुल के मशहूर क़ालीन बाज़ार में कारोबार ठप सा हो गया है.
क़ालीन के कारोबार से जुड़े हाजी महताबुद्दीन कहते हैं, "पिछले एक साल में शायद ही कोई बिक्री हुई है, मुझे दुकान का किराया जुटाने और घर चलाने के लिए जूझना पड़ रहा है."
पिछले एक दशक ने अफ़ग़ानिस्तान में शांति और संपन्नता की उम्मीदें बंधी थीं. मगर अब विदेशी लोग लौट रहे हैं, और बढ़ती ठंड के साथ-साथ, अफ़ग़ान लोगों की उम्मीदें भी ठंडी पड़ती जा रही हैं.
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