सूनामीः लोगों के दुख के आगे मेरी तस्वीरें तुच्छ थीं

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- Author, आर्को दत्ता
- पदनाम, फ़ोटो पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
कई बार तस्वीरें लेना भी दुखद होता है...ऐसे ही कई जज्बातों से गुजरते हुए ऑर्को दत्ता ने दस साल पहले सूनामी के दौरान एक तस्वीर खींची थीं.
दोनों हाथ रेत पर फैलाए मातम करती इंदिरा की तस्वीर के लिए ऑर्को को वर्ल्ड प्रेस फोटो अवार्ड (दुनिया में बेहतरीन तस्वीर के लिए मिलने वाला अवार्ड) भी मिला था.
दस साल पहले 26 दिसंबर 2004 को इंडोनेशिया के तटीय इलाक़े के पास समुद्र में रिक्टर स्केल पर 9.15 तीव्रता का भूकंप आया.
उसके बाद इंडोनेशिया, थाईलैंड, भारत और श्रीलंका समेत नौ एशियाई देशों में विनाशकारी सूनामी ने लाखों लोगों की जान ले ली थी.
<link type="page"><caption> आधुनिक युग की पहली सूनामी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2011/03/110311_tsunami_history_va.shtml" platform="highweb"/></link>
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एक फ़ोटोजर्नलिस्ट की ज़िंदगी जीते हुए मुझे इतिहास को क़रीब से देखने का मौका मिलता है. यह ऐसा अनुभव है जो कभी पैसे से नहीं ख़रीदा जा सकता.
लेकिन ऐसा भी वक़्त आता है जब आपका सामना लगातार दुख, कष्ट और मृत्यु से होता है और यह काम असहनीय हो जाता है.
<link type="page"><caption> क्या है सूनामी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2012/04/120411_tsunami_factbox_vd.shtml" platform="highweb"/></link>
लगता है कि फ़ोटो-जर्नलिस्ट के रूप में ज़िंदगी को सबसे बुरे रूप में रिकॉर्ड करना हमारे हिस्से में ही है. इस पेशे में कुछ साल का वक़्त ही ज़िंदगी और उसे देखने का नज़रिया बदल सकता है.
अपराधबोध

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उन लोगों पर अपना लेंस फ़ोकस करना कोई आसान बात नहीं, जो भूकंप या इमारत ढहने में दब गए हों और मर सकते थे.
इस दौरान कैमरे की शटर स्पीड और दूरी जैसी तकनीकी बातों के बारे में ठीक से सोचना एक कठिन संतुलन को साधने जैसा है. इस विरोधाभास का यहीं अंत नहीं होता.
जब पेशेवर सफलता मिलती है तो एक आत्मविस्मृति भी आ सकती है और तारीफ़ और पुरस्कार आपके भीतर अपराधबोध को भी जन्म दे सकते हैं.
28 दिसंबर 2004 को ऐसा कुछ मेरे साथ घटा. यह तमिलनाडु के कुडालोर में आई एशियाई सूनामी कवर करने का मेरा दूसरा दिन था.
मैंने इतने बड़े पैमाने पर मौतें देखीं जिसकी कल्पना भी नहीं की थी.
पूरे इलाक़े में शवों का सामूहिक अंतिम संस्कार और परिवारों का रोना देखा, जो मेरे ज़ेहन से ज़ल्दी नहीं उतरने वाले थे.
इंतज़ार

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यह दिन कुछ और सोचने का दिन नहीं था. मैं जानता था कि मुझे क्या करना है और मेरे हाथ में एक काम था, जिसे पेशेवर तरीक़े से पूरा करना था.
मैंने एक कैब किराए पर ली और कुडालोर के समुद्र तटों और तटीय इलाकों का दौरा किया. जहां भी भीड़ दिखी मैं रुका.
एक जगह मैंने भारी भीड़ देखी, जिसमें अधिकांश राहगीर थे. इनमें गुम हुए लोगों के कई परिजन भी थे. ये लोग समंदर में गई बचाव टीम का इंतज़ार कर रहे थे.
बिना कुछ सोचे मैं इनके बीच एक चुपचाप खड़ा हो गया.
शोक

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तभी एक शव को लेकर नौका लौटी. भीड़ में एक पुरुष और महिला तुरंत मृतक महिला को पहचान कर क़रीब आ गए.
मृतक महिला का पति अचानक ज़मीन पर गिर गया, जबकि उसके साथ आई पीड़िता की ननद शव के पास गई और निढाल होकर उन्होंने रेत पर अपने दोनों असहाय हाथ फैला दिए.
यह शोक और अपने क़रीबी के जाने की छटपटाहट मेरे दिल को छू गई.
जब मैंने यह तस्वीर ली तो सूनामी के कारण हुई मौतों का संदर्भ दिखाने के लिए उस मृतक महिला के हाथ का एक हिस्सा भी कैमरे में क़ैद किया लेकिन मातम मना रही महिला को ही केंद्र में रखा.
मैंने तेज़ी से और कुछ दूरी से यह तस्वीर ली क्योंकि मैं उसके शोक में बाधा नहीं डालना चाहता था.
असल में उस महिला को पता भी नहीं चला कि उसकी तस्वीर ली गई है. यह बात उसने बाद में एक साक्षात्कार में बताई थी.
साक्षात्कार

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मैं यह सोचने के लिए ज़रा भी नहीं रुका कि अगर मैं एक बढ़िया तस्वीर लेता या अगले दिन अख़ाबारों में इसे कैसी जगह मिलगी. ऐसा मैंने किसी और मौक़े पर ज़रूर किया होता, मसलन स्पोर्ट्स कवरेज.
मुझे लगता था कि मैं अर्ध-मूर्छा में काम कर रहा हूं. चारों ओर जितना दुख पसरा था, उसके मुक़ाबले मेरी तस्वीरों के कोई मायने नहीं थे.
कुडलोर में कुछ और दिन तक जनवरी में रुका रहा और उसके बाद श्रीलंका चला गया.
छह महीने बाद मैं उस महिला को तलाशने लौटा, जिसकी मैंने तस्वीर ली थी.
उनका नाम इंदिरा था, जैसा उस समय मैंने पता किया था. अब वह अपने तीन बच्चों के साथ कुडालोर में रहती हैं.
अभूतपूर्व

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ऐसे हर अनुभव के साथ कुछ ज़िंदगियां और क्षण ज़ेहन में अमिट छाप छोड़ जाते हैं.
और आप उम्मीद करते रह जाते हैं कि प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाएं दोबारा न आएं.
हालांकि मैं जानता हूं कि मैं बस ऐसी खुशफहमी ही पाल सकता हूं.
(इस कहानी का दूसरे भाग में पढ़िए पीड़िता महिला इंदिरा की कहानी)
(आर्को दत्ता मुंबई मिरर में फ़ोटो एडिटर हैं और उड़ान स्कूल ऑफ़ फ़ोटोग्राफ़ी के संस्थापक हैं.)
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