पाकिस्तान: जहां तालिबान के लिए बन रही हैं कई मलाला

- Author, इरम अब्बासी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख्वाह सूबे में मलाला यूसुफजई के नक्शेकदम पर चलते हुए वाशिंगटन स्कूल की ये बच्चियां शिक्षा हासिल करने के लिए दढ़संकल्प हैं.
इनके दिन की शुरुआत राष्ट्रगान से होती है. इन <link type="page"><caption> नन्हीं बच्चियों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2012/11/121110_international_pakistan_cash_for_kids_sdp.shtml" platform="highweb"/></link> ने उम्र से पहले ही कभी न भूलने वाला सबक सीख लिया है. ये बच्चियाँ जानती हैं कि तालिबान इनकी आवाज दबाना चाहते हैं और ये भी कि तालिबान की पहुंच से ये ज्यादा दूर नहीं हैं.
<link type="page"><caption> मलाला</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2012/11/121109_international_pakistan_malala_that_day_fma.shtml" platform="highweb"/></link> पर हमले ने इस स्कूल को अप्रत्याशित तौर पर बदला है. शुरू के कुछ दिन तो बच्चियां स्कूल ही नहीं आईं पर उसके बाद फिर तीस लड़कियों ने दाखिला लिया है.
हाल ही में दाखिला लेने वाली 10 साल की तस्नीम मलाला से बेहद प्रभावित हैं और वो पुलिस में जाना चाहती हैं.
तसनीम कहती हैं, "मेरी अम्मी ने टीवी पर देखा कि मालाला को गोली लगी थी. इसलिए पहले हम नहीं पढ़ते थे. फिर अम्मी को ख्याल आया कि हमें भी अपने बच्चों को पढ़ाना चाहिए."
दकियानूसी सोच

नादिया डॉक्टर बनने की ख्वाहिशमंद हैं. वह कहती हैं, "जब मैं स्कूल में दाखिल हुई थी तो मुझे कुछ नहीं आता था. जब मिस ने समझाया कि ऐसा करो, ऐसा मत करो. मैंने पढ़ना सीखा, लिखना सीखा, उर्दू सीखी."
<link type="page"><caption> दकियानूसी सोच</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2012/10/121024_malal_taliban_rf.shtml" platform="highweb"/></link> और जागरूकता की कमी की वजह से अतीत में घर में बंद हो जाने वाली ये लड़कियां अब स्कूल आने के बाद बड़े बड़े ख्वाब देख रही हैं.
पाकिस्तान में ऐसे बहुत से बच्चे हैं जो स्कूल नहीं जा पाते. मगर वो अनौपचारिक शिक्षा हासिल कर रहे हैं. इस गैर रस्मी स्कूल में हर रोज तीस से चालीस बच्चे पढ़ने आते हैं यहां छठी जमात तक पढ़ाई होती है
यहां शिक्षा हासिल करने वाले बच्चों को संसाधन इजाज़त नहीं देते कि वो बाकायदा स्कूल जा सकें. इसलिए वो सुबह काम करते हैं और शाम को यहां पर अपरपंरागत शिक्षा हासिल करते हैं.
गरीबी और मुफलिसी

लेकिन पाकिस्तान में ढाई करोड़ बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने स्कूल का मुँह नहीं देखा है.
दक्षिणी पंजाब में स्थित ईंटों की इस भट्ठी में इस खानदान के तमाम लोग मजदूरी करते हैं. यहां तक कि इनके बच्चों को भी खुद अपना बोझ उठाना पड़ता हैं. पाकिस्तान में गरीबी और मुफलिसी की वजह से करोड़ों बच्चे मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं ताकि मां बाप के कर्ज़ उतार सकें.
10 साल की जीनी बहुत परेशान हैं. उन्होंने बताया, "यहाँ से जाएंगे तो हमारा खर्चा मिलेगा. खर्चा मिलने पर हमारे पेट को खाना मिल पाएगा."
पाकिस्तान में अपनी शिक्षा के लिए जंग लड़ती इन बच्चियों को यही सबक सीखने को मिला है कि ज़िंदगी एक इम्तिहान है जिसमें उन्हें शिकायत करने की इजाज़त नहीं.
<italic><bold>(<link type="page"><caption> बीबीसी हिन्दी</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> के <link type="page"><caption> एंड्रॉएड ऐप</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link> के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर <link type="page"><caption> फ़ॉलो</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> भी कर सकते हैं.)</bold></italic>












