मलाला नहीं हैं 'मलाला पुरस्कार' विजेता रज़िया की प्रेरणा

- Author, स्वाति बक्शी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान की मलाला यूसूफ़ज़ई की पहचान आज पूरी दुनिया में एक ऐसी लड़की के रूप में है जिसने कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ जाकर लड़कियों की शिक्षा के लिए आवाज़ उठाई है.
लेकिन ‘मलाला डे’ के मौक़े पर बाल-मज़दूरों को शिक्षित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र का पुरस्कार पाने वाली मेरठ की रज़िया मलाला के बजाय ख़ुद को ही अपनी प्रेरणा कहती हैं.
मैंने जब रज़िया से पूछा कि क्या मलाला उन्हे प्रेरण स्रोत नज़र आती है तो रज़िया ने कहा ‘‘मलाला का नाम तो अब सामने आया है. मैं जब पांचवी में पढ़ती थी, तभी से एक ग़ैर-सरकारी संगठन के साथ जुड़कर बाल मज़दूरों के लिए काम कर रही हूं. वो ज़रूर प्रेरणा देती हैं लेकिन मैं अपनी प्रेरणा ख़ुद हूं.’’
रज़िया बताती हैं कि उन्होंने ख़ुद एक फ़ुटबॉल सिलने वाली फ़ैक्ट्री में बाल मज़दूर के तौर पर काम करके देखा है और वो जानती हैं कि उन्हें क्या झेलना पड़ता है.
'बचपन बचाओ आंदोलन' नाम के एनजीओ के संपर्क में आने के बाद रज़िया ने बच्चों को मज़दूरी के इस कुचक्र से बचाने के लिए मुहिम शुरू की.
जागरुकता की कमी

रज़िया कहती हैं, “मैं घर-घर जाती हूं. माता-पिता से मिलकर उन्हें समझाने की कोशिश करती हूं कि बच्चों का पढ़ना कितना ज़रूरी है. मैं उन्हें समझाती हूं कि पढ़ाई क्यों ज़रूरी है. इससे वो बड़े होकर कुछ अच्छा कर सकते हैं.”
हालांकि ये काम आसान नहीं है. रज़िया का कहना है, “माता-पिता एकदम से तैयार नहीं होते थे और मुझे कहते कि क्या लेक्चर देती रहती हो.”
रज़िया कहती हैं, “बाल मज़दूरी को लेकर लोगों में जागरुकता की कमी बहुत बडी़ समस्या है. ना सिर्फ़ मां-बाप, बल्कि प्रशासन से लेकर मज़दूरी कराने वाले तक, सभी अगर इस समस्या को समझें तो ये काम आसानी से हो सकता है.”
अपनी आगे की ज़िंदगी के बारे में रज़िया कहती हैं, “मैं मदर टेरेसा की तरह समाज सेवा करना चाहती हूं. आगे भी बाल मज़दूरी मिटाने के लिए ही काम करूंगी. मेरी ख़्वाहिश है कि इस काम में पूरी दुनिया मेरा साथ दे और बच्चों से मज़दूरी करवा के बनाई गई चीज़ों का इस्तेमाल ना करें.”
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