...मौलाना फ़जलुल्लाह के कलेजे में ठंडक

शनिवार, 21 फरवरी 2009: तालिबान ने लड़कियों के स्कूलों से पाबंदी उठाई
स्वात में हालात ऱफ्ता-ऱफ्ता सही हो रहे हैं. फायरिंग और तोप़खाने के इस्तेमाल में भी बहुत हद तक कमी आई है.
लेकिन लोग अब भी डरे हुए हैं कि कहीं अमन मुहायदा (शांति समझौता) टूट न जाए.
लोग ऐसी अ़फवाहें भी फैला रहे हैं कि तालिबान के कुछ कमांडर इस समझौते को नहीं मान रहे हैं और कहते हैं कि हम आखिरी दम तक लड़ेंगे.
ऐसी अ़फवाहें सुनकर दिल धड़कने लगता है. आखिर वो ऐसा क्यों कर रहे हैं?
वह कहते हैं कि हम जामिया ह़फसा और लाल मस्जिद का बदला लेना चाहते हैं लेकिन इसमें हमारा क्या कसूर? जिन्होंने ऑपरेशन किया था उनसे ये लोग क्यों इंति़काम नहीं लेते.
अभी कुछ देर पहले मौलाना फजलुल्लाह ने एफएम पर एलान किया कि लड़कियों के स्कूल पर पाबंदी से वो अपना फैसला वापस लेते हैं. उन्होंने कहा कि लड़कियां इम्तेहान तक जो 17 मार्च से शुरू हो रहे हैं स्कूल जा सकती हैं मगर उन्हें पर्दा करना होगा।
मैं ये सुनकर बहुत ज़्यादा खुश हुई. मैं य़कीन नहीं कर सकती थी कि ऐसा भी कभी हो सकेगा.
रविवार, 22 फरवरी 2009: बाजार में पसरा खौफ
आज हम शॉपिंग करने के लिए ख्वातीन मार्केट (महिलाओं का बाजार) गए. रास्ते में हमें बहुत ज़्यादा खौ़फ महसूस हो रहा था क्योंकि तालिबान ने ख्वातीन (महिलाओं) पर बाज़ारों में शॉपिंग करने पर पाबंदी लगा रखी है.
हम मिंगोरा की चीना मार्केट गए जहां पर सिर्फ ख्वातीन की ज़रूरत की चीज़ें बिकती हैं.
बाजार में दाखिल होते ही हम हैरान हो गए कि वहां पर चंद ही ख्वातीन शॉपिंग करने आई थीं.
पहले जब हम यहां आते थे तो यहां महिलाओं की इतनी ज्यादा भीड़ होती थी कि वो एक-दूसरे को धक्का देकर अपने लिए रास्ता बनाती थीं.
बाजार में कुछ दुकानें बंद थीं और बाज़ पर लिखा हुआ था, ‘दुकान बराए फरोख्त.’ और जो खुली भी थीं तो उनमें सामान कम पड़ा था और वह भी बहुत पुराना.
पीर (सोमवार), 23 फरवरी 2009: और स्कूल खुल गए
हमारी क्लास में सिर्फ 12 लड़कियां आई थीं क्योंकि कुछ स्वात से बाहर जा चुकी है. और कुछ ऐसी हैं जिन्हें अपने वालदैन की वजह से स्कूल जाने की इजाज़त नहीं मिल पा रही.
मेरी चार सहेलियां पहले ही स्वात छोड़ कर जा चुकी हैं.
आज एक और ने भी कहा कि वो लोग भी राविलपिंडी जा रहे हैं.
मैं बहुत ख़फा हुई और उनसे कहा भी कि अब तो वह रुक जाएं क्योंकि अब यहां शांति है. हालात भी आहिस्ता-आहिस्ता ठीक हो रहे हैं मगर वह कह रही थीं कि नहीं हालात का कोई भरोसा नहीं.
मुझे बहुत दुख हुआ कि मेरी चार सहेलियां पहले ही जा चुकी हैं और सिर्फ एक रह गई थी वह भी छोड़ कर जा रही है.
बुधवार, 25 फरवरी 2009: ताकि मौलाना फजलुल्लाह का कलेजा ठंडा हो सके
अम्मी बीमार हैं और अब्बू किसी मीटिंग के सिलसिले में स्वात से बाहर गए हुए हैं. इसलिए सुबह मैंने ही नाश्ता तैयार किया और फिर स्कूल गई.

आज हमने क्लास में बहुत ज़्यादा मस्ती की. वैसे खेले जैसे पहले खेला करते थे.
आज कल हेलीकॉप्टर भी ज़्यादा नहीं आते और हमने भी फौज और तालिबान के बारे में ज़्यादा बातें करना छोड़ दी हैं.
शाम को अम्मी, मेरी चचेरी बन और मैं बु़र्का पहन कर बाहर गए. एक ज़माने में मुझे बु़र्का पहनने का बहुत शौ़क था लेकिन अब इससे तंग आई हुई हूं क्योंकि मुझसे इसमें चला नहीं जा सकता.
स्वात में आजकल एक बात मशहूर हो गई है कि एक दिन एक औरत शटल कॉक बुर्का पहन कर कहीं जा रही थी कि रास्ते में गिर पड़ी.
एक शख्स ने आगे बढ़ कर जब उसे उठाना चाहा तो औरत ने मना करते हुए कहा, ‘रहने दो भाई मत उठाओ ताकि मौलाना फ़जलुल्लाह का कलेजा ठंडा हो जाए.’
हम जब बाजार में उस दुकान में दा़खिल हुए जिसमें अक्सर शॉपिंग करते थे तो दुकानदार ने हंसते हुए कहा कि मैं तो डर गया कि कहीं तुम लोग खु़दकश हमला तो करने नहीं आए हो.
वह ऐसा इसलिए कह रहे थे कि इससे पहले एकाध वा़कया ऐसा हुआ भी है कि खुदकश हमलावर ने बु़र्का पहन कर हमला किया था.












