'सैकड़ों लोगों के खून का हिसाब कौन लेगा'?

शुक्रवार, 31 जनवरी 2009: मैं बुर्का नहीं पहनूंगी.
स्वात की जंग से हमने सिर्फ इतना फायदा उठाया कि अब्बू ने ज़िंदगी में पहली बार हम सब घर वालों को मिंगोरा से निकाल कर अलग-अलग शहरों में खूब घुमाया फिराया.
हम लोग कल <link type="page"><caption> इस्लामाबाद</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2012/12/121211_pakistan_malala_resolution_sa.shtml" platform="highweb"/></link> से पेशावर आ गए. वहां पर हमने अपने एक <link type="page"><caption> रिश्तेदार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2012/10/121010_international_pakistan_malala_clinton_va.shtml" platform="highweb"/></link> के घर में चाय पी और इसके बाद हमारा इरादा बनू जाने का था.
मेरा छोटा भाई जिसकी उम्र पांच साल है, हमारे रिश्तेदार के घर के आंगन में खेल रहा था. अब्बू ने जब उसे देख कर पूछा कि क्या कर रहे हो बच्चे तो उसने कहा ‘बाबा मिट्टी से कब्र बना रहा हूँ’.
‘अम्मी क्या कोई धमाका हो गया है’
बाद में हम अड्डे गए और वहां से एक वैगन में बैठ कर <link type="page"><caption> बिनू</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2012/11/121109_international_pakistan_malala_that_day_fma.shtml" platform="highweb"/></link> के लिए रवाना हो गए. वैगन पुरानी थी और ड्राइवर भी रास्ते में हॉर्न बहुत बजाया करता था.
एक द़फा जब खराब सड़क की वजह से वैगन एक खड्डे में गिर कर हिचकोले खा गई तो उस व़क्त अचानक हॉर्न भी बज गया तो मेरा एक दूसरा भाई जो दस साल का है अचानक नींद से जग गया.
वह बहुत डरा हुआ था. जागते ही अम्मी से पूछने लगा, ‘अम्मी क्या कोई धमाका हो गया है’. रात को हम बनू पहुंच गए जहां पर मेरे अब्बू के दोस्त पहले से ही हमारा इंतज़ार कर रहे थे.
मेरे अब्बू के दोस्त भी पश्तून हैं मगर इनके घरवालों की ज़बान हमें पूरी तरह समझ नहीं आ रही है.
मोर्टार गोलों से सिर्फ आज सैंतीस लोग मारे गए

हम बाज़ार गए और फिर वहां से पार्क. यहां पर औरतें जब भी बाहर निकलती हैं तो टोपी वाला बु़र्का पहनना उनके लिए जरूरी होता है. मेरी अम्मी ने तो पहन लिया मगर मैंने इनकार कर दिया क्योंकि मैं इसमें चल नहीं सकती हूं.
स्वात के मु़काबले में यहां अमन ज्यादा है. हमारे मेज़बानों ने बताया कि यहां भी <link type="page"><caption> तालिबान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130328_malala_diary_part-1_sk.shtml" platform="highweb"/></link> हैं मगर जंगें इतनी नहीं होतीं जितनी कि स्वात में होती हैं. उन्होंने कहा कि तालिबान ने यहां भी लड़कियों के स्कूलों को बंद करने की धमकी दी थी मगर फिर भी स्कूल बंद नहीं हुए.
शनिवार, एक फरवरी 2009: स्वात के सैकड़ों लोगों के खून का हिसाब कौन लेगा?
बनू से <link type="page"><caption> पेशावर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130328_malala_diary_2_sk.shtml" platform="highweb"/></link> आते हुए रास्ते में मुझे स्वात से अपनी एक सहेली का फोन आया. वह बहुत डरी हुई थी, मुझसे कहने लगी, हालात बहुत खराब हैं तुम स्वात मत आना. उसने बताया कि फौजी कार्रवाई बढ़ गई है और मोर्टार गोलों से सिर्फ आज सैंतीस लोग मारे गए हैं.
लोग पैदल जा रहे थे मगर खाली हाथ
शाम को हम पेशावर पहुंचे और बहुत थके हुए थे. मैंने एक न्यूज़ चैनल लगाया तो वह भी स्वात की बात कर रहा था. उसमें लोगों को पलायन करते हुए दिखाया गया. लोग पैदल जा रहे थे मगर वे खाली हाथ थे.
मैंने सोचा कि एक वह व़क्त था जब बाहर से लोग सैर-सपाटे के लिए स्वात आया करते थे और आज स्वात के लोग अपने इला़के को छोड़ कर जा रहे हैं.
मैंने दूसरा चैनल लगाया जिस पर एक खातून कह रही थी कि ‘हम शहीद बेनज़ीर भुट्टो के खून का हिसाब लेंगे’. मैंने पास बैठे अब्बू से पूछा कि ये सैकड़ों स्वातियों के खून का हिसाब कौन लेगा?
हमारे स्कूल अब नहीं खुलेंगे

सोमवार, तीन फरवरी 2009: स्कूल नहीं खुले, मैं बहुत ख़फा हूं.
आज हमारे स्कूल खुलने का दिन था. सुबह उठते ही स्कूल बंद होने का खयाल आया तो ख़फा हो गई. इससे पहले स्कूल जब तयशुदा तारीख पर न खुलता तो हम खुश हो जाया करते थे.
इस द़फा ऐसा नहीं है क्योंकि मुझे डर है कि कहीं हमारा स्कूल तालिबान के हुक्म पर हमेशा के लिए बंद न हो जाए.
अब्बू ने बताया कि प्राइवेट स्कूलों ने लड़कियों की पढ़ाई लिखाई पर पाबंदी के खिलाफ लड़कों के स्कूलों को आठ फरवरी तक न खोलने का एलान किया है. अब्बू ने बताया कि लड़कों के प्राइवेट स्कूलों के दरवाज़ों पर ये नोटिस लगाया गया है कि स्कूल नौ फरवरी को खुल जाएंगे.
उन्होंने बताया कि लड़कियों के स्कूल पर ये नोटिस नहीं लगा है जिसका मतलब है कि हमारे स्कूल अब नहीं खुलेंगे.
जारी है...












