भारत में चीनी निवेश को ढील, क्या है छह साल बाद बदलाव की वजह?

मोदी और शी जिनपिंग

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इमेज कैप्शन, बीते कुछ महीनों से भारत सरकार ने चीन के साथ रिश्तों में सुधार के संकेत दिए हैं.
    • Author, संदीप राय
    • पदनाम, बीबीसी संवादताता
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

भारत ने मंगलवार को चुनिंदा क्षेत्रों में चीनी निवेश पर लगी पाबंदियों में ढील देने को मंज़ूरी दे दी.

सरकार ने कहा कि इसका मक़सद पूंजी की कमी को घटाना है और छह साल के तनाव के बाद आर्थिक संबंधों में नए सिरे से शुरुआत करना है.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय और आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की व्यापारिक नीतियों और मध्य पूर्व में जंग के कारण बढ़ी अनिश्चितता ने हालात को और नाज़ुक बना दिया है.

शायद इसी वजह से छह साल के ठंडेपन के बाद भारत और चीन के बीच सरगर्मी बढ़ी है. साल 2020 में भारत ने चीनी कंपनियों के भारत में निवेश से जुड़े नियम कड़े कर दिए थे.

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दरअसल जून 2020 में भारत और चीन की सेना के बीच लद्दाख के गलवान में हुई हिंसक झड़प हुई थी. इस झड़प के बाद दोनों देशों के संबंध काफ़ी ख़राब हो गए थे.

इसके बाद से भारतीय कंपनियों में चीनी निवेशकों के लिए भारत के गृह और विदेश मंत्रालयों के अधिकारियों वाले एक पैनल से सुरक्षा मंज़ूरी लेना ज़रूरी कर दिया गया.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, इन पाबंदियों की वजह से कई सौदे रुक गए. इनमें 2023 में चीन की बीवाईडी का भारत में इलेक्ट्रिक कार के संयुक्त उपक्रम में एक अरब डॉलर निवेश करने की योजना भी शामिल थी.

फ़ैसले में क्या है?

एफ़डीआई

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इमेज कैप्शन, नए नियमों के अनुसार, चीनी निवेश को 60 दिनों के भीतर प्रोसेस किया जाएगा.
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सरकार के बयान के मुताबिक़, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) के नियमों में बदलाव को मंज़ूरी दी.

इन नियमों के तहत चीन समेत ज़मीनी सीमा साझा करने वाले दूसरे देशों से आने वाले निवेश पर पाबंदियां लगाई गई थीं. अब इलेक्ट्रॉनिक्स, कैपिटल गुड्स और सोलर सेल सेक्टर में निवेश की अनुमति दी जाएगी.

स्ट्रैटेजिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश के लिए 60 दिनों की समय सीमा तय की गई है.

बयान में कहा गया है कि इन क्षेत्रों में चीनी निवेश को 60 दिनों के भीतर प्रोसेस किया जाएगा, बशर्ते कंपनी में बहुमत हिस्सेदारी हर समय किसी भारतीय नागरिक के पास रहे.

मंगलवार को भारत ने यह भी अनुमति दी कि जिन निवेशकों में चीनी हिस्सेदारी 10 फ़ीसदी तक है, वे लागू क्षेत्रीय सीमा के तहत ऑटोमैटिक रूट से निवेश कर सकेंगे.

सरकार के बयान में कहा गया है कि नई गाइडलाइंस से एफ़डीआई का प्रवाह बढ़ाने, नई तकनीकों तक पहुंच बनाने और वैश्विक सप्लाई चेन के साथ बेहतर जुड़ाव में मदद मिलेगी.

बयान के अनुसार, "उम्मीद की जाती है कि नए दिशानिर्देश भारत में स्पष्टता और कारोबार में सुगमता को बढ़ावा देंगे और ऐसे निवेश को प्रोत्साहित करेंगे जो अधिक एफ़डीआई प्रवाह, नई तकनीकों तक पहुंच, घरेलू वैल्यू चेन, भारतीय कंपनियों के विस्तार और वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़ने में योगदान दे सकें."

"इससे भारत को एक पसंदीदा निवेश और मैन्युफ़ैक्चरिंग डेस्टिनेशन के रूप में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता का बेहतर उपयोग करने और उसे और मजबूत करने में मदद मिलेगी."

समाचा एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा वित्त वर्ष 2024–25 में बढ़कर 99 अरब डॉलर हो गया. इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, कंपोनेंट्स और मशीनरी के आयात की बड़ी भूमिका रही.

उद्योग जगत की मांग के चलते यह ढील दी गई. 2020 की पाबंदियों की वजह से वे निर्माता प्रभावित हो रहे थे जो चीनी तकनीक और पूंजी पर निर्भर हैं.

संबंधों को पटरी पर लाने की कोशिशें तेज़

भारत और चीन

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इमेज कैप्शन, हाल ही में भारत ने चीनी नागरिकों को वीज़ा देने में ढील देने से लेकर सीधी उड़ानों की मंज़ूरी दी है.

बीबीसी हिन्दी न्यूज़ से बात करते हुए दिल्ली के फ़ोर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में चीन मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद ने कहा कि अमेरिकी टैरिफ़ से पैदा हुई नए वैश्विक ऑर्डर ने भारत को चीन के साथ संबंधों में संतुलित तरीके से नए सिरे से सोचने पर भी मजबूर किया है, ताकि सप्लाई चेन स्थिर रहे और निवेश आकर्षित किया जा सके.

उन्होंने कहा, "अरसे से इस फ़ैसले का इंतज़ार था और यह दोनों देशों के लिए विन-विन वाली स्थिति होगी."

अगस्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सात साल बाद पहली बार चीन गए थे. वहां उनकी मुलाकात चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हुई, जिसमें संबंधों को बेहतर बनाने के तरीकों पर चर्चा हुई.

इसके बाद भारत और चीन ने सीधे हवाई उड़ानें फिर से शुरू की हैं. लद्दाख में कई सैन्य झड़पों के बाद पांच साल तक रुकी रहने के बाद दोनों देशों ने सीधी यात्री उड़ानें भी फिर से शुरू कर दी हैं.

भारत ने चीनी नागरिकों को वीज़ा जारी करने की प्रक्रिया में भी ढील देना भी शुरू कर दिया है.

इसी बीच भारत का वित्त मंत्रालय 2020 के उन प्रतिबंधों को हटाना शुरू कर चुका है जिनके तहत चीनी कंपनियों को भारतीय सरकारी ठेकों में बोली लगाने से रोका गया था.

पिछले महीने रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया था कि भारत ने सरकारी बिजली और कोयला कंपनियों के लिए चीनी उपकरणों की खरीद पर लगी पाबंदियों में भी ढील दी है.

क़ानूनी फ़र्म सराफ एंड पार्टनर्स के सीनियर पार्टनर वैभव कक्कड़ ने रॉयटर्स से कहा कि 'इस बदलाव से सीमा पार विलय और अधिग्रहण, अल्पसंख्यक निवेश और रुके हुए फंडिंग राउंड को बढ़ावा मिल सकता है. इसका असर खासतौर पर मैन्युफैक्चरिंग जैसे पूंजी आधारित क्षेत्रों और स्टार्टअप्स पर पड़ेगा.'

भारत ने क्यों लिया ये फ़ैसला

 प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद

बीते एक साल से अमेरिका के टैरिफ़ वॉर के कारण भारत को भारी आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. जानकारों का कहना है कि भले ही अमेरिका ने टैरिफ़ कम किए हैं लेकिन अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है. ऐसे में भारत को भी एक मजबूत आर्थिक साझेदार की ज़रूरत है.

अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि 'भारत में पूंजी निवेश को लेकर एक भूख दिखती है और चीन में ओवर कैपिसिटी है, ऐसे में दोनों देशों के बीच निवेश को बढ़ावा मिलता है तो ये दोनों के हित में होगा.'

अधिकारी ने ये भी कहा कि 'चीन को अमेरिकी ट्रेज़री बांड्स में से बेहतर रिटर्न भारत में निवेश से मिल सकता है. यही वो आकर्षण है जिससे चीन निवेश करना चाहेगा.'

प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद कहते हैं, "मध्य-पूर्व में हालात के कारण दुनिया में बढ़ी अनिश्चितता के बीच भारत और चीन को और क़रीब आने की ज़रूरत महसूस हुई है. अगर भारत में चीन का निवेश आता है तो इससे भारत में ग्लोबल वैल्यू चेन मजबूत होगी."

उन्होंने कहा, "यह मेक इन इंडिया के लिए भी एक फ़ायदे की बात होगी क्योंकि देश के अंदर सेमी कंडक्टर मिशन की बात हो रही है लेकिन जबतक निवेश नहीं होगा ऐसी योजनाएं आकार नहीं ले पाएंगी. दूसरी बात है कि चीन अपनी ओवर कैपिसिटी को पहले ही डायवर्सिफ़ाई करना चाहता रहा है, इसीलिए बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की शुरुआत की गई और अलग अलग देशों में ढांचागत निवेश किए गए."

बीते एक साल से ये देखने को मिल रहा है कि सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद भारत में घरेलू निजी निवेश भी नहीं हो रहा है और विदेशी निवेश भी बड़े पैमाने पर बाहर गया है.

दिसंबर 2025 में आरबीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले साल सितंबर में 1.66 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) बाहर गया जबकि अक्तूबर में 1.55 बिलियन डॉलर का शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बाहर निकला था.

प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद के अनुसार, "एफ़डीआई के आने से घरेलू निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा. अगर मैन्युफ़ैक्चरिंग बढ़ती है तो सहयोगी उद्योग भी बढ़ेंगे."

हालांकि उनका कहना है कि, "इसमें क्रिटिकल सेक्टर बहुत महत्वपूर्ण होंगे, जैसे सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी), इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें भारत की प्रगति उतनी नहीं हो रहा है, भले दावे किए गए हों. ये तभी होगा जब निवेश आए और बड़े पैमाने पर आए."

"इसमें कोई दो राय नहीं है कि दोनों आपस में ट्रेड और इनवेस्टमेंट रिलेशन बढ़ाना चाहते हैं. रीजनल कांप्रिहेंसिव पार्टनरशिप (आरसीपी) जब हुआ तो उससे हम लोग 2019 में अलग हो गए. लेकिन बाद में हमने बहुत सारे देशों से फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट किए. चीन के साथ तो हमारा कोई एफ़टीए नहीं है. लेकिन आर्थिक सहयोग बनाने के लिए सिर्फ़ इसी की ज़रूरत नहीं होती, इसे निवेश के मार्फ़त भी कर सकते हैं."

उनके मुताबिक़, "ऐसा नहीं है कि भारत में चीनी कंपनियां काम नहीं कर रही हैं. चीन कंपनियों का तो वैसे भी भारत में बहुत बड़ा निवेश और बाज़ार है, चाहे इलेक्ट्रॉनिक्स हो या मोबाइल फ़ोन हो. लेकिन ईवी का जो बज़ार है वो अनटैप्ड है."

वो कहते हैं कि चीन ईवी के मामले में दुनिया का नंबर वन प्लेयर है अगर वो भारत निवेश करता है तो एंसीलियरी इंडस्ट्री (सहयोगी उद्योग) भी बढ़ेगा. रोज़गार भी पैदा होगा. चीनी कार निर्माता कंपनी बीवाईडी ने चीन में काफ़ी ग्रोथ किया है अगर वो यहां निवेश करती है तो यह बहुत महत्वपूर्ण बात होगी.

वो कहते हैं कि सरकार के इस फ़ैसले से दोनों देशों का फ़ायदा होगा.

क्या ये चीन की शर्त पर है?

पीएम मोदी

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इमेज कैप्शन, भारत सरकार ने कहा है कि एफ़डीआई में ढील से भारत के मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर को फ़ायदा पहुंचेगा.

विशेषज्ञ इसे चीन को लेकर भारत की नीति में यूटर्न के रूप में देख रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रह्म चेलानी ने एक्स पर लिखा, "चीन को ध्यान में रखते हुए उठाए गए एक क़दम में भारत ने आज अपने साथ ज़मीनी सीमा साझा करने वाले देशों के लिए एफ़डीआई नियमों में ढील दी. इससे 2020 में लगाए गए प्रतिबंध उलट दिए गए. उस समय नई दिल्ली ने पूर्वी लद्दाख में चीन की चुपचाप घुसपैठ का पता लगाया था."

उनका कहना है कि यह क़दम मोदी सरकार की उन कई पहलों में से एक है जिनका मक़सद चीन के साथ संबंधों को सामान्य बनाना है.

उन्होंने लिखा, "यह प्रक्रिया काफी हद तक बीजिंग की शर्तों पर आगे बढ़ती दिखाई देती है. इससे पहले भारत 2020 से पहले की क्षेत्रीय स्थिति बहाल करने की मांग करता रहा था, जिसे अब प्रभावी रूप से छोड़ दिया गया है."

हालांकि कुछ टकराव वाले इलाकों में दोनों देशों की सेनाएं पीछे हटी हैं, लेकिन उनका कहना है कि बनाए गए "बफ़र ज़ोन" अक्सर उन क्षेत्रों में हैं जहां पहले भारत गश्त करता था. इससे ज़मीन पर मौजूदा स्थिति चीन के पक्ष में बदलती दिखाई देती है.

ब्रह्म चेलानी ने लिखा है, "बिजली ग्रिड से लेकर इलेक्ट्रिक वाहन इंफ्रास्ट्रक्चर तक संवेदनशील क्षेत्रों में चीनी निवेश बढ़ने से बीजिंग को संभावित "किल स्विच" या भारत की नीतियों पर नया आर्थिक दबाव बनाने का साधन मिल सकता है."

वो कहते हैं, "विडंबना यह है कि 2020 की घुसपैठ के बाद भारत ने चीन से "डिकपल" होने की कोशिश की थी. लेकिन अब वह चीनी सप्लाई चेन पर पहले से भी ज़्यादा निर्भर दिखाई देता है. इसका नतीजा यह है कि भारत के साथ चीन का द्विपक्षीय व्यापार अधिशेष लगातार बढ़ रहा है, जो पहले ही भारत के पूरे वार्षिक रक्षा बजट से ज़्यादा हो चुका है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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