ब्रिटेन :जात पात है पर नहीं बनाएंगे कानून

ब्रिटेन में सांसदों ने <link type="page"><caption> जातीय भेदभाव</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130306_britain_uk_aa.shtml" platform="highweb"/></link> पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ वोट दिया है लेकिन इस दिशा में अभियान चला रहे लोगों का कहना है कि वे क़ानून बनाने के लिए अपनी लड़ाई ज़ारी रखेंगे.
हाउस ऑफ़ कॉमन्स में मंगलवार को जब इस मुद्दे पर चर्चा हो रही थी तब सैकड़ों लोगों ने संसद के बाहर प्रदर्शन किया.
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि इस संबंध में <link type="page"><caption> क़ानून</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130327_anti_rape_law_vr.shtml" platform="highweb"/></link> की सख्त ज़रूरत है क्योंकि हजारों लोगों को अब भी निचली जाति का माना जाता है और उन्हें अपमान तथा भेदभाव सहना पड़ता है.
लेकिन सांसदों ने कहा कि <link type="page"><caption> हिन्दू</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/11/121126_pak_hindu_education_arm.shtml" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> सिख</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130402_us_sikh_genocide_fma.shtml" platform="highweb"/></link> समुदाय की चिंता है कि ऐसे क़ानून से ये सामाजिक कलंक घटने की बजाए बढ़ सकता है.
जातीय भेदभाव को समानता अधिनियम में शामिल किए जाने के ख़िलाफ़ 307 और इसके पक्ष में 243 वोट पड़े.
संकल्प
<link type="page"><caption> दलित</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/11/121109_dalit_ghee_pa.shtml" platform="highweb"/></link> सॉलिडेरिटी नेटवर्क की मीना वर्मा ने कहा, “मुझे गहरी निराशा हुई है. लेकिन हम इस क़ानून के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेंगे.”
इस क़ानून के लिए अभियान चला रहे लोगों का कहना है कि मौजूदा क़ानूनों में भेदभाव के ख़िलाफ़ कोई प्रावधान नहीं है.
उनका कहना है कि जाति व्यवस्था ने समाज को अनुचित तरीके से बांट रखा है. जो इस व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर हैं उन्हें अछूत कहा जाता है और उन्हें गंदा तथा कम मेहतनताना वाला काम दिया जाता है.
उनकी शिकायत है कि उनसे ये अपेक्षा की जाती है कि वे ऊंची <link type="page"><caption> जाति</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/08/100813_castcensus_cabinet_vv.shtml" platform="highweb"/></link> वालों का सम्मान करें और उन्हें ऐसा करने के लिए मज़बूर किया जाता है.
उनका कहना है कि <link type="page"><caption> भारत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/04/110414_caste_adg.shtml" platform="highweb"/></link> में जातीय भेदभाव पर प्रतिबंध है और वे चाहते हैं कि ब्रिटेन में भी दलितों के संरक्षण के लिए वैसा ही क़ानून बने.
एंटी कास्ट डिस्क्रिमिनेशन एलायंस के रवि कुमार ने कहा, “हम आज़ यहां इसलिए एकत्र हुए हैं क्योंकि हम ब्रिटेन में समानता, सम्मान और गरिमा की मांग कर रहे हैं.”
उन्होंने कहा, “ब्रिटेन में जातीय भेदभाव दशकों से चला आ रहा है. हमने देखा है कि पिछले लगभग एक दशक में इसमें तेज़ी आई है. सोशल मीडिया और लोगों के फिर से अपनी <link type="page"><caption> जातीय पहचान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/10/101010_dalit_names_bareth.shtml" platform="highweb"/></link> की तरफ लौटने से ऐसा हुआ है.”
स्वीकारोक्ति
हाउस ऑफ़ कॉमन्स में सरकार ने इस बात को माना कि ब्रिटेन में जातीय भेदभाव होता है. लेकिन साथ ही कहा कि क़ानून बनाने से इससे छुटकारा नहीं पाया जा सकता है.
इक्वेलिटीज मिनिस्टर जो स्विनसन ने सांसदों से कहा, “ये एक ऐसा मुद्दा है जो हिन्दू और सिख समुदायों से संबंधित है. यही वजह है कि इस समस्या के निदान के लिए हम इन समुदायों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.”

उन्होंने साथ ही चेतावनी भी दी कि क़ानून बनाने से समस्या घटने की बजाए बढ़ सकती है. सरकार शिक्षा कार्यक्रम के माध्यम से इस समस्या से निपटने की योजना बना रही है.
माना जाता है कि ब्रिटेन में निचली जातियों के 40,0000 लोग रहते हैं.
कास्टवॉच यूके के देविन्दर प्रसाद ने कहा कि उनमें से कई ने किसी न किसी तरह को भेदभाव झेला है.
उन्होंने इसे एक अदृश्य बीमारी बताते हुए कहा कि ब्रिटेन में गैर एशियाई लोग भी अब इससे परिचित होने लगे हैं. उन्होंने कहा, “जाति व्यवस्था के शिकार लोगों के लिए ये एक ख़ौफनाक अनुभव है. इससे आपको ये महसूस होता है कि आप कमतर हैं. पीड़ितों को दर्द को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है.”
आयोग
बहस के दौरान कई सांसदों ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया.
कंजरवेटिव सांसद रिचर्ड फुलर ने कहा, “ये एक सीधा सा मुद्दा है, कार्यक्षेत्र में जातीय भेदभाव गलत है और जो लोग इसके शिकार हैं उन्हें क़ानूनी संरक्षण की ज़रूरत है.
सरकार ने समानता और मानवाधिकार आयोग से कहा है कि वो जातीय भेदभाव और शोषण की प्रवृत्ति की जाँच करे और ये सुझाव दे कि इसे रोकने के लिए क्या उपाय किए जाएं.
आयोग इस साल के बाद में अपनी रिपोर्ट देगा.












