हरि बुद्धा मागर: दोनों पैर गंवा चुके गोरखा सैनिक जिन्होंने माउंट एवरेस्ट पर रचा इतिहास

- Author, नथाली एडेल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
अफ़ग़ानिस्तान में तैनाती के दौरान अपने दोनों पैर गंवा चुके ब्रिटिश आर्मी के एक रिटायर्ड गोरखा जवान ने माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल कर पर्वतारोहण में एक नया इतिहास रच दिया.
गोरखा रेजिमेंट में सैनिक रह चुके हरि बुद्धा मागर दोनों पैरों न होने पर भी एवरेस्ट की चढ़ाई करने वाले पहले पर्वतारोही बन गए हैं.
43 साल के हरि बुद्धा ब्रिटेन के कैंटरबरी में रहते हैं और उन्होंने दूसरों को प्रेरित करने और विकलांगता के प्रति लोगों के नज़रिये को बदलने के लिए ये चुनौती स्वीकार की थी.
उनकी टीम ने बताया कि माउंट एवरेस्ट की चोटी पर वो शुक्रवार को भारतीय समयानुसार रात 8.30 बजे पहुंचे.
सेटेलाइट फ़ोन पर उन्होंने बताया, "जितना मैंने सोचा था, ये उससे कहीं ज्यादा ये कठिन था."
उन्होंने कहा, "आपको लगातार चोटी की ओर आगे बढ़ना होता है, चाहे इस दौरान कितना भी दर्द हो या कितना भी समय लगे."

'कुछ भी संभव है'
साल 2010 में अफ़ग़ानिस्तान में एक आईइडी पर उनका पैर पड़ गया था और धमाके में उनके दोनों पैर उड़ गए.
तीन बच्चों के पिता हरि बुद्धा ने बताया कि धमाके के बाद जब होश आया तो लगा जैसे ज़िंदगी समाप्त हो गई लेकिन स्कीइंग, गोल्फ़, साइक्लिंग और क्लाइंबिंग से उनका हौसला फिर से लौटा.
उन्होंने 11 दिन पहले नेपाली पर्वतारोहियों की एक टीम के साथ चढ़ाई शुरू की. इस टीम की अगुवाई कृष थापा कर रहे थे, जो खुद एक पूर्व गोरखा सैनिक हैं और एसएएस माउंटेन ट्रुप लीडर रहे हैं.
हरि बुद्धा ने बताया कि जब हालात थोड़े कठिन हो जाते तो अपने 'शानदार परिवार' और मदद करने वालों को याद कर वो आगे बढ़ते रहने का हौसला जुटाते.
उन्होंने कहा, "मेरा सबसे बड़ा मकसद विकलांगता के प्रति धारणा को बदलना था और दूसरे लोगों को प्रेरित करना था."
"इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका सपना कितना बड़ा है या आपकी विकलांगता कितनी चुनौतीपूर्ण है, सही मनोदशा से कुछ भी संभव है."
हरि इसी हफ़्ते ब्रिटेन लौटने वाले हैं.
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