मोहम्मद अली सदपारा: पाकिस्तान का पर्वतारोही जिनका हो रहा है इंतज़ार

मोहम्मद अली सदपारा

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    • Author, एम. इलियास ख़ान
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद
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मोहम्मद अली सदपारा को पर्वतारोहियों के अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एक कुशल पर्वतारोही के तौर पर याद किया जाता है और उनके अपने देश पाकिस्तान में एक हीरो के तौर पर भी.

मोहम्मद अली अकेले ऐसे पाकिस्तानी हैं जिन्होंने दुनिया के सबसे ऊँचे 14 पहाड़ों में से आठ पर फ़तह पाई. इतना ही नहीं, वो सर्दियों के मौसम में दुनिया की नौवीं सबसे ऊँची चोटी नंदा पर्वत पर चढ़ाई करने वाले पहले शख़्स बने.

पाँच फ़रवरी शुक्रवार को के-2 पर चढ़ाई की कोशिश के दौरान वो दो अन्य पर्वतारोहियों के साथ लापता हो गए. के-2 दुनिया की दूसरी सबसे ऊँची पर्वत चोटी (8,611 मीटर) है. ये दुनिया की सबसे घातक पर्वत चोटियों में से एक भी है. मोहम्मद अली के साथ आइसलैंड के जॉन स्नोरी और चिली के ख़्वा पाब्लो भी थे, जो लापता हो गए.

मोहम्मद अली के बेटे साजिद भी पर्वतारोहियों के दल का हिस्सा थे और उनकी योजना थी कि बाप-बेटे सर्दी के मौसम में के-2 पर चढ़ें, वो भी बिना ऑक्सीजन के. इस कोशिश में पहले कोई कामयाब नहीं हो पाया था. लेकिन साजिद को 'बॉटलनेक' नाम के स्पॉट से वापस लौटना पड़ा क्योंकि उनकी तबीयत ख़राब हो गई थी.

'बॉटलनेक स्पॉट' को 'डेथ ज़ोन' यानी 'मौत वाली जगह' के नाम से भी जाना जाता है. बॉटलनेक के-2 की चोटी से महज़ 300 मीटर नीचे है.

अपने पिता और दो पर्वतारोहियों के ग़ायब होने के बाद साजिद सेना और बचाव दलों के साथ मिलकर उनके निशान ढूँढने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन अब तक उनका कोई अता-पता नहीं है. सेना अब उन्नत C-130 एयरक्राफ़्ट और इन्फ़्रारेड तकनीक की मदद से सर्च ऑपरेशन दोबारा शुरू करना चाहती है

मगर साजिद को अब बहुत ज़्यादा उम्मीदें नहीं हैं.

उन्होंने पिछले हफ़्ते कहा था, "मैं सर्च ऑपरेशन में जुटे सभी लोगों का शुक्रगुज़ार हूँ लेकिन अब तक उनके ज़िंदा बचे रहने की उम्मीद बहुत कम है. इसलिए खोज का मक़सद अब उनके शवों का पता लगाना होना चाहिए."

साल 2012 में के2 पर चढ़ाई के दौरान अपने दल के साथ मोहम्मद अली

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इमेज कैप्शन, साल 2012 में के2 पर चढ़ाई के दौरान अपने दल के साथ मोहम्मद अली (दाएं से दूसरे)

मोहम्मद अली सदपारा कौन हैं?

मोहम्मद अली सदपारा का जन्म 1976 में उत्तरी पाकिस्तान के बाल्टिस्तान इलाके के सदपारा गाँव में हुआ था.

इस इलाके में रहने वालों का मुख्य पेशा पशुपालन है और यहाँ के युवा इधर आने वाले सैलानियों और पर्वतारोहियों के लिए कुली का काम करते हैं.

मोहम्मद अली ने गाँव से ही मिडिल स्कूल तक की पढ़ाई की जहाँ उनके पिता एक छोटे सरकारी कर्मचारी थे. इसके बाद उनका परिवार स्कर्दू कस्बे में आ गया जहाँ मोहम्मद अली ने आगे की पढ़ाई की. इसके बाद वो पर्वतारोहण में जुट गए.

स्थानीय पत्रकार निसार अब्बास उनके रिश्तेदार और दोस्त हैं. वो बताते हैं कि मोहम्मद अली बचपन से ही असाधारण प्रतिभा वाले थे.

अब्बास याद करते हैं, "उनका शरीर और आदतें किसी एथलीट जैसी थीं. वो पढ़ाई में भी अच्छे थे. वो कभी फ़ेल नहीं हुए. मोहम्मद के बड़े भाई पढ़ाई में अच्छे नहीं थे इसलिए उनके पिता चाहते थे कि उन्हें अच्छी शिक्षा मिले. यही वजह थी कि वो गाँव से स्कर्दू कस्बे में आ गए."

"परिवार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी इसलिए साल 2003-2004 में उन्होंने पर्वतारोहण शुरू कर दिया."

अब्बास बताते हैं, "वो सैलानियों में बहुत जल्दी लोकप्रिय हो गए क्योंकि जिन चढ़ाइयों में वो गए उनमें से ज़्यादातर सफल रहीं. साल 2016 में उनकी शोहरत परवान पर चढ़ी जब वो सर्दी के मौसम में नंदा पर्वत पर चढ़ने वाले तीन सदस्य दल में थे."

कराची के रहने वाले हामिद हुसैन स्कर्दू के एक टूर ऑपरेटर हैं. वो मोहम्मद अली को साल 2012 से जानते हैं.

हामिद याद करते हैं, "वो बहादुर, ख़ुशमिज़ाज और दोस्ताना थे. वो शरीर से ख़ूब फ़िट भी थे. कई बार हम साथ-साथ ट्रेकिंग करते थे. कई बार तो चलते-चलते हमारी साँस फूलने लगती थी और हम थककर गिर जाते थे. लेकिन इसके बावजूद वो ऊँची चढ़ाइयों पर चढ़ जाते थे और हम पर जल्दी आगे बढ़ने के लिए चिल्लाते थे."

साल 2016 की सर्दियों में सदपारा घाटी से देओसाई मैदान की ओर ट्रेकिंग के दौरान बर्फीली हवा हड्डियों तक घुस रही थी, तब भी मोहम्मद अली डांस करते हुए बड़े आराम से चढ़ रहे थे.

पिछले तीन वर्षों में मोहम्मद अली फ़्रांस और स्पेन जाकर यूनिवर्सिटी के छात्रों को पर्वतारोहण का प्रशिक्षण दे रहे थे.

पर्वतारोही

ऑक्सीजन के बिना के-2 की चढ़ाई क्यों?

एक थ्योरी तो ये कहती है कि वो जॉन स्नोरी के लिए एक 'हाई-एल्टिट्यूड पोर्टर' के तौर पर काम कर रहे थे, जिनका काम पर्वतारोहियों के सामान को ऊंचाई तक ले जाना होता है और इसके लिए उन्होंने जो समझौता किया था, वो उसका पालन कर रहे थे.

लेकिन निसार अब्बास इस थ्योरी से सहमत नहीं हैं, क्योंकि कुछ हफ़्ते पहले जब एक नेपाली टीम ने सर्दियों में के-2 की चढ़ाई पूरी करने का कारनामा किया, तो सदपारा ने खुले तौर पर कहा था कि वो भी ऐसा करना चाहते हैं.

और एक नया रिकॉर्ड बनाने के लिए उन्होंने कहा था कि वो ऐसा बिना ऑक्सीजन के करेंगे. उन्होंने ये भी कहा था कि जब वो यह कीर्तिमान स्थापित करेंगे, तो वो चाहेंगे कि उनका बेटा उनके साथ हो.

उनके बेटे साजिद ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने 25-30 पर्वतारोहियों के साथ चढ़ाई शुरू की थी. इनमें कुछ लोकल लोग थे और कुछ विदेशी थे. लेकिन सभी लोग 8,000 मीटर वाले पॉइंट तक पहुँचने से पहले ही वापस लौट गये थे.

साजिद के अनुसार, जब वो 8,211 मीटर की ऊंचाई पर स्थित 'बॉटलनेक' पर पहुँचे तो उनकी भी हालत बिगड़ने लगी थी.

साजिद ने कहा, "हमारी इमरजेंसी किट में हमने एक ऑक्सीजन सिलेंडर रखा था ताकि आपात स्थिति में उसे इस्तेमाल किया जा सके. मेरे पिता ने कहा कि मैं उसमें से थोड़ी ऑक्सीजन ले लूँ जिससे मुझे थोड़ी राहत मिले."

लेकिन जिस वक़्त साजिद अपना ऑक्सीजन सिलेंडर तैयार कर रहे थे, तब उनके मास्क रेगुलेटर से ऑक्सीजन रिसने लगी.

इस बीच, उनके पिता और दो विदेशी पर्वतारोहियों ने 'बॉटलनेक' से आगे की चढ़ाई जारी रखी और उनके पिता ने पीछे मुड़कर साजिद से कहा कि 'वो भी चढ़ाई जारी रखे.'

साजिद ने बताया, "मैं चिल्लाया कि सिलेंडर से ऑक्सीजन लीक हो रही है. उन्होंने कहा कि चिंता मत करो, आगे बढ़ते रहो. तुम्हें बेहतर महसूस होने लगेगा. लेकिन मैं आगे बढ़ने की ताक़त नहीं जुटा पा रहा था. इसलिए मैंने पीछे वापस लौटने का निर्णय किया. ये शुक्रवार दोपहर की बात है. मैंने उन्हें आख़िरी बार तभी देखा था."

जब साजिद से पूछा गया कि सदपारा ने आगे बढ़ते रहने की ज़िद क्यों की, तो उन्होंने कहा कि "नेपाल के पर्वतारोहियों ने के-2 की चढ़ाई हफ़्तों पहले पूरी कर ली थी और वो भी ऐसा करना चाहते थे, क्योंकि के-2 हमारा पर्वत है."

बायें से दायें: अली सदपारा, जॉन स्नोरी और साजिद सदपारा.

इमेज स्रोत, NISAR ABBAS

इमेज कैप्शन, बायें से दायें: अली सदपारा, जॉन स्नोरी और साजिद सदपारा.

आख़िर क्या हुआ होगा?

साजिद कहते हैं कि उन्होंने तीन लोगों को बॉटलनेक से ऊपर जाते हुए देखा था, जो शायद के-2 की चोटी तक पहुँच गये होंगे.

विशेषज्ञ कहते हैं कि ज़्यादातर दुर्घटनाएं उतरते समय होती हैं, क्योंकि उतरते समय अगर ज़रा भी बैलेंस बिगड़ा तो पर्वतारोही सीधे मौत के मुँह में गिर सकते हैं.

जो लोग सदपारा को जानते हैं, वो कहते हैं कि 'उनसे ऐसी ग़लती हो, इसकी संभावना ना के बराबर है.'

उनके गाँववाले आज भी याद करते हैं कि पहाड़ी क्षेत्र में जब कोई बकरी घायल हो जाती है, तो लोग उसका गला काट देते हैं क्योंकि उसे नीचे लेकर आना मुश्किल होता है. मगर सदपारा अपनी किसी बकरी के घायल होने पर, उसे कंधे पर उठाते और पहाड़ से नीचे उसका इलाज कराने ले आया करते थे.

इन लोगों का मानना है कि सदपारा शायद इसलिए वापस नहीं आ पाये, क्योंकि उनके एक या दोनों साथियों के साथ कुछ हादसा हो गया होगा और वे उन्हें बचाने की कोशिश करते रहे होंगे.

हालांकि, हमें सच्चाई शायद कभी पता नहीं चल पायेगी कि उस दिन आख़िर क्या हुआ.

उनके गाँव के लोग आज भी एक चमत्कार का इंतज़ार कर रहे हैं.

लेकिन, जैसा उनके बेटे साजिद ने बताया कि इतने ख़तरनाक वातावरण, ऑक्सीजन की कमी और भयंकर सर्दी (जहाँ पारा -80 डिग्री तक गिर जाता है) में किसी इंसान का एक हफ़्ते तक जीवित बचे रहने की उम्मीद लगभग ना के बराबर है.

साजिद ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि "आज तक पर्वतारोहण के इतिहास में ऐसा नहीं हुआ है, इसलिए हम किसी चमत्कार की ही उम्मीद कर सकते हैं."

वीडियो कैप्शन, K2 फ़तह करने वाली टीम के नौजवानों ने ये कमाल कैसे कर दिखाया?
BBC ISWOTY

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