वो शख़्स जिसने जमा देने वाले माइनस टेम्प्रेचर को मात दी थी

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- Author, विलियम पार्क
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
शून्य से नीचे तापमान वाली जगह पर अकेले फंस जाने के बाद आइसलैंड के मछुआरे के ज़िंदा बचने की कहानी मानव शरीर की क्षमताओं के रहस्य से पर्दा उठाती है.
हेइमी दक्षिणी आइसलैंड के वेस्टमैन द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है जो पफ़िन परिंदों से आबाद है. इस द्वीप के दक्षिणी छोर पर है स्ट्रोहॉफी. अटलांटिक महासागर से लगती हुई इस जगह पर यूरोप में सबसे तेज़ हवाएं चलती हैं.
12 मार्च 1984 को तड़के इसी जगह पर 23 साल के गुलाउगर फ्रायॉर्सन ज़िंदगी और मौत के बीच फंसे हुए थे. बर्फ़ के नीचे दबी ज्वालामुखीय चट्टानों से उनके नंगे पैर जख़्मी हो गए थे जिनसे ख़ून रिस रहा था.
उनके कपड़े समुद्री पानी से भींगे हुए थे और शरीर से चिपककर जम रहे थे. ये हालात ज़िंदगी छीन लेने वाले थे, लेकिन फ्रायॉर्सन के अंदर कुछ तो ऐसी बात थी जो उन्हें आगे बढ़ा रही थी.
तापमान माइनस 2 डिग्री सेंटीग्रेड था लेकिन तूफ़ानी हवाओं की वजह से ठंड ज़्यादा महसूस हो रही थी. वह भेड़ों के लिए रखे गए एक बाथटब के पास रुके. क़रीब एक सेंटीमीटर मोटी बर्फ़ की परत को मुक्के से तोड़कर वह ठंडा पानी पीने लगे.
ठंड में डिहाइड्रेशन
ऐसी मुश्किल घड़ी में बर्फीला पानी पीना अजीब लग सकता है. ठंडे मौसम में डिहाइड्रेशन एक बड़ी समस्या है. ठंड में हवा शुष्क हो जाती है. हवा में नमी नहीं होने से सांस छोड़ने पर फेफड़ों की नमी घटती जाती है.
ठंड में प्यास कम लगती है जिससे कई लोग पर्याप्त पानी नहीं पीते. अगर आप गर्म रहने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं और तेज़ सांस ले रहे हैं तो डिहाइड्रेशन के शिकार हो सकते हैं.

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पोर्ट्समाउथ यूनिवर्सिटी में फिजियोलॉजी के प्रोफेसर माइक टिप्टन का कहना है कि ठंड में डिहाइड्रेशन से जुड़ी कई समस्याएं आम हैं.
फ्रायॉर्सन के गीले कपड़े उनको बेहाल कर रहे थे. शरीर का तापमान अगर 35 डिग्री सेंटीग्रेड (95 फारेनहाइट) से नीचे गिर जाए तो हाइपोथर्मिया का जोखिम बढ़ जाता है.
लगातार चलते हुए वह अपने शरीर का तापमान बढ़ाए हुए थे, लेकिन पानी पीने के लिए रुकने की वजह से मांसपेशियां शिथिल पड़ गईं और गर्मी बननी बंद हो गई. ज़िंदा रहने के लिए उनको लगातार चलते रहना था.
टिप्टन कहते हैं, "ठंड में फंसा हुआ आदमी ठंडा हो यह ज़रूरी नहीं. यदि आप लगातार चलते रहें और आप अच्छे से ढंके हुए हों तो गर्म रहने के लिए पर्याप्त ऊष्मा पैदा करेंगे. अगर आप जोरदार कसरत करते हैं तो ठंड में शॉर्ट्स और टी-शर्ट में भी रह सकते हैं."
ऊंची जगहों पर शारीरिक श्रम या कसरत करने में दिक्कत हो सकती है. टिप्टन का कहना है कि एवरेस्ट पर चढ़ने वाले लोग हो सकता है कि 10 सेकेंड में एक ही कदम उठा पाएं. उनके लिए शरीर में गर्मी पैदा करना बहुत मुश्किल है.
ठंड में पर्वतारोहियों की मौत के ढेरों रिकॉर्ड्स हैं. 1974 के एक दर्दनाक वाकये में लेनिन चोटी पर बर्फीली आंधी में फंसे पर्वतारोहियों के आख़िरी क्षण बेस कैंप में प्रसारित हुए थे.
एल्विरा शातयेवा के नेतृत्व में महिला पर्वतारोहियों का दल पहली बार ताजिकिस्तान की चोटी को फतेह करने की कोशिश कर रहा था. जैसे-जैसे वे ठंडी पड़ने लगीं, वे अपनी कमजोरियों के बारे में बातें करने लगीं.

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आख़िरी संदेश में शातयेवा को यह कहते सुना गया, "एक और मर गई. मुझमें इतनी ताक़त नहीं है कि ट्रांसमीटर के बटन को पकड़े रहूं."
ठंड में दिमाग कितना चलता है?
इस बात के सबूत हैं कि अत्यधिक गर्मी में दिमाग काम नहीं करता, मगर यह उतना स्पष्ट नहीं है कि जोरदार ठंड में दिमाग पर क्या असर होता है. 2-3 डिग्री सेंटीग्रेड ठंडे पानी में 3 मिनट तक रहने से अल्पकालिक याददाश्त कमजोर पड़ती है, लेकिन मुस्तैदी बढ़ जाती है.
एक अन्य शोध में पाया गया कि हाइपोथर्मिया के बहुत करीब (35.5 डिग्री सेंटीग्रेड) आने पर भी चेतना में कोई कमी नहीं आई.
ऐसा लगता है कि हमारा दिमाग गर्मी के मुक़ाबले ठंड से निपटने में ज़्यादा सक्षम है. प्राण पर संकट हो तो शरीर कम महत्वपूर्ण अंगों की कीमत पर अधिक महत्वपूर्ण अंगों को सक्रिय रखता है. इनमें सबसे अहम अंग है हमारा दिमाग.
शातयेवा और उनकी साथी पर्वतारोहियों की चेतना घटने से पहले ही उनके दूसरे अंगों ने शायद काम करना बंद कर दिया था.
शरीर का तापमान बनाए रखने के लिए हमारा शरीर हाथों और पैरों में रक्त प्रवाह सीमित (vasoconstriction) कर देता है, लेकिन ऐसा करने से ये अंग ठंडे पड़ने लगते हैं.
हमारे शरीर के उत्तक माइनस 0.5 डिग्री सेंटीग्रेड पर जमने लगते हैं. उत्तकों के तरल पदार्थ जमने पर कोशिकाओं की दीवार टूटकर नेक्रोसिस या कोशिका मृत्यु की तरफ बढ़ जाती है. इसे फ्रॉस्टबाइट कहते हैं.

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ठंड में लोग कपड़े क्यों उतारते हैं?
हाइपोथर्मिया से मौत के करीब आने पर दिमाग में कुछ अजीब चीज़ें होती हैं. कुछ दुर्लभ मामलों में, अत्यधिक ठंड से पीड़ित लोग मौत से कुछ क्षण पहले गर्मी महसूस करते हैं.
हाइपोथर्मिया के शिकार कुछ लोग बहुत कम कपड़ों में या बिल्कुल नग्न अवस्था में मिले हैं. इस अवधारणा को "पैराडॉक्सिकल अनड्रेसिंग" कहा जाता है.
हो सकता है कि मौत से ठीक पहले वसा की परत के नीचे बहने वाला गर्म ख़ून त्वचा तक बहने लगे. इससे गर्मी का अहसास होगा. वास्तव में, पीड़ित व्यक्ति अचानक शरीर की बहुत सी गर्मी खो देता है. कपड़े उतारने से मौत ज़ल्दी आ जाती है.
ऐसे ज़्यादातर मामले (67% पुरुष, 78% महिलाएं) शराब का सेवन करने से जुड़े होते हैं.
हाइपोथर्मिया से मौत के कुछ अन्य असामान्य मामलों में, पीड़ित शख़्स आलमारी के पीछे या बिस्तर के नीचे छिपे हुए मिले हैं. इसे "हाइड एंड डाई" सिंड्रोम कहा जाता है.
ऐसा लगता है कि आख़िरी क्षणों में पीड़ित व्यक्ति भम में पड़ जाते हैं. करीब एक चौथाई लोग छिपने से पहले कपड़े भी उतार लेते हैं.
ठंड से जमकर मरे हुए लोग जो बिना कपड़ों के मिले हैं उनमें अक्सर वे होते हैं जो गर्म कपड़ों के बिना, कभी-कभी शराब के नशे में, रात में पैदल घर लौट रहे होते हैं.

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ठंड से बचने का सिस्टम
हमारा शरीर ठंड से तीन तरह से अपनी रक्षा करता है. अमरीकी वायुसेना में सर्वाइवल, इवेजन, रेसिस्टेंस एंड एस्केप (SERE) के पूर्व प्रशिक्षक जेसी क्रेब्स कहते हैं, "कपड़े या उपकरण रक्षा की पहली पंक्ति है, आश्रय दूसरा और आग तीसरा तरीका है. कपड़े कम हों तो आग जलाइए. ऐसा नहीं करेंगे तो ग़लती करेंगे."
2019 में 30 साल के एडवेंचरर टायसन स्टील इसी हालात में फंस गए थे. अलास्का की सुसीतना घाटी में जंगल के छोर पर उनकी झोपड़ी थी. वहां बर्फ की मोटी चादर बिछ गई. रात में वह आग जलाकर सोये थे.
लकड़ी की आग से निकली एक चिंगारी से झोपड़ी के ऊपर लगे प्लास्टिक के तिरपाल को जला दिया. कुछ ही मिनटों में पूरी झोपड़ी जल गई. यह स्टील के लिए 3 हफ्ते तक चले इम्तिहान की शुरुआत थी.
वह अलास्का की जानलेवा ठंड में सबसे पास के शहर से 20 मील दूर थे. अगले 20 दिनों तक वह ख़ुद को गर्म रखकर ज़िंदा रहने की लड़ाई लड़ते रहे. बर्फ में वह ज़्यादा दूर चल नहीं सकते थे. इसलिए उन्होंने वहीं रुकने का फ़ैसला किया.
स्टील ने कुछ डिब्बाबंद खाना और कंबल बचा लिए थे. जली हुई झोपड़ी के मलबे से उन्होंने आसरा तैयार किया और आग जला ली.
ठंड से बचने की तीनों रक्षा पंक्ति तैयार कर लेने के बाद उनके बचने की संभावना बढ़ गई. स्टील ने पास में ही बर्फ खोदकर SOS संदेश बनाया और मदद का इंतज़ार करने लगे.
टिप्टन कहते हैं, "अगर आप तंदुरुस्त हैं, आपके पास खाना है, आपने मदद का संदेश भेजा है और आपको मालूम है कि मदद आने वाली है तो अच्छा है कि वहीं टिके रहें, न कि बर्फीले तूफान में बाहर निकल जाएं."
स्टील जब अपनी झोपड़ी में सुरक्षित थे तब अपने परिवार के साथ नियमित संपर्क में थे और सोशल मीडिया पर पोस्ट करते रहते थे. जब संदेश आने बंद हो गए तो उनके परिवार की चिंता बढ़ने लगी. सौभाग्य से, इसी ने उनकी जान बचाई.
SOS संदेश
क्रेब्स का कहना है कि SOS संदेशों को ज़्यादातर लोग जानते हैं, लेकिन ऊपर से नीचे देखने पर यह घुमावदार लगता है. प्रकृति भी घुमावदार है. पहाड़ियां, झीलें और धाराएं सब घुमावदार हैं, इसलिए घुमावदार चीज़ें उनमें खो जाती हैं."
सेना में क्रेब्स को सिखाया गया था कि सामान्य सहायता के लिए वी (V) लिखें और डॉक्टरी मदद के लिए एक्स (X) बनाएं. पहाड़ी इलाकों में लंबी सीधी रेखा दूर से दिखती है और इसे बनाने में समय भी कम लगता है.
बचाव के समय हेलिकॉप्टर से रिकॉर्ड किए गए वीडियो में स्टील अपने SOS संदेश के पास दोनों हाथ उठाकर मदद मांगते हुए दिखते हैं. दोनों हाथ उठाने को मदद की अपील समझा जाता है, एक हाथ उठाकर हिलाएं तो अभिवादन समझ लिया जाता है.
क्रेब्स का कहना है कि संकट का संदेश देने के लिए इससे भी बेहतर तरीका ज़मीन पर लेट जाने का है. अगर पायलट आपको देख रहा है तो ज़मीन पर लेटने से यह मैसेज तुरंत चला जाता है कि आप चोटिल हैं या बीमार हैं और तुरंत मदद चाहिए.
ज़मीन से हवा में संदेश देने का एक और तरीका है आईना. इसके लिए कार में लगे आईने का इस्तेमाल किया जा सकता है. एक आंख के ऊपर आईने को रखकर उंगलियों से वी (V) का संकेत करना है. आसमान साफ हो तो यह संदेश 50 मील (80 किलोमीटर) दूर तक दिखाई देता है.
धुआं करके संदेश देना भी आम है. पेड़ की टहनियां और पत्ते जलाने से सफ़ेद धुआं होता है जो घने जंगल में फंसे होने पर कारगर हैं. रबर या कार के टायर जलाने से काला धुआं निकलता है. यह बर्फ के बीच फंसे होने पर मददगार हो सकता है. लेकिन यह सब तभी कारगर होगा यदि उस इलाके में कोई विमान या हेलिकॉप्टर मौजूद हो.
जान बचाने का प्रशिक्षण
स्टील ने कोई सर्वाइवल ट्रेनिंग नहीं ली थी, लेकिन यूट्यूब वीडियो देखकर कुछ सीखा था. कुछ माचिस, मोमबत्तियां और बिर्च की छाल ने आग जलाने में उनकी मदद की जिससे वह भींगने से बचे रहे.
क्रेब्स का कहना है कि कपड़ों का रखरखाव आपके ज़िंदा रहने की संभावनाओं को बढ़ाता है. कपड़े गीलें हों तो उनको निचोड़िए और उस पर कुछ भुरभुरा बर्फ रगड़िए.
फ्रायॉर्सन पहले ही इस बिंदु से आगे निकल चुके थे. वह स्ट्रोहॉफी प्रायद्वीप के पूर्वी तट पर समुद्र में गिरे थे जब मछली पकड़ने वाली उनकी छोटी नाव हेलिसे VE 503 पलट गई थी.
रात 10 बजे उनकी नाव का जाल समुद्र तल में फंस गया. नाव इतनी ज़ल्दी पलट गई कि चालक दल को बचाव संदेश भेजने का भी मौका नहीं मिला.
उनके 5 मछुआरे समुद्र में गिरे. उनमें से तीन किसी तरह पलटी हुई नाव की पेंदी पर पहुंचने में कामयाब रहे, दो का कुछ पता नहीं चला. वे तट से तीन मील (5 किलोमीटर) दूर थे जहां समुद्र का तापमान 5 से 6 डिग्री सेंटीग्रेड (41-43 फारेनहाइट) था.
एक औसत आदमी 6 डिग्री से ठंडे पानी में करीब 75 मिनट तक ज़िंदा रह सकता है. प्रयोगशालाओं में, ऐसे हालात में 20 से 30 मिनट के अंदर बुरे प्रभाव दिखने लगने हैं. इतने ठंडे समुद्र में तीन मील तक तैरने में घंटों लगते हैं.
समुद्र का पानी हवा की तरह एकदम ठंडा नहीं हो सकता. समुद्र का पानी माइनस 1.9 डिग्री सेंटीग्रेड (28.6 फारेनहाइट) पर जमता है.
मार्च में आइसलैंड के आसपास का समुद्र जमने से पहले की स्थिति में रहता है. सैद्धांतिक रूप से ठंडे पानी में फ्रॉस्टबाइट होना मुमकिन है, लेकिन इसकी आशंका बहुत कम रहती है.
तैरने का फ़ैसला
पलटी हुई नाव की पेंदी पर हवा की ठंड जानलेवा थी. मछुआरों की गीली कमीज, स्वेटर और जीन्स उनकी कंपकंपी बढ़ा रहे थे. वहां रुकने का कोई विकल्प नहीं था.
टिप्टन का कहना है कि पानी से बाहर आने पर शरीर की गर्मी तेज़ी से घटती है. सामान्य तौर पर आप कपड़े बदल लेते हैं, लेकिन अगर वह उपलब्ध न हो तो बड़े से प्लास्टिक बैग में घुस जाना कारगर हो सकता है.
"यदि आप 4 डिग्री सेंटीग्रेड पर किसी को गीला करते हैं और उसके कपड़ों में एक लीटर पानी छोड़ देते हैं तो सारा पानी भाप बनने में शरीर का तापमान 10 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे चला जाएगा."
यदि आप इसी स्थिति में उस व्यक्ति को प्लास्टिक बैग के अंदर डाल देते हैं तो शरीर की गर्मी से कपड़ों का पानी भी गर्म हो जाएगा. प्लास्टिक बैग में पानी भाप बनकर नहीं उड़ेगा और उस व्यक्ति के शरीर का तापमान आधा डिग्री सेंटीग्रेड ही नीचे आएगा. ऐसे में वह 20 गुणा बेहतर स्थिति में होगा.
टिप्टन और पोर्ट्समाउथ यूनिवर्सिटी की उनकी टीम ने रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस को इस बात के लिए राजी किया है कि वे महंगे फ़ॉयल स्पेस कंबल की जगह सस्ते प्लास्टिक सर्वाइवल बैग खरीदें.
प्लास्टिक सर्वाइवल बैग नहीं होने के कारण ठंडी हवा फ्रायॉर्सन के शरीर की गर्मी को भाप में उड़ा रही थी. उनका ठंड में जम जाने का ख़तरा बहुत ज़्यादा था.
कुछ देर सोच-विचार करने के बाद तीनों मछुआरों ने तैरने का जोखिम उठाया. 10 मिनट के अंदर ही दो लोगों ने दम तोड़ दिया. फ्रायॉर्सन को तैरकर तट तक पहुंचने में 6 घंटे लगे. अपने साथियों की तुलना में वह इतने लंबे समय तक कैसे बचे रहे?
असाधारण कहानी...
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