राजनेताओं की जगह इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को शासक बनाने वाला टेक्नोक्रैट आंदोलन क्या था?

    • Author, पाउला रोजास
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़

काम करने के लिए एक हफ्ते में सिर्फ 16 घंटे निर्धारित होंगे. सभी को काम करना ज़रूरी नहीं था. लेकिन जो करेंगे वो भी 25 साल की उम्र से काम करना शुरू करेंगे और 45 साल की उम्र में रिटायर हो जाएंगे.

बाकी लोगों को भी घबराने की ज़रूरत नहीं है. उनकी स्वास्थ्य, प्रशिक्षण, आवास या भोजन की सभी ज़रूरतों का ध्यान रखा जाएगा.

पैसे की कोई अहमियत नहीं रहेगी. इसे एनर्जी सर्टिफिकेट सिस्टम से रिप्लेस कर दिया जाएगा. चीज़ों की क़ीमत उनके उत्पादन में इस्तेमाल की जाने वाली ऊर्जा की लागत के अनुसार रखी जाएगी.

इसके बदले में, लोकतंत्र के राजनीतिक सिस्टम जिसमें नागरिक अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं, को समाप्त करना होगा. कोई राजनेता या व्यवसायी नहीं होगा, बल्कि सभी निर्णय इंजीनियर और वैज्ञानिक करेंगे.

अमेरिका में महामंदी के दौरान ख्यालों में खोये 'टेक्नाटो' में शामिल व्यक्तियों के जिस समूह ने काल्पनिक संसार का सपना देखा था उसकी गूंज आज भी अमेरिका की सिलिकॉन वैली जैसी जगहों में सुनाई देती है.

इसमें कोई शक नहीं कि टेक्नाटो की काल्पनिक दुनिया कभी नहीं बनी, लेकिन टेक्नोक्रेट आंदोलन यानी वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों का वो समूह, जिन्होंने 1930 और 1940 के दशक में इस 'अभूतपूर्व दुनिया' का सपना दिखाया था. उनके इस आंदोलन के सदस्यों की संख्या पांच लाख से भी अधिक थी.

और उन्होंने अपने आंदोलन में ऐसे सवाल उठाए जो आज भी प्रासंगिक हैं.

कनाडा तक फैला आंदोलन

शायद आपने यह सुना होगा, टेक्नोक्रेट्स का मानना था कि आधुनिकता और तकनीकी प्रगति ने नए अवसर पैदा कर दिए हैं, लेकिन इस विकास और आधुनिकता ने बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी, पर्यावरणीय गिरावट, जनसंख्या वृद्धि और असमानता जैसी नई सामाजिक समस्याओं को भी जन्म दिया है.

इस आंदोलन के संस्थापक, करिश्माई और रहस्यमयी शख्सियत हॉवर्ड स्कॉट के अनुसार, इस नई दुनिया को औद्योगिक क्रांति से पहले के तरीक़ों से चलाना एक ग़लती थी.

उनका मानना था कि लोकतंत्र ने बहुत से नाकाबिल लोगों को सत्ता तक पहुंचाया है, जिन्होंने ग़लत निर्णय लिए हैं जो सामाजिक बर्बादी का कारन बने.

उनका मानना था कि इसका हल विज्ञान में है. इस नई तकनीकी दुनिया पर इंजीनियरों और विशेषज्ञों को शासन करना चाहिए था, जो रोज़मर्रा की समस्याओं के लिए वैज्ञानिक सिद्धांतों को सख्ती से लागू करेंगे.

इस आंदोलन के सदस्य ग्रे रंग के कपड़े पहनते थे, उन्होंने अपनी गाड़ियों को भी इसी रंग से पेंट कराया था और कुछ ने ख़ुद की पहचान के लिए 1x1809x56 जैसा एक नंबर भी दिया था.

वे एक-दूसरे को फौजी सैल्यूट करते थे. इस आंदोलन के प्रशंसकों में एचजी वेल्स जैसे साइंस फिक्शन लिखने वाले लेखक भी थे.

इस आंदोलन का एक औपचारिक प्रतीक भी था जिसे 'मोनाद' कहा जाता था. यिन और यांग की तरह दिखने वाला एक लाल और सफेद रंग का गोला, जो उत्पादन और खपत के बीच संतुलन का प्रतिनिधित्व करता था.

इसका प्रभाव अमेरिकी सीमाओं से परे कनाडा तक फैल गया, जहां जोशुआ हलडरमैन नाम के एक कायरोप्रैक्टर (एक ऐसा व्यक्ति जो मानता है कि बहुत सी बीमारियां तंत्रिका प्रवाह में हस्तक्षेप के कारण होती हैं) ने 1936 से 1941 तक इस आंदोलन का नेतृत्व किया.

हालांकि वे आखिर में निराश होकर दक्षिण अफ्रीका चले गए थे, लेकिन उनका पोता, जो 1971 में पैदा हुआ था, आज मंगल ग्रह पर एक टेक्नोक्रेसी बनाने का सपना देखता है.

उन्होंने अपने एक बच्चे का नाम 'X Æ A-12' रखा है. ये अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनी टेस्ला, स्पेस कंपनी स्पेसएक्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर के मालिक एलन मस्क हैं.

इस आंदोलन की शुरुआत

टेक्नोक्रेटिक आंदोलन की सोच को समझने के लिए, सबसे पहले उस ऐतिहासिक संदर्भ को समझना चाहिए जहां से इसकी शुरुआत हुई, जो दुनियाभर में कट्टरपंथी आंदोलनों के शुरू होने का असली केंद्र है.

प्रथम विश्व युद्ध ने अर्थव्यवस्था के एक बड़े दौर की शुरुआत की, जिसका अंत एक नुक़सान और अचानक घाटे के साथ हुआ. जिसे '1929 का क्रैश' कहा जाता है. जब दुनियाभर के वित्तीय बाज़ार धराशायी हो गए, आधी दुनिया की अर्थव्यवस्था डूब गई और लाखों लोग बेरोज़गार हो गए.

अंतरराष्ट्रीय टेक्नोक्रेसी के विशेषज्ञ जर्मनी की टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ डार्मस्टेड के प्रोफेसर जेन्स स्टीफेक ने बीबीसी मुंडो को बताया कि "एक सामान्य भावना थी कि उदार पूंजीवादी व्यवस्था ख़त्म हो गई है और यह अब काम नहीं करेगी."

इन वर्षों के दौरान यूरोप में कम्यूनिज़म और फ़ासीवाद ज़ोरों पर था, और ये विचार अमेरिका में भी दिखाई देने लगे थे, जहाँ इन प्रचलित विचारों के लिए हर तरह के वैकल्पिक आंदोलन उभरे थे जो संकट का कारण बने थे.

'इंटरनेशनल ऑर्गेनाइज़ेशन एज़ टेक्नोक्रेटिक यूटोपिया' के लेखक स्टीफ़िक कहते हैं, कि टेक्नोक्रेटिक आंदोलन की प्रतिक्रिया बहुत तेज़ थी. उनका मानना था कि टेक्नोक्रेसी पूंजीवाद और राजनीति पर नियंत्रण कर सकती है, इसे ख़त्म कर सकती है.

हालांकि इसके निशान मार्क्सवाद की विचारधारा में देखे जा सकते हैं, सामाजिक और आर्थिक समानता में विश्वास के कारण, या अधिनायकवाद और लोकतंत्र को ख़त्म करने की इच्छा की वजह से, इस आंदोलन ने ख़ुद को कम्यूनिज़म, समाजवाद, फ़ासीवाद, नाज़ीवाद, उदारवाद, रूढ़िवाद, और निश्चित रूप से पूंजीवादी व्यवस्था यानी उस समय की सभी 'विचारधाराओं' के ख़िलाफ़ बताया था.

असल में, आंदोलन के सदस्यों को किसी भी राजनीतिक दल से संबंध रखने से मना किया गया था. टेक्नोक्रेसी आंदोलन के नेता हावर्ड स्कॉट का कहना था कि "विज्ञान का शासन होगा."

हावर्ड स्कॉट

हावर्ड स्कॉट ने 1919 में न्यूयॉर्क में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के एक समूह के साथ मिलकर एक 'तकनीकी गठबंधन' की स्थापना की थी, जो केवल कुछ ही वर्षों तक चला, लेकिन बाद में टेक्नोक्रेटिक मूवमेंट के नाम वाले आंदोलन की स्थापना की गई.

ये विचार 1933 में टेक्नोक्रेसी इनकॉर्पोरेशन में बदल गए, इस आंदोलन को तब से इसी नाम से जाना जाता है. इसकी स्थापना उत्तरी अमेरिका में समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी सुधारों को बढ़ावा देने के लिए एक अकादमिक और शोध संगठन के रूप में की गई थी.

स्कॉट आंदोलन के शुरू से लेकर 1970 में अपनी मृत्यु तक इसके नेता थे.

वो ख़ुद सीखे हुए इंजीनियर थे, हालांकि कुछ लोगों ने बाद में उनके प्रशिक्षण पर सवाल उठाये थे, लेकिन वह एक विशेष आकर्षण वाले व्यक्ति थे.

वह 1.95 मीटर से अधिक लंबे थे और उनकी आवाज़ भारी थी.

टेक्नोक्रेसी इनकॉर्पोरेशन की वर्तमान सीईओ चार्मी गिलक्रेस ने यह सार्वजनिक किया कि वह ऐसे लोगों को कमतर समझते थे जो बुद्धिजीवी नहीं थे और बहुत बदतमीज़ी करते थे. उनका मानना था कि पुरुष महिलाओं से बेहतर हैं.

जो लोग उन्हें जानते थे वे उनके बारे में कहते थे कि वो प्रेरक, बुद्धिमान और प्रचार की नज़र रखने वाले इंसान हैं.

दुनिया को अपने आंदोलन की ताक़त दिखाने के लिए, स्कॉट ने 'टोकन' की वकालत की. यानी उनके आंदोलन की बड़ी सभाओं में सैकड़ों सदस्य अपनी ताक़त दिखाने के लिए शामिल होते थे.

शायद इनमें से सबसे कुख्यात तथाकथित 'ऑपरेशन कोलंबिया' था, जिसमें 1947 में सैकड़ों ग्रे वाहनों में अमेरिका के वेस्ट कोस्ट के साथ साथ लॉस एंजिल्स से वैंकूवर, और कनाडा तक की यात्रा की गई थी.

टेक्नोक्रेटिक मूवमेंट ने क्या प्रस्ताव दिया?

अपने विचारों को व्यवहार में लाने के लिए, स्कॉट ने 'मूल्य प्रणाली' से छुटकारा पाने का प्रस्ताव रखा, जिसे टेक्नोक्रेट पूंजीवादी व्यवस्था का अभिन्न अंग मानते थे.

उनका कहना था कि औद्योगिक क्रांति तक अर्थव्यवस्था 'संकट' पर आधारित थी. चीज़ों को बनाने और तैयार करने में बहुत ज़्यादा मेहनत की ज़रूरत थी, और उनके लिए संसाधन कभी भी पर्याप्त नहीं थे.

हालांकि, इसके बाद से, टेक्नोलॉजी ने दुनिया में बहुतायत और प्रचुरता की एक नई दुनिया बनाई थी. इस दुनिया में मशीनें वह सब कुछ सस्ते में बना सकती थी जिसकी हर किसी को ज़रूरत थी.

इसके बावजूद, चूंकि अर्थव्यवस्था अभी भी मूल्य प्रणाली पर आधारित थी, इसलिए इसे लाभ के लिए स्थापित किया गया था, इस्तेमाल के लिए नहीं. इससे बचने के लिए, टेक्निक्रेटिक आंदोलन पैसे को ख़त्म करना चाहता था, जिस पर उसका दावा था कि यह 'लालच, अपराध और मुसीबतों की असल जड़' है.

इसके बदले में 'एनर्जी सर्टिफिकेट' जारी किए जाएंगे. जिनकी लागत वस्तुओं के उत्पादन के लिए आवश्यक ऊर्जा के अनुपात में होगी, न उससे कम न ज्यादा.

टेक्नोक्रेट आंदोलन के सदस्यों ने तर्क दिया कि अगर आप सभी को एक जैसे एनर्जी सर्टिफिकेट देते हैं और उनकी ज़रूरतों को पूरा करते हैं, तो पैसा जमा करने की इच्छा ख़त्म हो जाएगी और इसके साथ ही अपराध भी ख़त्म हो जाएंगे.

यह आंदोलन कम्यूनिज़म जैसा लगता है? टेक्नोक्रेसी में इस तरह के राजनीतिक दर्शन की बहुत कम झलक मिलती है.

कम्यूनिज़्म का प्रभाव

इस आंदोलन ने सामाजिक वर्गों और सभी 'अनावश्यक' व्यवसायों जिन्होंने वर्षों से इंसानों का शोषण किया उसको ख़त्म करने की वकालत की थी.

हावर्ड स्कॉट ने जोश जोश में ख़ुद स्वीकार किया कि 'जहां तक टेक्नोक्रेसी के विचारों का संबंध है, हम इतने वामपंथी हैं कि हम कम्यूनिज़म को बुर्जुआ बना देते हैं.'

कनाडा की पत्रकार इरा बीसन ने सीबीसी रेडियो के लिए बनाई गई एक डॉक्यूमेंट्री में स्पष्ट करते हुए कहा कि 'टेक्नोक्रेसी में वास्तव में वे ये चाहते थे कि टेक्नोलॉजी लोगों के लिए काम करे, बजाय इसके कि हम टेक्नोलॉजी के लिए काम करें. हमें जीना सीखना था, रोज़ी कमाना नहीं.'

टेक्नाटो आंदोलन द्वारा तैयार की गई सरकार के स्वरूप में कहा गया था कि सेवाओं का प्रबंधन विशेषज्ञों के ज़रिये किया जायेगा, जो बदले में अपने डायरेक्टर्स का चुनाव करेंगे. ये एक कैबिनेट बनाएंगे जो एक महाद्विपीय अध्यक्ष का चुनाव करेगी.

'नॉर्थ अमेरिकन टेक्टोनिक्स' जिस पर उन्होंने अपने सिद्धांतों की बुनियाद रखी थी, वो मध्य अमेरिका से अलास्का तक फैला हुआ था.

जेन्स स्टीफ़ेक कहते हैं, कि "आंदोलन के विचार इस धारणा पर आधारित थे कि ये लोग परोपकारी होंगे और उनकी कोई व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा या रुचि नहीं होगी, क्योंकि उन हितों और महत्वाकांक्षाओं के साथ शुरुआत करना एक मुश्किल काम है."

आंदोलन का पतन

दुनिया का यह डायस्टोपियन और अधिनायकवादी दृष्टिकोण 1930 के दशक में अपने चरम पर पहुंच गया था. 1940 के दशक में, जब राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट द्वारा शुरू की गई नई डील नीतियों के असर सामने आने लगे और दोबारा रोज़गार पैदा होने लगे, तो टेक्नोक्रेटिक आंदोलन का सितारा डगमगाने लगा.

अर्थव्यवस्था में भी सुधार हुआ और पैसा फिर से वित्तीय बाज़ारों में आने लगा. टेक्नोक्रेट आंदोलन के सपने देखने वालों में अब बहुत कम लोग बाकी रह गए थे.

लेकिन, तमाम मुश्किलों के बावजूद, 'टेक्नोक्रेसी इनकॉर्पोरेशन' अभी भी मौजूद है, हालांकि आज इस आंदोलन के मानने वाले बहुत कम हैं, जो कभी पांच लाख से अधिक हुआ करते थे.

'टेक्नाटो' का विचार ख़त्म हो चुका है, लेकिन इसकी वेबसाइट पर आप अभी भी पढ़ सकते हैं कि 'हमारे पास एक योजना है, और इस पर अमल किया जा सकता है.'

साल 2015 में, उन्होंने वर्तमान मूल्य निर्धारण प्रणाली से मज़बूत ऊर्जा-आधारित अर्थव्यवस्था की तरफ़ जाने के लिए 'ट्रांजिशन प्लान' तैयार करने के लिए तीन इंटर्न को काम पर रखा था.

उनकी प्रदर्शनी में, तीनों इंटर्न ने ग्रे पोलो शर्ट पहनी थी जिन पर 'मोनाद' का लोगो था.

अपने कंप्यूटर कैमरे के ज़रिये, चार्मी गिलक्रेस ने, बीबीसी मुंडो को टेनेसी के ग्रामीण इलाके जैक्सन शहर में स्थित एसोसिएशन के मुख्यालय में फ़ाइलों के बक्से का ढेर दिखाया.

आज उनका बुनियादी काम उस विशाल संग्रह को डिजिटाइज़ करना है जिसे इस आंदोलन ने दशकों में बनाया है.

गिलक्रेस बताती हैं, कि "वहां लाखों दस्तावेज़, तस्वीरें और असल आइडियाज़ के प्लान्स हैं, यह जानना बहुत दिलचस्प है कि उन्होंने इन अवधारणाओं के हल कैसे निकाले थे."

इसके कार्यकारी निदेशक के अनुसार, 'कुछ अरसे पहले तक, वे अपने सदस्यों को समय समय पर एक न्यूज़ लैटर भेजते रहे हैं, जो अब अमेरिका और कनाडा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रूस, ब्राजील, वेनेजुएला या यूक्रेन तक फैले हुए हैं.'

टेक्नोक्रेट आंदोलन यह बताने से बचता है कि उसके कितने साझेदार हैं या वे कौन हैं, लेकिन जैसा कि खुद गिलक्रेस ने स्वीकार किया है, कि 'उनके बहुत ज्यादा सदस्य नहीं हैं.'

वे कहती हैं, इनमे इंजीनियर और वैज्ञानिक प्रवृत्ति वाले लोग भी हैं, लेकिन "हमारे पास कुछ क्रैकपॉट भी हैं, ऐसे लोग जो यह सोचते हैं कि टेक्नोक्रेसी को सड़कों पर उतरना होगा और ऐसी व्यवस्था लागू करने के लिए हथियार उठाने होंगे जो एक बेहतर दुनिया बनाता है. हालांकि, वह आह भरते हुए कहती हैं, कि 'हम ऐसा नहीं करते, क्योंकि हम गैर राजनैतिक लोग हैं."

इस आंदोलन के क्या अवशेष बचे हैं?

चार्मी गिलक्रेस को लगता है कि हम पहले से ही किसी न किसी तरह से टेक्नोटो की तरह जी रहे हैं.

उनका कहना है कि आंदोलन के संस्थापक ने 1930 के दशक में जो भविष्यवाणी की थी, उनमें से बहुत सी बातें सच साबित हुई हैं.

"उदाहरण के लिए, अमेज़ॅन जैसी कंपनियों को देखें, जिनके पास एक सेंट्रलाइज्ड ऑर्डरिंग सिस्टम है जो जानता है कि आपको किस चीज़ की ज़रूरत है और आपको यह कब चाहिए. जब चीजें ख़रीदी जाती हैं तो ज्यादा होती हैं और मांग कम होने पर कम हो जाती हैं. समस्या यह है कि इनसे लाभ कमाया जाता है और सभी में बांटने के बजाय केवल एक या दो लोगों में ही बांटा जाता है."

1930 के दशक की तरह, नई तकनीकों ने उस काम की जगह ले ली है जो पहले लोग करते थे. कंसल्टेंसी ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के अनुसार, अब और 2030 के बीच, मैन्यूफेक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में रोबोट 20 मिलियन नौकरियों की जगह ले लेंगे.

एल्गोरिदम दुनिया के बारे में हमारे विज़न को आकार देते हैं और इंजीनियर जीवन की सभी समस्याओं और स्थितियों का तकनीकी समाधान ढूंढते हैं, जैसे कि बातचीत करने और फ्रिज भरने से लेकर पार्टनर तलाश करने तक.

कनाडाई टेक्नोक्रेटिक नेता के पोते एलन मस्क का मानना है कि 'भविष्य में जिस्मानी काम एक विकल्प होगा', जिसकी वजह से वैश्विक बुनियादी आमदनी ज़रूरी होगी.

अन्य सिलिकॉन वैली टाइकून, जैसे कि एंड्रयू यांग ने भी इसी तरह के प्रस्तावों की रूपरेखा पेश की है.

टेक्नोक्रेटिक आंदोलन ने ऐसे प्रश्न उठाए जो आज भी प्रासंगिक हैं, जैसे कि टेक्नोलॉजी के कारण होने वाले नौकरी के नुकसान से कैसे निपटा जाए? संसाधनों का शोषण किए बिना उनका उपयोग कैसे किया जाये? असमानता को कैसे ख़त्म किया जाये?

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